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चंद्रशेखर आजाद

चंद्रशेखर आजाद जन्मदिन 23 जुलाई , शहीद चन्द्रशेखर 'आजाद' (२३ जुलाई १९०६ - २७ फ़रवरी १९३१)* चंद्रशेखर आज़ाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रसिद्ध क्रांतिकारी थे। 17 वर्ष की आयु में ही चंद्रशेखर आज़ाद क्रांतिकारी दल ‘हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ में सम्मिलित हो गए। दल में उनका नाम ‘क्विक सिल्वर’ तय किया गया। पार्टी की ओर से धन एकत्र करने के लिए जितने भी कार्य हुए चंद्रशेखर उन सबमें आगे रहे। आज़ाद का जन्म एक आदिवासी ग्राम भावरा में 23 जुलाई, 1906 को हुआ था। 1919 में हुए जलियाँवाला बाग़ नरसंहार ने उन्हें काफ़ी व्यथित किया। ऐतिहासिक दृष्टि से भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के स्वतंत्रता सेनानी थे। वे शहीद राम प्रसाद बिस्मिल व शहीद भगत सिंह सरीखे क्रान्तिकारियों के अनन्यतम साथियों में से थे। *भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम प्रमुख संगठन:* हिदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन-के प्रमुख नेता (१९२८) सन् १९२२ में गाँधीजी द्वारा असहयोग आन्दोलन को अचानक बन्द कर देने के कारण उनकी विचारधारा में बदलाव आया और वे क्रान्तिकारी गतिविधियों से जुड़ कर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसियेशन के सक्रिय सदस्य बन ...

हिंदी अनुवाद हनुमान चालीसा

*पहली बार हनुमान चालीसा हिंदी में अनुवाद कर भेज रहा हूँ*             😊🙏🏻🚩 *श्रीगुरु चरन सरोज रज* मेरे गुरु/अभिभावक के चरणकमलों में *निज मन मुकुर सुधारि।*  मैं अपने दिल के दर्पण को शुद्ध करता हूँ *बरनउँ रघुबर बिमल जसु*  मैं बेदाग राम की कहानी का वर्णन करता हूं *जो दायकु फल चारि॥*  जो चार फल देते है (4 पुरुषार्थ: इच्छा, समृद्धि, धार्मिकता, मुक्ति)  *बुद्धिहीन तनु जानिकै*  खुद को कमजोर और नासमझ समझकर *सुमिरौं पवनकुमार।*  मैं पवन पुत्र (हनुमान) का चिंतन करता हूं *बल बुद्धिविद्या देहु मोहिं*  शक्ति, ज्ञान और सभ्यता प्रदान करने के लिए *हरहु कलेश विकार ॥*  और जीवन के सभी दुखों को दूर करने के लिए। *जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।*  मैं ज्ञान और गुणों के गहरे समुद्र, भगवान हनुमान की महिमा करता हूं *जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥*  मैं बंदर आदमी "वानर" की महिमा करता हूं, जो तीनों लोकों (पृथ्वी, वातावरण और परे) को रोशन करते है। *राम दूत अतुलित बल धामा।*  मैं भगवान राम के वफादार दूत की महिमा करता हूं, *अंजनि पुत्र पवनसुत न...

संघ में गुरुपूजन का इतिहास

संघशाखा प्रारम्भ होने के बाद प्रारंभिक दो वर्षों तक तो धन की कोई आवश्यकता महसूस नहीं हुई। कार्यक्रम भी सामान्य और छोटे स्वरूप के होते थे, इसलिए खर्चा भी विशेष नहीं होता था। जो कुछ थोड़ा बहुत खर्च होता उसकी पूर्ति डॉक्टरजी का मित्र-परिवार करता। उनके मित्रों को यह पूरा विश्वास था कि डॉक्टरजी निरपेक्ष देश सेवा का कार्य कर रहे हैं। इसलिए वर्ष भर में एक या दो बार वे बड़ी खशी से संघ कार्य के लिए आर्थिक मदद देते थे। 1927 तक संघ के जिम्मेदार स्वयंसेवक डॉक्टरजी के इन विश्वासपात्र मित्रों के यहां जाकर धन ले आते थे। द्रुत गति से बढ़ने वाले संघ कार्य के लिए, कार्यक्रमों तथा प्रवास हेतु जब अधिक खर्च करना अपरिहार्य हो गया तब डॉक्टरजी ने इस संबंध में स्वयंसेवकों के साथ विचार-विमर्श प्रारंभ किया। आज तक तो धनराशि एकत्रित होती उसका पाई-पाई का हिसाब डॉक्टरजी स्वयं रखते थे और यही आदत उन्होंने स्वयंसेवकों में भी डाली। परिणम स्वरूप स्वयंसेवकों को अपने सारे कार्यक्रम सादगीपूर्ण ढंग से, कम खर्च में करने की आदत हो गई। शाखाएं तेजी से खुलने लगीं थी। नागपुर के पड़ोसी वर्धा और भंडारा जिलों में नयी शाखाएं खुलीं। इस...