वीर शिवाजी
१. सेनानियों द्वारा गौरवान्वित, शिवाजी महाराज
१ अ. छत्रपति शिवाजी महाराज महान सेनानी थे ! – मुगल सम्राट अकबर
छत्रपति शिवाजी की मृत्यु के पश्चात स्वयं मुगल सम्राट अकबर ने उनके विषय में कहा, वे एक महान सेनानी थे । उन्होंने अपनी चतुराई और शौर्य से एक नए राज्य की स्थापना की । १९ वर्ष से अपनी प्रचंड सेना के बल पर मैं हिन्दुस्थान के बचे-खुचे प्राचीन राज्यों को समाप्त करने हेतु प्रयत्नरत हूं; परंतु उनका बल बढता ही जा रहा है ।
१ आ. चतुर और सैन्य दावपेंच में कुशल ! – गोवा के गवर्नर
गोवा के गवर्नर और कैप्टन जनरल अंतोनियो पाइश द सांद ने शिवाजी महाराज और मुगलों के बीच हुए युद्ध का प्रतिवेदन (रिपोर्ट) अपने देश पुर्तगाल की सरकार के पास भेजा । उसमें उन्होंने लिखा, शिवाजी ने हमारी सीमा से लगा गोवा से दमन तक का प्रदेश अपने अधिकार में कर लिया है । अभी वे मुगलों से युद्ध कर रहे हैं । यह हिन्दुस्थान का नया राजा इतना चतुर और सैन्य दावपेंच में इतना पारंगत है कि वह बचाव और चढाई का युद्ध एक साथ समान कुशलता से करता है । वह मुगलों के प्रदेश में घुडसवारों को भेजकर उन्हें जला डालता है ।
१ इ. शिवाजी महाराज की तुलना सर्टोरिअस, हानिबॉल, अलेक्जेंडर, जूलियस सीजर
से की जा सकती है ! – समकालीन पुर्तगाली और अंग्रेज (ये सभी उस समय के प्रसिद्ध सेनापति थे ।)
२. युद्धप्रदेश से पूर्णतः परिचित होना
छत्रपति शिवाजी में विलक्षण बात क्या थी ? उनकी सबसे पहली विलक्षण बात यह थी कि वे जिस भी प्रदेश में युद्ध करते थे, उसके चप्पे-चप्पे की जानकारी उनके पास होती थी । इस दख्खन के पहाड, नदियां, नाले कैसे हैं; दुर्ग, घाटों के मार्ग कैसे हैं, इस बात की जानकारी उन्होंने बहुत पहले कर ली थी । इतना ही नहीं, उस क्षेत्र का उन्होंने मानचित्र भी बना लिया था ।
३. कुशल गुप्तचर विभाग
जानकारी जुटाने के लिए शिवाजी के पास बहुत कुशल गुप्तचर विभाग था । विश्वासराव नानाजी दिगे, बहिर्जी नाईक, सुंदरजी प्रभुजी आदि उनके गुप्तचरों के नाम मिलते हैं । उनके गुप्तचर बिहार में मिले थे, यह बात उस समय के अंग्रेज यात्रियों ने लिखकर रखी है । ई.स. १६६४ में पहली बार जब शिवाजी ने सूरत लूटी, उसके पहले इस नगर की पूरी जानकारी बहिर्जी नाईक ने जुटा ली थी । सूरत आक्रमणसे अकूत द्रव्य (धन) मिलेगा, ऐसा परामर्श भी उसने दिया था । सूरत में कितना धन छिपा है, इसकी जानकारी बहुत पहले ही बहिर्जी नामक गुप्तचर ने कर ली थी । इसलिए, सूरत अभियान में समय व्यर्थ नहीं गया ।
४. बलवान अर्थनीति और बहुत संपन्न कोष
तीसरी बात, उनका कोष था ! सेना रखनी है, तो उसके लिए संपत्ति चाहिए । प्रदेश जीतना और उनका विकास करने के लिए सेना चाहिए । इन्हें संभालने के लिए धन चाहिए । इसके लिए सूरत जैसे नगरों की अकूत संपत्ति लूटी । चौथाई और गावखंडी नामक कर (टैक्स) भी शिवाजी ने लगाए थे । गोवा के समीन स्थित बारदेशा क्षेत्र पर गावखंडी कर लगाने का उल्लेख कागदपत्रों में मिलता है । शिवाजी महाराज की अर्थनीति ठोस थी ।
५. फूर्तीले सैनिक
