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जनवरी, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

प्रहलाद

एक क्रूर राक्षस था उसने ब्रह्मा से प्राप्त वर्ग के कारण उसे कोई भी मार नहीं सकता था उसकी मृत्यु घर में या घर के बाहर भी नहीं होगी दिन या रात में उसे मौत नहीं आएगी कोई अस्त्र भी या कोई शस्त्र अभी उसे नहीं मार सकेगा उसके मृत्यु ना काश में होगी ना ही पृथ्वी पर इस प्रकार के बड़ा वरदान प्राप्त करने के बाद वह बड़ा हंकरी और इस कारण सभी देवगढ़ मनुष्य डर से कांपने लगते थे इस ग्रुप राक्षस का नाम है हिरण्यकश्यप और इसी का पुत्र हुआ प्रहलाद इस इसी कारण गुरु शुक्राचार्य को प्रह्लाद उसका शिष्य होने का अभिमान था प्रह्लाद विचार में डूबा था कि राजा के सेवक वहां आए और उसे मोहल्ले गए पिता ने अपने पुत्र को बड़े प्यार से पास बुलाया वह जानना चाहता था कि पुत्र ने क्या सीखा है हिरण्यकश्यप ने प्यार से प्रहलाद अपनी गोद में लिया और पूछा बेटा तुमने अपने गुरुजनों से क्या सीखा प्रहलाद ने उत्तर दिया पिताजी हमें सिखाते हैं कि एक व्यक्ति मेरा मित्र है दूसरा दुश्मन अच्छा नहीं लगता मैं जाना चाहता हूं वहां मैं भगवान श्रीहरि का ध्यान करूंगा उनको लगा कि कोई उसे कांतिल हिरण्यकशिपु ने गुरुजनों को बुलावा भेजा और कहा कि आपकी सा...

ध्रुव

उत्तानपाद नाम का एक राजा प्राचीन काल में हो गए उसकी दो रानियां थी बड़ी का नाम सुनीति और छोटी का सुरुचि राजा को छोटी रानी सुरुचि अधिक विर्य थी अत्यंत प्रेम करने के कारण राजा भी उचित अनुचित का विचार किए बिना उसकी सभी बातों को स्वीकार कर देते थे सुनीति विनम्र शब्दों और अच्छे स्वभाव की थी वहां योग्य योग्य उचित अनुचित आदि का विचार करके ही काम करती थी स्वभाव से धीर गंभीर थी राजा सुरुचि के हाथ की कठपुतली थे सुनीत के पुत्र का नाम ठाकरे ध्रुव ध्रुव महल में नहीं रह सकता राज्य का उत्तराधिकारी सुरुचि का पुत्र उत्तम बने यह उसके मन में रहता था इसलिए ध्रुवा सुनती को महल में नहीं रहने देती थ बड़ी रानी होते हुए भी वह सामान्य लोगों की तरह जीवन व्यतीत कर रही थी राजा उत्तानपाद ने उसे कभी विचार नहीं किया छोटा बालक चाहता है कि उसे माता-पिता उसे प्यार करें क्या यह सच है ना ध्रुव को मां का प्रेम मिला था पर पिता का प्रेम उन्हें नहीं मिला 1 दिन ध्रुव खेलते खेलते महल में चला गया उस समय वह 5 वर्ष का था राजा सुरुचि और उत्तम के साथ रत्ना जड़ित 66 में बैठे थे उसने उत्तम को पीता की गोदी में बैठे देखा यह देखकर उसने भी...

