भीष्म पितामह
द्वापर युग में सुप्रसिद्ध चंद्रवंशी राजाओं का राज्य था राजा शांतनु सर्वाधिक प्रसिद्ध थे इनकी राजधानी हस्तिनापुर थी उनका विवाह गंगादेवी से हुआ था सुंदरता में अद्वितीय थी देवव्रत नामक पुत्र को जन्म दिया बाद में गंगा देवी पृथ्वी पर नहीं लौटी देवव्रत में एक अच्छे राजा के सभी सद्गुण थे उचित समय आने पर राजा शांतनु ने उसे युवराज घोषित कर दिया 1 दिन राजा शांतनु अपने साथियों के साथ शिकार खेलने गए जमुना नदी किनारे डेरा डाला राजा शांतनु अकेले जंगल में निकल पड़े एक सुगंधित हवा का झोंका दूर से आने का महसूस हुआ और राजा उस और चल पड़े को सुगंध एक लड़की के शरीर से फैल रही थी उसकी सुगम से आसपास का एक योजन 9 मील का क्षेत्र महक रहा था इसलिए उसका नाम योजनगंधा के नाम से विख्यात था हालांकि उसके पालक होने उसका नाम सत्यवती रखा राजा ने उससे पूछा तो उसने कहा मैं मछुआरा के मुखिया दशरथ की पुत्री हूं मुझे सत्यवती कहते हैं राजा शांतनु के दिल में उसके प्रति प्रेम पैदा हो गया वह उससे विवाह करना चाहते थे विवाह के प्रस्ताव सुनकर लड़की शर्मा गई और काहे महामहिम मेरे पिता भी हैं यदि वो राजी हो जाए तो आप मुझसे विवाह कर सकते हैं राजा शांतनु दसराज के पास मिलने पहुंचे और विवाह के विषय में प्रस्ताव रखा 10 राज्य को आश्चर्यचकित हुआ और उसने बड़ी कठिनाई से कहा महाराजाधिराज सत्यवती मेरी बेटी है मुझे उसके सुख की चिंता है समय आने पर आखिर युवराज तो राजा बनेंगे यदि मेरी बेटी का पुत्र राजा बन सकता है तो मैं तैयार हो जाऊंगा देशराज मुझे अपने पुत्र देवव्रत पर गर्व है ऐसा शांतनु ने कहा पर उसके प्रेम ने उसे विवश चैनसुख समाप्त हो गए थे इसलिए शिकार खेलना छोड़ दिया चेहरा पीला पड़ गया और किसी से बात नहीं कर रहे थे देवव्रत ने देखा कि उसकी पिता का हालात खराब होते जा रहे हैं तो उसके कारण जानना चाहा पिता ने कहा तुम इसकी चिंता मत करो पर वह चेंज नहीं बैठे उसने देखा कि शांतनु कुछ छुपा रहे हैं आखिर वह क्या है बाद में सारथी को बुलाया सारथी के जरिए देवव्रत को सारी घटनाओं की जानकारी मिल गई देवराज सत्यवती के पिता के पास पहुंच गए और वहां कुछ प्रस्ताव रखें मेरे पिता मेरे लिए ईश्वर है मैं राजगद्दी छोड़ दूंगा यह मेरी प्रतिज्ञा है और मैं इस पर अटल रहूंगा तोरा देशराज ने कहा आपका पुत्र मेरी कन्या के पुत्र संघर्ष कर सकता है ऐसी स्थिति में क्या हो गया सुनकर देवरा जोरो से हंस पड़ा देवव्रत ने कहा मेरी शपथ सुनिए पृथ्वी माता सूर्य और चंद्रमा मेरी गवाही है मैं अपने बालकों के नाम पर प्रतिज्ञा करता हूं कि मैं कभी विवाह नहीं करूंगा जिस प्रकार सत्यवती का शांतनु के साथ विवाह हुआ प्रसन्नता पूर्वक अपना जीवन यापन करने लगे सत्यवती के 2 पत्र हुए जिनका नाम था चित्रांगद और विचित्रवीर्य कुछ समय बाद शांतनु का देहांत हो गया सत्यवती शोक में डूब गई समय के साथ साथ चित्रांगद बड़ा हो गया 20 महीने सत्यवती के पास पहुंचे और कहा मां चित्रांगद और शासन शासक बनने योग्य होगे तो चित्रांगद को राजा