शिवाजी की सेना बहुत फूर्तीली थी । उसमें, हाथी जैसी धीमी गति से चलनेवाले पशुआें को स्थान नहीं था । जो लड नहीं सकते, ऐसे लोगों को सेना में भरती नहीं किया जाता था; परंतु लूट के लिए दुघोडी, तिघोडी सवार रखे जाते थे । सैनिक गतिविधियां फूर्ती और वेग पर आधारित थीं ।
६. अचानक आक्रमण
अचानक आक्रमण करना, शिवाजी महाराज की मुख्य रणनीति थी । शाइश्ता खां पर अचानक छापा मारना, उस समय के अनेक आक्रमणों में सर्वोत्तम था । शिवाजीराजा के इस आक्रमण के पश्चात, ३ वर्ष तक पुणे में रहनेवाला मुगल सेनापति, केवल ३ दिन में अपनी १ लाख की सेना के साथ औरंगाबाद भाग गया ।
७. छापामार युद्ध
शिवाजी ने इन प्रदेशों में लडने के लिए अपनी एक विशेष शैली बनाई । इसे छापामार युद्धशैली कहते हैं । शिवाजी महाराज से मिली, यह बहुत बडी धरोहर है । यह युद्ध-शैली कूटयुद्ध अथवा वृकयुद्ध (भेडिया-युद्ध) पर आधारित थी ।
७ अ. छापामार युद्धनीति के सिद्धांत
अकस्मात आक्रमण, वह भी अपने लिए सुविधाजनक स्थान पर, अपनी न्यूनतम हानि और हाथ में अधिकाधिक लूट अथवा शत्रु की अधिकाधिक हानि, ये छापामार युद्ध-शैली के सिद्धांत थे । यद्यपि इस रणनीति का अधिकाधिक उपयोग शिवाजी ने किया था; परंतु इसके प्रवर्तक शहाजीराजे भोसले थे ।
८. मराठी चतुराई की उत्तम बानगी !
८ अ. बहादुर खां को फंसाया !
मराठी चतुराई की उत्तम बानगी शिवाजी ने आलमगीर के दख्खन सुबेदार को दिखाया । पुणे से २४ कोस पर भीमा नदी के किनारे, बादशाह का भाई बहादुर खां कोकलताश जफरजंग किला बनाकर रहता था । उसके पास बादशाह को भेंट (नजराना) देने के लिए २०० अरबी घोडे और १ करोड रुपए होने का समाचार शिवाजी को मिला । गुप्तचर ने अपना काम व्यवस्थित किया । अब, रणनीति, लडाई और लूट का कार्य करना था । शिवाजी महाराज ने योजना बनाई । नौ सहस्र (हजार) की सेना लेकर उनका सेनापति पेडगांव की ओर चल दिया । इसका नाम संभवतः हंबीरराव मोहिते रहा होगा । इसने बहुत चतुराई की । इसने अपने सैनिकों की दो टोलियां बनाई । २ सहस्र की एक टोली ने बहादुरगड पर धावा बोल दिया । क्या करना है, यह पहले से निश्चित था । मराठी सेना हमारी छावनी पर आक्रमण करनेवाली है, यह पता चलते ही बहादुर खां ने अपनी सेना को तैयार रहने का आदेश दिया । पूरी तैयारी के साथ मुगल सैनिक दुर्ग से निकलकर मराठों की दिशा में चल पडे । मुगल सेना आ रही है, यह देखकर मराठी सैनिकों की टुकडी भागने लगी । चतुराई से मराठी सेना की टुकडी, मुगल फौज को बहुत दूर तक ले गई । बहादुर खां चिढकर मराठी सैनिकों का पीछा करता रहा । खां बहुत दूर पहुंच गया है, यह समाचार गुप्तचरों ने दिया । तब, ७ सहस्र सैनिकों की दूसरी बडी टोली ने बहादुरगड पर आक्रमण कर दिया । वहां उपस्थित मुट्टीभर मुगल सैनिक, मराठों के इस आक्रमण के सामने टिक नहीं पाए । मराठा सैनिकों ने वहां की मुगल छावनी को अच्छे से लूटा । एक करोड रुपए का खजाना और २०० अरबी घोडे अलग से हाथ लगे । इसके पश्चात, मराठा सैनिकों ने पेडगांव की इस मुगल छावनी को जलाकर राख कर दिया ।
८ आ. अंग्रेजी नाविकों को आश्चर्यकारक ढंग से झांसा देनेवाली छोटी-वेगवान नावें !