गौतम बुद्ध

प्राचीन समय की बात है शाक्य गणराज्य का शुद्धोधन राजा थे मायावती और गौतमी से उनका विवाह हुआ था एक बार आषाढ़ पूर्णिमा की रात मायावती अपने महल में मनचक पर गाड़ी निद्रा में लीन थी नींद नहीं उसके चेहरे पर भी नवीन भाव के रजिस्ट्री कोचर हो रहे थ वह नींद में स्वप्न देखने लगी जब सपना समाप्त हुआ बोर हो चुकी थी स्वप्ना देखकर व प्रसन्नता का अनुभव कर रही थी सपने में उसने देखा एक छोटा हाथी सुब्रमण्य का पहाड़ से उतरकर मेरी ओर आने लगा जैसे-जैसे वह मेरे निकट पहुंचने लगा मुझे तो उसका डर लगने लगा उस हाथी के स्कूल में एक पेज कमल था अपना पहाड़ सा विशाल रूप त्याग करेक्शन सुषमा होकर मेरी दाहिनी और कोख में प्रविष्ट हुआ कुछ दिन बाद रानी ने गर्भधारण किया और 9 माह पूरे होने पर राजा ने उसने पीहर भेजने का प्रस्ताव दिया राजा ने त्वरित रूप से पीहर भेजने की व्यवस्था की मायावती का पिया था खोलिए राजा का देवत नगर कपिलवस्तु और देवत के बीच लुमिनी नामक एक रमणीय उपवन था वह पहला पड़ाव था वहीं पर मायावती को तीव्र प्रसव वेदना का अनुभव हुआ उस ने एक बालक को जन्म दिया राजा मायावती को कपिलवस्तु वापिस ले गया बाल आपका नामकरण सिद्धार...

वीर हकीकत राय

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धर्मवीर हकीकत राय….  *वीर हकीकत राय का जन्म 1720 में सियालकोट में लाला बागमल पुरी के यहाँ हुआ था । इनकी माता का नाम कोरा ( गौरा ) था। लाला बागमल सियालकोट के तब के प्रसिद्ध सम्पन्न​ हिन्दू व्यापारी थे। वीर हकीकत राय उनकी एकलौती सन्तान थी। उस समय देश में बाल विवाह प्रथा प्रचलित थी,क्योकि हिन्दुओ को भय रहता था कि कहीं मुसलमान उनकी बेटियो को उठा कर न ले जाये। जैसे आज भी पाकिस्तान और बांग्लादेश से समाचार आते रहते है। इसी कारण से वीर हकीकत राय का विवाह बटाला के निवासी किशन सिंह की बेटी लक्ष्मी देवी से बारह वर्ष की आयु में कर दिया गया था।* उस समय देश में मुसलमानो का राज था। जिन्होंने देश के सभी राजनितिक और प्रशासिनक कार्यो के लिये फ़ारसी भाषा लागू कर रखी थे। देश में सभी काम फ़ारसी में होते थे। इसी से यह कहावत भी बन गई कि , ” हाथ कंगन को आरसी क्या,और पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या”। इसी कारण से बागमल पुरी ने अपने पुत्र को फ़ारसी सिखने के लिये मौलवी के पास उसके मदरसे में पढ़ने के लिये भेजा। कहते है और जो बाद में सिद्ध भी हो गया कि वो पढ़ाई में अपने अन्य सहपाठियों से अधिक तेज था, जिससे  मुसलमान बालक...

