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प्रेरक प्रसंग - विश्वास

विश्वास यानी विश्व की आस है 1 पपीहे की विश्वास की साल में एक बार ही अपनी प्यास बुझाता है पूरी गर्मी ज्यादा है मेघ आएंगे और प्यास बुझ आएंगे। 2 या विश्वासी है कि सूरजमुखी के अंधा कार के बाद सूर्य का प्रकाश आएगा यह विश्वास ही तो है। 3 यह विश्वास ही तो है कि राम जी ने बालू और बंदरों को लेकर के उस आसुरी शक्ति के साम्राज्य को हराकर जीत लेने की। 4 यह विश्वास ही तो है की मनु 19 का को लेकर के इस सृष्टि को बचाने इसलिए खुद पर विश्वास रहे तो सब कुछ संभव है आस है तो विश्वास है। सुंदरता  कोई माता से पूछे तो सुंदरता उसका पुत्र है कोई भक्तों से पूछे तो सुंदरता उसका भगवान है श्रीराम से पूछे तो उनकी सुंदरता हनुमान टूटी हुई है हनु फूला हुआ मुँह लंबी पूंछ इतने भोले दिखने में वानर उन्हें सीता माता ने मोतियों की माला दी तो उसे तोड़कर उसमें राम जी देखने लगे।

वीर शिवाजी

१. सेनानियों द्वारा गौरवान्वित, शिवाजी महाराज १ अ. छत्रपति शिवाजी महाराज महान सेनानी थे ! – मुगल सम्राट अकबर छत्रपति शिवाजी की मृत्यु के पश्‍चात स्वयं मुगल सम्राट अकबर ने उनके विषय में कहा, वे एक महान सेनानी थे । उन्होंने अपनी चतुराई और शौर्य से एक नए राज्य की स्थापना की । १९ वर्ष से अपनी प्रचंड सेना के बल पर मैं हिन्दुस्थान के बचे-खुचे प्राचीन राज्यों को समाप्त करने हेतु प्रयत्नरत हूं; परंतु उनका बल बढता ही जा रहा है । १ आ. चतुर और सैन्य दावपेंच में कुशल ! – गोवा के गवर्नर गोवा के गवर्नर और कैप्टन जनरल अंतोनियो पाइश द सांद ने शिवाजी महाराज और मुगलों के बीच हुए युद्ध का प्रतिवेदन (रिपोर्ट) अपने देश पुर्तगाल की सरकार के पास भेजा । उसमें उन्होंने लिखा, शिवाजी ने हमारी सीमा से लगा गोवा से दमन तक का प्रदेश अपने अधिकार में कर लिया है । अभी वे मुगलों से युद्ध कर रहे हैं । यह हिन्दुस्थान का नया राजा इतना चतुर और सैन्य दावपेंच में इतना पारंगत है कि वह बचाव और चढाई का युद्ध एक साथ समान कुशलता से करता है । वह मुगलों के प्रदेश में घुडसवारों को भेजकर उन्हें जला डालता है । १ इ. शिवाजी महारा...

प्राचीन पुस्तकें

प्राचीनकाल की महत्वपूर्ण पुस्तकें 1-अष्टाध्यायी               पाणिनी 2-रामायण                    वाल्मीकि 3-महाभारत                  वेदव्यास 4-अर्थशास्त्र                  चाणक्य 5-महाभाष्य                  पतंजलि 6-सत्सहसारिका सूत्र      नागार्जुन 7-बुद्धचरित                  अश्वघोष 8-सौंदरानन्द                 अश्वघोष 9-महाविभाषाशास्त्र        वसुमित्र 10- स्वप्नवासवदत्ता        भास 11-कामसूत्र                  वात्स्यायन 12-कुमारसंभवम्           कालिदास 13-अभिज्ञानशकुंतलम्    कालिदास   14-विक्रमोउर्वशियां      ...