ई.स. १६८९ के अगस्त महीने के अंत में शिवाजी ने अपने एक सैनिक मायनाक भंडारी को अलीबाग के समीप स्थित खांदेरी टापू पर भेजा । उस समय समुद्र में ज्वार आया हुआ था । फिर भी, उस साहसी मायनाक ने खांदेरीकर दुर्ग का निर्माण आरंभ किया । खांदेरी और उंदेरी ये दोनों टापू अष्टगर तट के सामने समुद्र में हैं । मुंबई के अंग्रेजों ने कैप्टन विलियम मिनचिन को दो बडी नावें, हंटर और रिवेंज तथा एक जलयान (जहाज) देकर, मराठा सैनिक मायनाक को भगाने के लिए भेजा । वहां के बंदरगाह से छोटी मराठी नावें रसद, सामान आदि लेकर उस टापू पर जाती थीं । यह सहायता रोकने का काम कैप्टन मिनचिन को दिया गया था । कै. अडर्टन, रिचर्ड केग्विन, फ्रान्सिस थॉर्प, वेल्श, ब्रैडबरी ऐसे प्रसिद्ध नाविक कै. मिनचिन के साथ थे; फिर भी समुद्रतट से समुद्रजल की ओर बहनेवाली वायु, ज्वार-भाटा, थल से खांदेरी तक का छिछला किनारा इन सब बातों की पूरी जानकारी अंग्रजों से अधिक, मराठों को थी । अंग्रेजों की बडी नावें वायु के झोंकों से समुद्री चट्टानों से टकराकर डूब सकती थीं । इसलिए, उस समय वहां बडी नाव उपयोगी नहीं थी । परंतु, मराठों की छोटी नावें रसद लेकर रात के अंधेरे में टापू पर पहुंच जाती थीं । यह सब सवेरे कै. मिनचिन को दिखाई देता था । उसने अपने मुंबई मुख्यालय को भेजे एक पत्र में लिखा था, ये छोटी वेगवान मराठी नावें हमें आश्चर्यकारक ढंग से झांसा दे जाती हैं । ऐसी नावें अंग्रेजी नौसेना में होनी चाहिए । ब्रिटानिया रुल्स द वेव्हज (सागर की तरंगों पर ब्रिटेन का राज्य होगा), यह कहनेवाले अंग्रेज नाविक यदि ऐसा कहते हैं, तो यह उनकी हार और मराठी सागरीसेना की जीत ही है । आगे, इसी खांदेरी तट पर मराठी नौसेना के प्रमुख दौलतखां ने अचानक आक्रमण कर, डव्ह नाम का एक जलपोत (जहाज) पकडा और उसपर सवार अंग्रेजों को बंदी बनाकर सागरगढ पर रखा । इस लडाई में अंग्रेजों की बडी हानि हुई थी ।
८ इ. बंदी बनाकर आगरा के कारागार में रखे हुए शिवाजी से डरनेवाला औरंगजेब !
