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पुण्यभूमि भारत राष्ट्र व राष्ट्रीयता इन  दिनों राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद जैसे शब्दों का प्रयोग आम हो चला है। जबकि इन शब्दों के पीछे गहन चिंतन विद्यमान है। इसलिए ‘राष्ट्र’ शब्द का प्रयोग किस देश के लिए किया जाए इसपर भी चिंतन करना बहुत आवश्यक है। मीडिया, जिसकी पहुंच बड़े धनवानों से लेकर सामान्य जनता तक है, आज बहुत हद तक सत्ता परिवर्तन के लिए कारक है। मीडिया केवल खबरें नहीं दिखाती, वह समस्याओं के समाधान भी तलाशती हैं। पर कई बार सामान्य जनता को भ्रम में डालने का काम भी करती है, कभी जानबूझकर तो कभी अज्ञानता के कारण। इसलिए जब भारत राष्ट्र की बात हो तो मीडियाकर्मियों के लिए आवश्यक है कि वे अपनी भूमिका को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में समझें। हम लोग भारतीय हैं, एक अर्थ में “भारत” ही हैं। ऐसे में आवश्यक है कि ‘भारत का भारत से परिचय हो’। दुनिया के सभी मत-सम्प्रदाय, यहां तक के वैज्ञानिक भी मानते हैं कि इस सृष्टि को कोई दैवीय शक्ति संचालित कर रही है। वह शक्ति कौन सी है, उसका स्वरूप कैसा है, इसपर ऋषियों ने बहुत अनुसंधान किये, तप किया। दैवीय शक्ति को जानने की जिज्ञासा अबतक शांत नहीं हुई और अ...

यद्यपि शुद्धं लोक विरुद्धम् नाचरणीयम् नाचरणीयम्

****************************** यद्यपि शुद्धं लोक विरुद्धम् नाचरणीयम् नाचरणीयम्* ________________________________            *जब कोई व्यक्ति सज्जन बनता है, तप करता है,तब उसे आत्मतत्व से साक्षात होता है।*                 आत्मदर्शन के साथ ही उसे विश्वदर्शन भी होता है। *संसार के व्यवहारों के रहस्यों को जानने से वह ऋषि कहलाता है।* तब उसे मन्त्रों के दर्शन होते हैं जो कि वेद हैं।                            *इसी तरह जो व्यक्ति वन, वृक्ष, भूमि,नदी प्राणी के साथ निरन्तर सम्पर्क में रहता है, सम्बन्ध स्थापित करता है, तादात्म्य स्थापित कर, उनकी अनुभूति के स्तर को प्राप्त करता है, यह लोकज्ञान है।* -------------- *वेदज्ञान और लोकज्ञान का मूल एक ही है। दोनों की परिणति लोकहित है।*       *लोकज्ञान जब व्यवस्थित हो जाता है तो उसे शास्त्र कहते हैं। लोकज्ञान एक विशाल नद है, वेद उस पर स्थित कुछ सुंदर टापू हैं।* शास्त्र ज्ञान से भी अधिक व्यापक लोकज्ञान...

राम और विबिषण प्रसंग

🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀 *रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा॥* *अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा॥* ................................................ रावण को रथ पर और श्री रघुवीर को बिना रथ के देखकर विभीषण अधीर हो गए। प्रेम अधिक होने से उनके मन में सन्देह हो गया (कि वे बिना रथ के रावण को कैसे जीत सकेंगे)। श्री रामजी के चरणों की वंदना करके वे स्नेह पूर्वक कहने लगे *नाथ न रथ नहि तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥* *सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥* ................................................. हे नाथ! आपके न रथ है, न तन की रक्षा करने वाला कवच है और न जूते ही हैं। वह बलवान्‌ वीर रावण किस प्रकार जीता जाएगा? कृपानिधान श्री रामजी ने कहा- हे सखे! सुनो, जिससे जय होती है, वह रथ दूसरा ही है ॥ *🙌सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥* *बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥* .................................................. शौर्य और धैर्य उस रथ के पहिए हैं। सत्य और शील (सदाचार) उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं। बल, विवेक, दम (इं...

स्वयं को जागृत करें

*स्वयं को जागृत करें------* _____________________________ 🥀🥀🌎-- *हमारे शरीर में लगभग 72000 नाड़ियाँ होती है जिनसे प्राण ऊर्जा का संचरण होता है।*         जिनमे से 3 को मूल कहा गया है इड़ा, पिङ्गला और सुषुम्ना।  *इड़ा बाये भाग में और पिङ्गला दाय भाग में स्थित होती है और इनके मध्य सुषुम्ना स्थित होती है।*           🥀🌎-- *इड़ा और पिङ्गला द्वैत का प्रतिक है जिसे हम शिव शक्ति कहते है।*  ‌ ‌                  हम इन्ही दोनों की सक्रियता के आधार पर गुण धर्म पाते है।         *इन्हें स्त्रियोचित (इड़ा) और पुरुषोचित (पिङ्गला ) भी कहा जाता है।*                    ये लिंग विभेद का आधार नहीं है बल्कि गुण धर्म और स्वभाव का निर्धारण मात्र है।               *जिसकी इड़ा नाड़ी ज्यादा सक्रीय होगी उसमे स्त्री गुण धर्म ज्यादा होंगे फिर वो लिंग से पुरुष हो या स्त्री।उसी प्रकार जिसमे पिङ्गला ज्यादा सक्रीय हो...