खारवेल

बहुत पुरानी बात है लगभग 23 वर्ष पूर्व की कलिंग और मगध दो शक्तिशाली राज्य थे एक शताब्दी तक लगातार युद्ध चलता रहा इनके बीच में कलिंग की पराजय हुई और वह मगध को सबक सिखाने के लिए अवसर की प्रतीक्षा करने लगा कलिंग के राजा को एक धक्का देने वाला समाचार यह मिला की यवन ग्रीक यूनानी राजा विदेश से आकर सेना सहित मगध की ओर बढ़ रहा है मगध के लोगों ने 9 वर्ष पूर्व कलिंग को पराजित अपमानित किया था यदि कलिंग के राजा ने आक्रमण का स्वागत किया होता यदि वह सोचता इसने शत्रु को मगध के राज्य को पराजित करने दो बदला लेने की मेरी इच्छा पूर्ण हो जाएगी यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया हो सकती थी मगर उन्होंने ऐसा नहीं सोचा राजा के विचार अलग थे मगध पर आक्रमण है कल वह हमारा भी शत्रु हो सकता है इस संकट की घड़ी में दोनों लोगों ने हाथ मिला लिया और अपनी बुद्धिमानी का परिचय देते हुए विदेशी आगरा आक्रमण को दूर खदेड़ दिया व राजा का नाम था खारवेल भारत के इतिहास में इस कालखंड में अनेक स्वतंत्र राज्य थे अंग मगध कलिंग सातवाहन चोल पांडेय उत्तरापन इत्यादि एक दूसरे से सब किया युद्ध होता ही रहता था जो राजा शक्तिशाली होता था वह कमजोर राज्य पर...

त्यागराज

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त्यागराज जन्म : 4 मई, 1767 तंजावुर (तमिलनाडु) भारत मृत्यु : 6 जनवरी, 1847 कार्यक्षेत्र : संगीत, कविता तथा भक्ति साहित्य की रचना करना त्यागराज ‘कर्नाटक संगीत’ के सबसे बड़े प्रतिपादकों में एक थे. ये ‘कर्नाटक संगीत’ के महान ज्ञाता तथा भक्ति मार्ग के एक प्रसिद्ध कवि थे. इन्होंने भगवान श्रीराम को समर्पित भक्ति गीतों की रचना की थी. इनके सर्वश्रेष्ठ गीत अक्सर धार्मिक आयोजनों में गाए जाते हैं. त्यागराज ने समाज एवं साहित्य के साथ-साथ कला को भी समृद्ध किया. इनकी विद्वता इनकी हर कृति में झलकती है और ‘पंचरत्न’ कृति को इनकी सर्वश्रेष्ठ रचना कहा जाता है. कहा तो यह भी जाता है कि त्यागराज के जीवन का कोई भी पल भगवान श्रीराम से जुदा नहीं था. ये अपनी अलग-अलग कृतियों में भगवान राम के साथ अपना अलग-अलग व्यक्तिगत सम्बन्ध बताते थे, जैसे- कभी मित्र, कभी मालिक, कभी पिता और कभी सहायक. जो कुछ भी त्यागराज ने रचा है, वह सब कुछ अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में है. उसमें प्रवाह भी ऐसा है जो संगीत प्रेमियों को अपनी ओर अनायास ही खींच लेता है. आध्यात्मिक रूप से त्यागराज उन लोगों में से थे, जिन्होंने भक्ति के सामने किसी बात की पर...

श्रीमध्वाचार्य

700 साल पहले की बात उत्तर भारत के कई स्थानों में इस्लाम पर जमा चुका था गंगा नदी के उस पार जलालुद्दीन खिलजी का अधिकार था इस्लामी सैनिकों का कड़ा पहरा था नदी पार करने नवका भी नहीं थी डर था कि कहीं इस तरह हिंदू राजाओं की गुप्तचर घोषणा पढ़े गंगा के इस पार नदी किनारे एक सन्यासी अपने शिष्य परिवार के साथ खड़े थे आगे बढ़ने का रास्ता बंद सामने गहरी नदी शिष्यों में आतंक छा गया शिष्यों की चिंता गुरु को मालूम हुई उन्होंने सांत्वना देते हुए कहा डरने का कोई कारण नहीं हर सांसारिक नदी पार कर चुके हैं इसलिए गंगा नदी पार कर सकते हैं गुरु के पीछे सारे शिष्य धैर्य के साथ पानी में उतर पड़े सैनिकों ने देखा और उन्हें गुप्तचर समझने लगे तो सन्यासी ने कहा रुको डरने की आवश्यकता नहीं हम लोग सन्यासी हैं हम तुम्हारे बादशाह से मिलने के लिए ही आ रहे हैं हमारे पास कोई हथियार नहीं है फिर भी सैनिकों ने तलवार लेकर उन्हें घेर लिया और उन्हें महल की ओर ले करके क्या है बादशाह ने उन्हें देखा तो है आश्चर्य हुआ सेना की कड़ी निगरानी से बचकर राज्य की सीमा में यह हिंदू वैरागी कैसे प्रवेश कर सके और सेना उनके पीछे-पीछे सहारा देते हु...