शिवाजी को जब आगरा के कारागार में रखा गया, तब उनके भय से औरंगजेब आगरा के दुर्ग से सामने की जामा मसजिद में नमाज के लिए जाते समय अपने साथ इतनी बडी संख्या में अंगरक्षक रखता था कि इसे देखकर सबको आश्चर्य होता था । इस बात का उल्लेख राजस्थानी पत्र में है ।
८ ई. अजेय योद्धा, सज्जनों के मित्र और धर्म को बढावा देनेवाले
शिवाजी महाराज, अद्वितीय सेनानी थे । उनकी इच्छा, सिंधु नदी से बंगाल खाडी तक का प्रदेश जीतने की थी, यह बात तत्कालीन फ्रेंच यात्री एबे कैरे ने लिखकर रखी है । बर्नियर लिखता है, शिवाजी अजेय योद्धा और राज्य चलाने की कला में पारंगत थे । वे सज्जनों के मित्र थे तथा धर्म को बढावा देते थे ।
८ उ. शिवाजी महाराज का नेतृत्व, उनकी सेना का स्फूर्तिस्रोत
रॉबर्ट आर्म लिखता है, उत्तम सेनापति में आवश्यक सभी गुण शिवाजी राजा में थे । शत्रु से संबंधित समाचार प्राप्त करने में उन्होंने कभी ढिलाई नहीं की । इसके लिए वे बडी धनराशि खर्च करते थे । किसी भी बडे संकट का सामना उन्होंने धैर्य और युक्ति से किया । उस काल के सभी सेनापतियों में वे सर्वश्रेष्ठ थे । हाथ में तलवार लेकर शत्रु पर टूट पडनेवाले शिवाजी, अपनी सेना के लिए प्रेरणा थे । उनका नेतृत्व, उनकी सेना का स्फूर्तिस्रोत था ।
९. शिवाजी महाराज का मुगलों को भेजा पत्र !
९ अ. हमारे इस प्रदेश में कल्पना के भी घोडे नचाना कठिन है,
तब इस पर अधिकार करने की बात कहां से आती है ? पूर्णतः झूठी बातें लिखकर
बादशाह के पास भेजने में आपको लाज क्यों नहीं लगती, ऐसा पत्र भेजनेवाले महाराज
शिवाजी राजा का मुगलों को लिखा एक और पत्र उपलब्ध है । उसमें वे लिखते हैं, पिछले ३ वर्ष से बादशाह के बडे-बडे सलाहकार और योद्धा हमारे प्रदेश पर अधिकार करने के लिए चढाई कर रहे हैं । बादशाह आदेश करता है कि शिवाजी के दुर्ग तुम अधिकार कर लो । आप उत्तर भेजते हैं, हम शीघ्र ही उसपर अधिकार कर लेंगे । परंतु, हमारे इस प्रदेश में कल्पना के भी घोडे नचाना कठिन है, अधिकार करने की बात कैसे कर रहे हैं ? पूर्णतः झूठी बातें बादशाह को लिखकर भेजने में आपको लाज क्यों नहीं लगती ? कल्याणी बेदर के दुर्ग खुले मैदान में थे, उसपर आपने अधिकार कर लिया । हमारा प्रदेश कठिन और पर्वतीय है । नदी-नाले पार, आगे जाने के लिए मार्ग नहीं हैं । मेरे ६० दुर्ग बहुत मजबूत हैं । इनमें कुछ समुद्र किनारे हैं । बेचारा अफजलखां सेना लेकर जावली दुर्ग पर चढाई करने आया और व्यर्थ में मारा गया । यह घटना आप बादशाह को क्यों नहीं बताते ? अमीर उल उमरा शाइस्ताखां, इन गगनचुंबी पर्वतों और पाताल तक गहरी खाईयों में ३ वर्ष तक सडता रहा । शिवाजी को पराजित कर उसके प्रदेश पर शीघ्र अधिकार करता हूं, यह बादशाह को पत्र लिख-लिख कर थक गया । इसका फल उसे भोगना पडा । यह घटना सूर्यसमान सबके सामने है । अपनी भूमि की रक्षा करना मेरा कर्तव्य है और मैं यह कर्तव्य करना कभी नहीं छोडूंगा । कितना सुंदर है यह पत्र !