प्रेरक प्रसंग- इंद्रिय

स्वामी रामतीर्थ कॉलेज से घर जा रहे थे। मार्ग में एक नींबू वाला दिखाई दिया। नींबू बहुत रसीले और एकदम ताजे थे। रामतीर्थ के मुंह में पानी आ गया। सोचा कि नींबू खरीद लेने चाहिए। उन्होंने नींबुओं को हाथ लगाकर देखा और उनके स्वादिष्ट होने को परखा। फिर जिह्वा के इस आमंत्रण को मन ने धिक्कारा, क्रनींबू देखकर विचलित होना ठीक नहीं। यह भी एक तरह का लोभ है, जो साधना के मार्ग में बाधक है। रामतीर्थ आगे बढ़ गए, किंतु जिह्वा का शौक इतनी आसानी से हार मानने वाला नहीं था। जिह्वा ने उन्हें नींबुओं का स्वाद लेने के लिए उकसाया। वे फिर नींबू वाले के पास लौटे। लौटकर नींबुओं को देखते रहे। वीतरागी मन ने फिर पैरों को आगे बढ़ाया। चार कदम चलकर जिह्वा ने फिर लौटाया। नींबू वाला हैरान हो गया कि ये सज्जन बार-बार आना-जाना कर रहे हैं, किंतु नींबू खरीद नहीं रहे हैं। अंतत: उसने कह ही दिया, क्रसाहब! लेना है तो ले लीजिए। बार-बार क्यों आ-जा रहे हैं? स्वामी रामतीर्थ ने दो नींबू खरीद लिए। घर आते ही पत्नी से चाकू मांगा और एक नींबू काट लिया। मगर जैसे ही वे एक फांक चूसने के लिए मुंह तक लाए कि मन ने ताना दिया, क्रवाह रे रामतीर्थ! तू ...

प्रेरक प्रसंग - अहंकार

अर्जुन को अहंकार हो गया कि वही भगवान के सबसे बड़े भक्त हैं। उनको श्रीकृष्ण ने समझ लिया। एक दिन वह अर्जुन को अपने साथ घुमाने ले गए।  रास्ते में उनकी मुलाकात एक गरीब ब्राह्मण से हुई। उसका व्यवहार थोड़ा विचित्र था। वह सूखी घास खा रहा था और उसकी कमर में तलवार लटक रही थी। अर्जुन ने पूछा, ‘‘आप तो अहिंसा के पुजारी हैं। जीव हिंसा के भय से सूखी घास खाकर अपना गुजारा करते हैं लेकिन फिर हिंसा का यह उपकरण तलवार क्यों आपके साथ है?’’  ब्राह्मण ने जवाब दिया, ‘‘मैं कुछ लोगों को दंडित करना चाहता हूं।’’  ‘‘आपके शत्रु कौन है?’’ अर्जुन ने जिज्ञासा जाहिर की।  ब्राह्मण ने कहा, ‘‘मैं चार लोगों को खोज रहा हूं, ताकि उनसे अपना हिसाब चुकता कर सकूं।’’  सबसे पहले तो मुझे नारद की तलाश है। नारद मेरे प्रभु को आराम नहीं करने देते, सदा भजन-कीर्तन कर उन्हें जागृत रखते हैं। फिर मैं द्रौपदी पर भी बहुत क्रोधित हूं। उसने मेरे प्रभु को ठीक उस समय पुकारा, जब वह भोजन करने बैठे थे। उन्हें तत्काल खाना छोड़ पांडवों को दुर्वासा ऋषि के शाप से बचाने जाना पड़ा। उसकी धृष्टता तो देखिए। उसने मेरे भगवान को जूठा खान...

शिक्षक दिवस 2021

शिक्षा किसी भी राष्ट्र की नींव होती है और शिक्षक की शिक्षा व्यवस्था शिक्षकों के चरित्र और आचरण पर ही निर्भर करता है। भारतवर्ष की महान संस्कृति की पृष्ठभूमि में भी यहां के शिक्षकों की त्याग युक्त तपस्या रही है। भारत यदि विश्वगुरु के पद पर लंबे समय तक प्रतिष्ठित रहा और आज भी यदि पूरा विश्व उसकी ओर आशा भरी दृष्टि से निहारता है, तो उसके पीछे यहां के जादर्श शिक्षकों का ही शुचितापूर्ण आचरण एवं ज्ञान के प्रति समर्पण है। यहां का ध्येय वाक्य रहा है एत्देश प्रसूतस्य शकासादअग्रजमनः, स्व स्व-चरित्र शिक्षरेन पृथ्वियां  शिक्षासर्व मानव यह वह देश है, जहां के शिक्षकों ने धरती को बिस्तर और आसमान को चादर बनाकर स्वयं झोपड़ियों में रहकर भी महलों के लिए सम्राट तैयार किए त्याग, तपस्या संकल्प सिद्धांत और आचरण की इस पावन भूमि पर गुरु-शिष्ण संबंधों की महान परंपरा रही है। हम विश्वामित्र वशिष्ठ के बिना मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम श्री. संदीपनी मुनि के बिना श्रीकृष्ण की. द्रोण के बिना अर्जुन की परशुराम के बिना कर्ण की, चाणक्य के बिना चंद्रगुप्त की परमहंस रामकृष्ण के बिना स्वामी विवेकानंद की कल्पना गौरव है? क्या...