बनाओ चित्रांग का राजतिलक हो गया जिसमें के निर्देशन में उसने शासन नया काम प्रारंभ किया किंतु अधिक समय तक शासन नहीं कर पाया शत्रुओं का सामना करते हुए युद्ध क्षेत्र में वीरगति को प्राप्त हो गया सत्यवती बहुत दुखी हुई विचित्रवीर्य की आयु विवाह योग्य हो चुकी थी भीष्म ने सोचा कि काशी नरेश की 3 कन्याओं का विवाह उसके साथ होना चाहिए रांची रांची 30 थी भीष्मा काशी गए स्वयंवर चल रहा थ विष्णु ने अपने पुत्र के लिए तीनों राजकुमारियां को जीत लिया उसमें से अंबानी अपनी इच्छा के अनुसार साल भर के राजकुमार से शादी करने की इच्छा व्यक्त की तो उसे उन्होंने छोड़ दिया अंबिका और अंबालिका को ले करके अपने विचित्रवीर्य से विवाह कराया बाद में अंबिका ने एक पुत्र को जन्म दिया जो जन्म से नेत्रहीन था वह धृतराष्ट्र कहलाए अंबे अंबालिका से भी एक पुत्रवधू पांडु का हल है धृतराष्ट्र का विवाह गांधारी से हुआ जिससे एक सौ पुत्र और एक पुत्री को जन्म दिया यह पुत्र कौरव कहलाए पांडु ने कुंती और माधुरी से विवाह किया कुंती से 3 पुत्र हुए जिनके नाम थे युधिष्ठिर भीम और अर्जुन माधुरी से 2 पुत्र नकुल और सहदेव हुए यह पांडव कहलाए भीष्म ने पांडवों को राष्ट्रीय आसन पर बैठाया पर वे अधिक समय जीवित नहीं रहे बाद में धृतराष्ट्र शासन पर बैठे दुर्योधन भीम और अर्जुन से ईर्ष्या करता था द्रौपदी के स्वयंवर में दुर्योधन भी उपस्थित थे भीम का नाम मात्र सुन लेने से उसे जहर के समान मालूम होता था पांडवों और कौरवों के बीच यह तीव्र कटुता देखकर भी इसमें बहुत दुखी रहते थे इंद्रप्रस्थ में पांडवों के लिए एक दूसरी राजधानी का निर्माण किया और युधिष्ठिर को अपने साम्राज्य का आधा भाग सौंप दिया ताकि पांडा वहां शांति से रह सके युधिष्ठिर बहुत लोकप्रिय हुए उन्होंने भगवान कृष्ण ने मदद से बड़े पैमाने पर राजसूय यज्ञ की योजना किया शकुनि ने दुर्योधन को सलाह दी कि वह डिस्ट्रिक्ट जुआ खेलने के लिए आमंत्रित करें और उसे हरा दे युधिष्ठिर जुए के खेल में एक के बाद एक बाजी हार के चले गए उन्होंने जो कुछ भी दांव लगाया उसे ही वे खो बैठे अपनी धन दौलत हीरे जवाहरात को बैठे अपना साम्राज्य हार बैठे अपने भाइयों को खो दिया खुद को भी दांव पर लगाकर बाजी हार बैठे और अंत में उन्होंने अपनी पत्नी दो पति को भी खो दिया उन्हें 12 वर्षों तक जंगलों में रहना पड़ा 13 वर्ष यदि कोई उन्हें पहचान लेता तो पुनः 12 वर्ष जंगलों में रहना पड़ता है और 1 वर्ष का अज्ञातवास पूरा करना पड़ता है दिन पांडे ईमानदार और सच्चे थे उन्होंने वनवास और अज्ञातवास के 13 वर्ष पूर्ण किए इसके बाद भी दुर्योधन ने पांडवों को उनका राज्य नहीं लौटाया बाद में यह सलाह लेकर निश्चय किया कि दुर्योधन के पास पहुंचकर अनुरोध किया जाए कि उसका राजपाट लौटा दे भगवान श्री कृष्ण के प्रतिनिधि बनकर जाने के लिए तैयार हुए तब दुर्योधन ने अपनी मूंछों पर बार-बार कह देते रहे आशिक हंसी उड़ाता रहा उसने घमंड से कहा कृष्ण आखिरकार तुम एक चरवाहा ठहरे पांडव के घर बार भिखारी हैं सुनी और