शिवाजीमहाराज का रक्षा मंत्रालय

शिवाजीमहाराज ने शून्य में से एक विराट संसार खड़ा किया | संसार से जाते समय वे स्वराज के संरक्षण और विस्तार के लिए एक बड़ा सैन्य साम्राज्य भी छोड़ गए| वे जब संसार से गए तब उन की सेना में १ लाख पदाति और ५ हजार घुड़सवार थे| तलवारों, बंदूकों, तोपों व अन्य शस्त्र सरंजामों का तो हिसाब ही नहीं था | अनुशासन, आज्ञापालन प्रशिक्षण व पराक्रम से भरी उनकी सेना समकालीन समय की, विश्व की किसी भी सेना से कम नहीं थी | अन्य सेनाओं में सैनिक पैसे या फिर व्यक्ति के लिए लढाई लढते थे, जबकि शिवाजीमहाराज की सेना के सैनिक (उनके मावळे) स्वराज के लिए लढते थे|
छत्रपति शिवाजीमहाराज ने राज्य की सम्पूर्ण व्यवस्था संचालन के लिए जिन विभागों की रचना की तथा उसमें योग्य लोगों की नियुक्ति की, वह रचना “अष्टप्रधान” नाम से प्रचलित हुई, जो उनके संसार के जाने के बाद भी लंबे समय तक चलती रहीI शिवाजीमहाराज ने अपने सहयोगियों पर भरोसा किया, उन पर कार्य की कसावट भी रखी और उन्हें विभिन्न प्रकार के काम सौंपकर उनकी योग्यता का स्वराज्य के लिए भरपूर उपयोग भी कियाI उनके रक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी पेशवा और सेनापति पर थी |
प्रधानमंत्री या पेशवा :
अष्टप्रधान मंडल में यह सबसे ऊपर का पद था | मुगलों के शासन में इसका समकक्ष पद वजीर-ए-आज़म था | ‘पेशवा’ फारसी शब्द था, जिसे शिवाजीमहाराज ने ‘मुख्य प्रधान’ या प्रधानमंत्री नाम दिया | राज्य स्थापना के समय शामराजपंत नीलकंठ रांजेकर प्रधानमंत्री थे | बाद में इस पद पर मोरोपंत पिंगले ने लंबे समय तक कार्य किया | महाराज के राज्याभिषेक के समय मोरोपंत ही प्रधानमंत्री थे |
सेनापति :
सेनापति याने संपूर्ण सेना की देखरेख करनेवाला मुख्य सेनापति, प्रारंभिक काल में यह पद ‘सरनौबत’ नाम से जाना जाता था | प्रमुख रूप से जिसके दो भाग थे एक पैदल सेना और दूसरी अश्व सेना | महाराज ने राज्याभिषेक के समय इस पद का नामकरण ‘सेनापति’ कर दिया | सेना में भरती, प्रशिक्षण, पदोन्नति, मानदेय, शस्त्र की व्यवस्था और रसद की आपूर्ति जैसे विभिन्न विभागों पर प्रशासनिक नियंत्रण करना और इस के बारे में महाराज को अवगत कराना, यह सेनापति के प्रमुख कार्य थे |
राज्य के प्रारंभिक काल में महाराज ने प्रथम सरनौबत पद पर नूर खान बेग को नियुक्त किया था | बाद में इस पद पर येसाजी कंक की नियुक्ति हुई | बाद में नेताजी पालकर, प्रतापराव गुजर की इस पद पर नियुक्ति की गई | महाराज के राज्याभिषेक के कुछ दिन पहले प्रतापराव बहलोल खान से हुए युद्ध में शहीद हुए तो महाराज ने इस पद पर हंबीरराव मोहिते को नियुक्त किया | महाराज के जाने के बाद पराक्रमी सेनापति संताजी घोरपड़े, धनाजी जाधव जैसे नायकों ने सालों तक औरंगजेब से युद्ध किया |