श्रीनिवास रामानुजन

श्रीनिवास रामानुजन एक भारतीय गणितज्ञ थे रामानुजन का जन्म 22 दिसंबर 18 87 को कोयंबटूर तमिलनाडु के इरोड नाम के गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ पिता श्रीनिवास अयंगर कपड़े की दुकान में साधारण नौकरी करते थे 5 वर्ष की आयु में रामानुजन को एक सामान्य पाठशाला में दाखिल कराया गया 2 वर्ष बाद वह कुंभकोणम के टाउन हाई स्कूल में जाने लगा इतनी छोटी आयु में उसके मस्तिष्क में यह प्रश्न घूमता रहता था की गणित का सबसे बड़ा सत्य कौन सा है एक बार उस कक्षा में एक रोचक घटना घटी शिक्षक समझा रहे थे मान लो तुम्हारे पास पांच फल है और तुम्हें वह पांच फल लोगों के बीच बांटने हो तो प्रत्येक को एक ही फल मिलेगा मान लो 10 फल है वह 10 लोगों में बांटने हो तो भी प्रत्येक को एक ही फल मिलेगा अर्थात 5 हो या 10 किसी भी संख्या को उसी संख्या में भाग देने पर एक ही आता है यही गणित का यही गणित का नियम है शिक्षक ऐसा कहते ही रामानुजन तत्काल उठे और प्रश्न किया गुरुजी यदि हम 0 फल 0 लोगों के बीच बांटे तो क्या तब भी प्रत्येक इस समय एक फल आएगा यह प्रश्न सुनकर शिक्षक भी चकरा गए दसवीं कक्षा में पढ़ते हुए उसने b.a. के पाठ्यक्रम में निर्धा...

भीष्म पितामह

द्वापर युग में सुप्रसिद्ध चंद्रवंशी राजाओं का राज्य था राजा शांतनु सर्वाधिक प्रसिद्ध थे इनकी राजधानी हस्तिनापुर थी उनका विवाह गंगादेवी से हुआ था सुंदरता में अद्वितीय थी देवव्रत नामक पुत्र को जन्म दिया बाद में गंगा देवी पृथ्वी पर नहीं लौटी देवव्रत में एक अच्छे राजा के सभी सद्गुण थे उचित समय आने पर राजा शांतनु ने उसे युवराज घोषित कर दिया 1 दिन राजा शांतनु अपने साथियों के साथ शिकार खेलने गए जमुना नदी किनारे डेरा डाला राजा शांतनु अकेले जंगल में निकल पड़े एक सुगंधित हवा का झोंका दूर से आने का महसूस हुआ और राजा उस और चल पड़े को सुगंध एक लड़की के शरीर से फैल रही थी उसकी सुगम से आसपास का एक योजन 9 मील का क्षेत्र महक रहा था इसलिए उसका नाम योजनगंधा के नाम से विख्यात था हालांकि उसके पालक होने उसका नाम सत्यवती रखा राजा ने उससे पूछा तो उसने कहा मैं मछुआरा के मुखिया दशरथ की पुत्री हूं मुझे सत्यवती कहते हैं राजा शांतनु के दिल में उसके प्रति प्रेम पैदा हो गया वह उससे विवाह करना चाहते थे विवाह के प्रस्ताव सुनकर लड़की शर्मा गई और काहे महामहिम मेरे पिता भी हैं यदि वो राजी हो जाए तो आप मुझसे विवाह कर सकते...