मेरे शब्द पर ध्यान दीजिए मैं पांडव को एक सुई की नोक के बराबर भी जमीन नहीं दूंगा उन्हें लड़कर अपना लेने दीजिए बाद में युद्ध प्रारंभ फुआ दुर्योधन ने विश्व को प्रधान सेनापति बना दिया करण को रास नहीं आया तो भीष्म ने प्रतिज्ञा ली यदि मैं प्रतिदिन सूर्यास्त के पहले 10000 लोगों को वध करने में असफल रहा तो मैं बीच में नहीं और श्री कृष्णा को सुदर्शन चक्र का सहारा लेने पर बाद देना कर दूं तुम्हें भी इसमें नहीं यदि मैं हनुमान की ध्वज वाले अर्जुन के रथ के पीछे धकेल दूं तो मैं बीच में नही करण भी कहता है कि जब तक भीष्म जीवित है संघर्ष नहीं करेंगे भीष्म की सेना 11 अक्षरों ली थी एक अक्षौहिणी में 21870 रथ 65610 घोड़े और 109350 पैदल सैनिक रहते थे कुरुक्षेत्र में पांडवों की सेना से भिंडर हुई 2 दिन तक भीष्म ने प्रतिदिन शाम होने के पहले पांडवों की सेना के 10000 सैनिकों का वध किया तीसरे दिन अर्जुन ने भीष्म का सामना किया 20 महीने सोचा कि अर्जुन की सफलता का रहस्य से कृष्ण की उपस्थिति है इसलिए आज उनका श्री कृष्ण चालक करना होग परशुराम द्वारा दिया गया बाण उठाकर श्री कृष्णा के मस्तक पर चला दिया व श्रीकृष्ण के मस्तक में काफी गहरा धंस गया श्री कृष्ण ने जब उस मानव खींचकर बाहर बाहर निकाला तो खून का फव्वारा छूट पड़ा जिससे खून से लथपथ हो गए उनके कृष्णा को क्रोध आ गया मेरठ से कूद पड़े उनके हाथ में चक्र था और चिल्ला रहे थे मैं भीष्मा को मार डालूंगा श्री कृष्ण ने शपथ ली कि वह चक्र धारण नहीं करेंगे किंतु इस अवसर पर वे अपनी शपथ भूल गए इसमें भी अपने रब से कूद पड़े और उन्होंने धनुष बाण फेंक दिया और उसे विष्णु की स्तुति में लगे उनकी भक्ति देखकर कृष्णा बहुत खुश हुए चक्र वापस बुला लिय यह लड़ाई 9 दिनों तक चली युधिष्ठिर काफी निराश हो गए श्री कृष्ण ने कहा कि सफलता के एकमात्र मार्ग है कि स्वयं विश्वसई निर्देश प्राप्त किया जाए उस रात भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को गुप्त रूप से भीष्म के पास ले गए भगवान कृष्ण ने कहा महा मना कौरव और पांडव आपकी दोनों नाती हैं आपने ही पांडवों का लालन-पालन किया है वे न्याय प्रिय सद्गुणी है उन्होंने अपना वचन पूरा किया दुर्योधन ने उनका राज्य नहीं लौट आया इसलिए अब आप उनकी रक्षा करने का कर्तव्य करें भीष्म कारों के साथ थे किंतु उनके साथ उनका शरीर था ह्रदय तो पांडवों के साथ था उन्होंने उपाय बताया कि तू मेरे सामने किसी स्त्री को खड़ा कर दो तो मैं अपना धनुष बाण फेंक दूंगा मैं नहीं लड़ूंगा 20 मतों का कृष कृष्णा जानते थे की शिखंडी और कोई नहीं वही अंबा है जिसके साथ विवाह करने से उन्होंने इंकार कर दिया थ भीष्म शिखंडी को पुरुष नहीं मानते थे इस कारण उसे संघर्ष करना भी नहीं चाहते थे इस प्रकार युग चलता रहा अर्जुन का बाण जिस्म पर दनादन बरसते गए और उस बाणों से क धरती पर गिरे विष्णु को प्यास लगी उन्होंने जल मांगा तो अर्जुन के बाण से ही जल्द उन्हें प्राप्त हुए
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