शिवाजीमहाराज युद्ध के पहले व बाद में अपने सभी सैनिकों से आत्मीयतापूर्वक मिलते थे | सेना में शस्त्र नहीं लड़ते, उसके पीछे खड़ा व्यक्ति लड़ता है और इस व्यक्ति के पीछे उसमें बसा मन और मस्तिषक लड़ता है | यह महाराज जानते थे, और इसी तरह वे अंत तक लड़ते रहे |
शिवाजीमहाराज का श्रम व रोजगार मंत्रालय

शिवाजीमहाराज की राज्य व्यवस्था में दो प्रकार के कर्मचारी थे – स्थायी और अस्थायी | इसमें बड़ी संख्या अस्थायी लोगों की थी, विशेषकर सेना में अधिकांश सैनिक वर्षाकाल के चार माह खेती करते थे और बाकी आठ माह सेना में सेवाएँ देते थे | वर्षाकाल में युद्ध संभव नहीं थे | नदी नालों में उफान व सड़क यातायात की असुविधा के कारण चारों तरफ शांतिकाल जैसा ही वातावरण होता था |
शिवाजीमहाराज के स्वराज में हर माह प्रतिपदा के दिन नकद पारिश्रमिक दिया जाता था | नियमितता का इसमें कठोरता से पालन होता था | आखिर में शिवाजीमहाराज की सेना में एक लाख पैदल सैनिक, एक लाख पाँच हजार घुड़सवार तथा पाँच हजार नौ सैनिकों को रोजगार प्राप्त था | प्रत्येक युद्ध के पश्चात सैनिकों को हुई व्यक्तिगत हानि के मूल्यांकन हेतु जख्म दरबार लगता था, जहाँ शिवाजीमहाराज स्वयं अथवा उनके द्वारा नियुक्त कोई पदाधिकारी एक एक व्यक्ति को हुए नुकसान का आकलन करता था | शहीदों की पत्नी को आधा पारिश्रमिक शेष जीवनकाल तक दिया जाता था, और गंभीर चोट में हर्जाना दिया जाता था |
आज्ञा-पत्र १३
वेतन व पुरस्कार
राज्य के कर्मचारियों को विवादों से ऊपर उठकर सदैव अच्छा वेतन देना चाहिए| अगर उन में से किसी एक या एक से अधिक कर्मचारी ने कोई अच्छा कार्य किया हो या वह किसी पारिवारिक समस्या से कष्ट पा रहा हो तो उसे पुरस्कार या सहायता देनी चाहिए, किंतु वेतन में असमानता नहीं लानी चाहिए| समान कार्यस्थल में कार्यरत कर्मचारियों में कोई विशेष कार्य करे तो उसे वेतन-वृद्धि न देते हुए पुरस्कार देना चाहिए, क्योंकि किसी एक की वेतनवृद्धि पर समान स्तर पर कार्य करनेवाले अन्य कर्मचारियों में भी वेतन-वृद्धि की अपेक्षा जन्म ले लेती है| उसके पूरा न होने पर उनमें असंतोष पनपता है| अंततोगत्वा किसी एक को ध्यान में रख बढ़ाया वेतन या तो उस स्तर पर कार्यरत सभी कर्मचारियों की वेतन-वृद्धि से पूर्ण होता है अथवा वह सारे तंत्र में अनावश्यक चर्चाओं को जन्म देता है, जिससे तंत्र कमजोर होकर टूटने लगता है|
अगर कोई कर्मचारी अच्छा कार्य करे तो उसकी पदोन्नति करनी चाहिए| इसमें कोई अवरोध भी नहीं बनेगा बल्कि उनके मन में यह भाव जागेगा कि अच्छा कार्य करने पर हमें भी पदोन्नति मिल सकती है| वेतन हमेशा नियमानुसार और पुरस्कार हमेशा कार्य की गुणवत्ता के आधार पर दिया जाना चाहिए|
आज्ञा पत्र १४
सेवा-नियुक्ति में सावधानियाँ