पूर्णमदः पूर्णमिदं

________________________________________________ *ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं* हम सब प्रायः अपनी तुलना किसी अन्य से करने लगते हैं। किन्तु कोई भी दो व्यक्ति एक जैसे नहीं हो सकते। कोई भी दो वस्तुएँ एक जैसी नहीं हो सकतीं।किन्हीं भी दो व्यक्तियों के गुण एक जैसे नहीं हो सकते ।कोई व्यक्ति किसी एक कार्य में कुशल हो सकता है तो दूसरा किसी अन्य कार्य में कुशल हो सकता है। और ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम सभी अपने आप में एक पूर्ण व्यक्तित्व हैं। ईशावास्योपनिषद् का मन्त्र है :- *“ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।* *पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।”* यह मन्त्र वास्तव में इसी सत्य की ओर इंगित करता है कि प्रत्येक्क वस्तु और प्रत्येक जीव स्वयं में पूर्ण होता है।   *“पूर्णमदः पूर्णमिदं”* – वह परब्रह्म भी पूर्ण है और यह कार्यब्रह्म भी पूर्ण है ।  *“पूर्णात् पूर्णमुदच्यते”* – क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण आत्मा से ही उत्पन्न हुआ है । अब प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या दो पूर्ण भी एक साथ रह सकते हैं ? बिल्कुल रह सकते हैं, क्योंकि एक पूर्ण दूसरे पूर्ण का ही तो विस्तार है – केवल उसका स्वरूप भ...

सुभाषित

*प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम्* *यदि सन्ति गुणा: पुंसां विकसन्त्येव ते स्वयं,* *म्नहि कस्तूरिकामोद: शपथेन विभाव्यते।* भावार्थ :- *कस्तूरी की गन्ध को सिद्ध नही करना पड़ता, वह तो स्वयं फैलकर अपनी सुगन्ध से वातावरण को सुवासित कर देती है।*         *उसी प्रकार गुणवान् तथा प्रतिभावान मनुष्य के गुण अपने आप फैल जाते है, उनका प्रचार नही करना पड़ता।*

सेवा प्रसंग

💐💐कर्ज💐💐 विवाह के दो वर्ष हुए थे जब सुहानी गर्भवती होने पर अपने घर पंजाब जा रही थी ...पति शहर से बाहर थे ...  जिस रिश्ते के भाई को स्टेशन से ट्रेन मे बिठाने को कहा था वो लेट होती ट्रेन की वजह से रुकने में मूड में नहीं था इसीलिए समान सहित प्लेटफॉर्म पर बनी बेंच पर बिठा कर चला गया .... गाड़ी को पांचवे प्लेटफार्म पर आना था ... गर्भवती सुहानी को सातवाँ माह चल रहा था. सामान अधिक होने से एक कुली से बात कर ली....  बेहद दुबला पतला बुजुर्ग...पेट पालने की विवशता उसकी आँखों में थी ...एक याचना के साथ  सामान उठाने को आतुर ....  सुहानी ने उसे पंद्रह रुपये में तय कर लिया और टेक लगा कर बैठ गई.... तकरीबन डेढ़ घंटे बाद गाडी आने की घोषणा हुई ...लेकिन वो बुजुर्ग कुली कहीं नहीं दिखा ... कोई दूसरा कुली भी खाली नज़र नही आ रहा था.....ट्रेन छूटने पर वापस घर जाना भी संभव नही था ... रात के साढ़े बारह बज चुके थे ..सुहानी का मन घबराने लगा ... तभी वो बुजुर्ग दूर से भाग कर आता हुआ दिखाई दिया .... बोला चिंता न करो बिटिया हम चढ़ा देंगे गाडी में ...भागने से उसकी साँस फूल रही थी ..उसने लपक कर सामान उठा...

लालच की दुनिया प्रेरक प्रसंग

*⚜️ आज का प्रेरक प्रसंग ⚜️*                 *!! लालच की दुनिया !!* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ एक दिन गाँव की एक बहू सफाई कर रही थी, मुँह में सुपारी थी पीक आया तो उसने गलती से यज्ञवेदी में थूक दिया। उसे आश्चर्य तब हुआ जब उसका थूक स्वर्ण में बदल गया। अब तो वह प्रतिदिन जान बूझकर वेदी में थूकने लगी और उसके पास धीरे-धीरे स्वर्ण बढ़ने लगा। महिलाओं में बात तेजी से फैलती है, इसलिए कई और महिलाएं भी अपने-अपने घर में बनी यज्ञवेदी में थूक-थूक कर सोना उत्पादन करने लगीं। धीरे-धीरे पूरे गाँव में यह सामान्य चलन हो गया। सिवाय एक महिला के, उस महिला को भी अनेक दूसरी महिलाओं ने उकसाया, समझाया, अरी ! तू क्यों नहीं थूकती ?  जी, बात यह है कि मैं अपने पति की अनुमति बिना यह कार्य हर्गिज नहीं करूँगी और जहाँ तक मुझे ज्ञात है वह अनुमति नहीं देंगे। किन्तु ग्रामीण महिलाओं ने ऐसा वातावरण बनाया कि आखिर उसने एक रात डरते-डरते अपने पति को पूछ ही लिया। खबरदार जो ऐसा किया तो, यज्ञवेदी क्या थूकने की चीज़ है ?  पति की गरजदार चेतावनी के आगे बेबस वह महिला चुप हो गई पर जैसा वाताव...