स्वयं को जागृत करें
*स्वयं को जागृत करें------*
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🥀🥀🌎-- *हमारे शरीर में लगभग 72000 नाड़ियाँ होती है जिनसे प्राण ऊर्जा का संचरण होता है।*
जिनमे से 3 को मूल कहा गया है इड़ा, पिङ्गला और सुषुम्ना।
*इड़ा बाये भाग में और पिङ्गला दाय भाग में स्थित होती है और इनके मध्य सुषुम्ना स्थित होती है।*
🥀🌎-- *इड़ा और पिङ्गला द्वैत का प्रतिक है जिसे हम शिव शक्ति कहते है।*
हम इन्ही दोनों की सक्रियता के आधार पर गुण धर्म पाते है।
*इन्हें स्त्रियोचित (इड़ा) और पुरुषोचित (पिङ्गला ) भी कहा जाता है।*
ये लिंग विभेद का आधार नहीं है बल्कि गुण धर्म और स्वभाव का निर्धारण मात्र है।
*जिसकी इड़ा नाड़ी ज्यादा सक्रीय होगी उसमे स्त्री गुण धर्म ज्यादा होंगे फिर वो लिंग से पुरुष हो या स्त्री।उसी प्रकार जिसमे पिङ्गला ज्यादा सक्रीय होगी उसमे पुरुष गुण धर्म ज्यादा पाये जायेंगे फिर वो लिंग से चाहे पुरुष हो या स्त्री।*
*जो इड़ा और पिङ्गला में सामंजस्य या संतुलन बैठा लेता है वो अत्यंत प्रभावी हो जाता है।*
यानि शिव शक्ति सामंजस्य *'हंसः और सोऽहं'* शायद इसी की और इशारा करते है।
*इड़ा या पिङ्गला की सक्रियता में बाहरी भौतिक जगत के अनुसार प्रक्रिया स्वाभाविक है यानि वातावरण से प्रभावित हम होते है।*
*सुषुम्ना गुण और रंग हिन् होती है।जो सामंजस्य बैठा लेता है तब ऊर्जा सुषुम्ना नाड़ी के माध्यम से ऊर्ध्वगमन करने लगती है जो वास्तव में उचित पथ है।*
ऐसी अवस्था में व्यक्ति पर बाह्य भौतिक जगत के परिवर्तन का प्रभाव नहीं पड़ता।
राग यानि रंग और वैराग्य यानि रंग हिन् ऐसी दशा में व्यक्ति वैराग्य की अनुभूति करता है और उसका जीवन साधना और अनुभूति खुद के शरीर तक सिमित हो जाती है।
*ऐसी अवस्था में न मंदिर की आवश्यकता नजर आती है और न मूर्ति की।*
साधक *अहम् ब्रह्मश्मि* के भाव में जीने लग जाता है शायद यही इस मनुष्य योनि का लक्ष्य है।
यही आत्म ज्ञान है की मनुष्य को ये बोध हो जाना की वो खुद ब्रह्म है। *द्वैत अंततः अद्वैत में परिलक्षित हो उठता है।*
ब्रह्म निर्गुण है यानि सत् रज और तम गुणों से ऊपर। साधक अपने प्राण को अपने भूमध्य बिंदु ( आज्ञा चक्र ) में स्थापित कर लेता है इससे ऊर्जा का द्रवीकरण नहीं हो पाता वास्तव में यही अवस्था ब्रह्म चर्य है ।
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जय माता की !!
जय शिव शम्भू !!
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