यदि कोई नया सेवक रखा जाता है तो उसके परिवार, निवास-स्थान, रिश्तेदार व पूर्व सेवा की जाँच की जानी चाहिए| वह ठगी, हत्या, नशाखोरी, अनैतिक व खुफिया कामों आदि में संलग्न पाया गया हो, अर्थात् उसका चरित्र साफ-सुथरा न हो तो उसे सेवा में नहीं रखना चाहिए| अच्छी छविवाले बहादुर लोगों को सदैव सेवा में रखना चाहिए, लेकिन किसी भी सैनिक अथवा सेवक को बगैर परखे नहीं रखना चाहिए|
शिवाजीमहाराज ने अपने राज्य में जागीर प्रथा कम कर मासिक वेतन की पद्धति लागू की थी| पारिश्रमिक भुगतान व श्रम संस्कृति के कुछ नियम बनाएँ गए थे,
१. वेतन बाँटते समय स्थानीय राजकोष में राशि कम पड़ने पर उस क्षेत्र के सूबेदार को श्रम भुगतान की जवाबदारी दी जाती थी |
२. प्रांत के सभी अधिकार सूबेदार के पास होते थे | सामान्य समाज में फ़ौज के सरदार का हुक्म नहीं चलता था |
३. मुहिम में पराक्रम करनेवालों को बड़ा दरबार सजाकर पुरस्कार दिए जाते थे |
शिवाजीमहाराज का भाषा व संस्कृति मंत्रालय
शिवाजीमहाराज ने राज्य व्यवहार में भाषा को विशेष महत्त्व दिया | राज्य संचालन में अपभ्रंशित व मिश्रित शब्दों के स्थान पर संस्कृतनिष्ठ मराठी शब्दों का चयन किया, उनका प्रयोग प्रारंभ करवाया और प्रयत्नपूर्वक उन्हें राज्य व्यवहार में स्थापित किया | स्वराज्य की शासन व्यवस्था के लिए उन्होंने १४०० शब्दों का कोष बनाया था | चयनित शब्दों को नाम दिया गया “राज्य व्यवहार कोश” |
शिवाजीमहाराज के अष्टप्रधान मंडल में पंत सचिव/ सुरनवीस नाम से एक मंत्री नियुक्त किए जाते थे | सुरनवीस अन्य राज्यों/देशो से पत्र व्यवहार करना, आवक जावक के पत्रों के निराकरण हेतु योग्य व्यक्तियों तक पहुँचाना यह कार्य करते थे |
पंत सचिव/ सुरनवीस
'सुरनवीस’ फारसी शब्द हैI इसका कार्य महाराजद्वारा निर्देशित सभी प्रकार के पत्र व्यवहार, अधिकार-पत्र व स्वीकृति पत्रों पर मुहर लगाकर उसका लेखा जोखा रखना था| सन् १६६५ में शिवाजीमहाराज ने नीलकंठ सोनदेव को पंत सचिव नियुक्त किया | महाराज ने राज्याभिषेक के समय इस पद पर अण्णाजी दत्तो की नियुक्ति की | शिवाजी महाराज की अनुमति से अन्य राज्यों/देशो से पत्र व्यवहार करना, आवक जावक के पत्रों के निराकरण हेतु योग्य व्यक्तियों तक पहुँचाना, आवक में प्राप्त महत्वपूर्ण पत्रों एवं संदेशों से महाराज को अवगत रखना, जावक के लिए तैयार होने पर पत्र के पृष्ठ भाग में ‘बार’ शब्द लिखने का सचिव को अधिकार थाI इसका अर्थ होता था कि अब यह पत्र भेजे जाने के योग्य है |
शिवाजीमहाराज ने स्वराज की स्थापना के साथ ही दुर्गों के पुराने नाम बदलकर नए संस्कृत नाम रखे; जैसे रायरी का रायगड, साकण का संग्राम दुर्ग, रोहिडा का विचित्रगड, तोरणा का प्रचंडगड और पट्टा का विश्रामगड इत्यादि| इसी तरह आज आवश्यकता है की शिवाजीमहाराज की तरह भाषा, साहित्य, संस्कृति व सांस्कृतिक मूल्यों को शासन एवं प्रशासन में स्थापित करने की, जिससे कि स्वराज्य का मन्त्र सिद्ध हो सके|
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