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व्यक्तिगत गीत

गीत  १.अगर हम नही  २.अनेकता में ऐक्य मंत्र को  ३.अरुणोदय हो चुका  ४.जननी जगन्मात की  ५.जहाँ दिव्यता ही जीवन है ६.जाग उठा है आज देश का  ७.दिव्य ध्येय की ओर तपस्वी  ८.नवचैतन्य हिलोरे लेता,  ९.भारत हमारी माँ है  १०.मन समर्पित, तन समर्पित ११.मातृ-मंदिर का समर्पित दीप मै १२.वसुन्धरा परिवार हमारा  १३.साधना का पथ कठिन है  १४.स्वयं प्रेरणा से  १५.हम युवा है  १६.अंतर्मन के भाव संजोकर १७.देश उठेगा अपने पैरो  १८.लोकमन संस्कार करना  १९.जिसने मरना सीखा २०.जीवन दीप जले २१.तुमने सोता देश २२.पथ का अन्तिम लक्ष्य २३ माँ बस यह वरदान २४.राष्ट्रदेव का ध्यान  २५.संघ ह्रदय में धार चुके अब २६.साधना का दीप ले निष्कम्प हाथों २७.हम केशव के अनुयायी २८.है वही पुरुषार्थी  अगर हम नही देश के काम आए धरा क्या कहेगी गगन क्या कहेगा ॥  चलो श्रम करे आज खुद को सँवारें युगों से चढी जो खुमारी उतारें अगर वक्त पर हम नहीं जाग पाएं सुभा क्या कहेगी पवन क्या कहेगा ॥ अधुर गन्ध का अर्थ है खूब महके पडे संकटों की भले मार सहके अगर हम नहीं पुष्प सा म...

बस्तर के क्रांति दूत 10

बस्तर के क्रांति दूत :- दशम पुष्प महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी तथा प्रफुल्ल चंद्र भंजदेव की दूसरी संतान “प्रवीरचंद्र भंजदेव” जो बस्तर रियासत काल के आखरी शासक हुए, इनका जन्म 25 जून 1929 को हुआ। इनकी माता महारानी प्रफुल्ल कुमारी जो कि बस्तर की महिला शासिका थी, उनकी असमय और रहस्यमय निधन के पश्चात लंदन में ही ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधियों द्वारा 6 वर्षीय प्रवीरचंद्र भंजदेव का औपचारिक राजतिलक कर दिया गया। बारह साल बाद जब प्रवीर 18 साल के हो गए तब उन्हें पूर्ण रूप से राज्याधिकार दे दिए गये। इसी साल सरदार वल्लभ भाई पटेल ने छत्तीसगढ़ के सभी चौदह रियासतों से बातचीत कर भारतीय संघ में विलयन के लिए दस्तखत करवा लिए। 15 अगस्त को भारत स्वतन्त्र हुआ और 1 जनवरी 1948 को बस्तर रियासत आधिकारिक रूप से भारतीय संघ के अंतर्गत मध्य प्रान्त का हिस्सा हो गया। राजशाही सत्ता के समर्पण के बाद जेहन में जो दर्द था वो दोगुना हो गया जब 13 जून 1953 को उनकी सम्पत्ति कोर्ट ऑफ वार्ड्स के अंतर्गत ले ली गयी। हालांकि अब भारत एक संघीय राष्ट्र हो गया था पर तब भी बस्तर की आदिवासी जनता प्रवीर चंद्र को ही...

बस्तर के क्रांति दूत 9

बस्तर के क्रांति दूत :- नवम पुष्प  आयतु माहरा भूमकाल आन्दोलन के कई महत्वपूर्ण नायक लगभग भुला दिये गये हैं जिनमे से एक थे आयतु माहरा। भूमकाल के योजनाकारों ने उसे अंतागढ़ और निकटवर्ती क्षेत्रों में विद्रोह का नेतृत्व करने का दायित्व सौंपा था। सरकारी दस्तावेजों (फॉरेन सीक्रेट, अगस्त 1911) में यह विवरण मिलता है कि आयतु के नेतृत्व में छोटे डोंगर के पूर्व का भाग और उसके आगे दक्षिण में चिंतलनार से सुकमा तक की पट्टी में विद्रोहियों ने व्यापक संघर्ष किया था। आंदोलन के आरम्भ के साथ ही आयतु के पास उसका पहला लक्ष्य था अंतागढ़। विद्रोही हथियारों को लहराते हुए अंतागढ़ में घुसे। देखते ही देखते वहाँ का एक मात्र स्कूल भवन और थाना जला दिया गया। इसके पश्चात आयतू ने नारायणपुर जेल पर हमला कर दिया। सभी कैदी मुक्त करा लिये गये। अंग्रेज सैन्य अधिकारी कैप्टन डूरी माड़ियाओं के इस विद्रोह को अबूझमाड़ में दबाने का प्रयास कर रहा था। 5 मार्च 1910 को छोटे डोंगर के पास डूरी घात लगा कर बैठा था। विद्रोहियों की टोह पाते ही अचानक, आठ से दस राउंड़ गोलियाँ चली; तीन विद्रोही ढ़ेर हो गये। डूरी ने अचानक नगाडों की आवाज़ सुनी। समुच...

बस्तर की क्रांति दूत 8

बस्तर की क्रांति दूत :-  अष्टम पुष्प अमर शहीद हूंगा मांझी मांझी बस्तर की क्रांति में अनेकों युद्ध हुए जिसमें खडग घाट का युद्ध बस्तर के इतिहास में विशेष महत्व रखता है।  यह युद्ध आदिवासियों ने 16 फरवरी 1910 ने 16 फरवरी 1910 को हूंगा मांझी और गुंडाधुर के नेतृत्व में अंग्रेजों के साथ इंद्रावती के खड़क घाट में लड़ा था । हूँगा मांझी और गुंडाधुर के नेतृत्व में 50000 आदिवासी अंग्रेजों से युद्ध करने के लिए इंद्रावती नदी के खडग घाट पर एकत्र हुए थे । क्रांतिकारी आदिवासी जगदलपुर की बाहरी सीमा पर अंग्रेज सेना को घेरना चाहते थे ।उन दिनों इंद्रावती नदी पर पूल का अभाव था बस्तर के पूर्व अंग्रेज प्रशासक गेयर आदिवासियों को पांच दलों में योजनाबद्ध तरीके से एकत्रित देख आश्चर्यचकित हो गया ।  धूर्त गेयर ने ने आदिवासियों को यह झूठा आश्वासन दिया कि वह उनसे लड़ने के लिए फौज नहीं लाया है ।वह पूर्व की तरह उनके दुख दर्द को जानने के लिए आया है ।अंग्रेजों से लड़ने के लिए तैयार आदिवासियों ने गियर की बातों पर विश्वास किया और वह गियर द्वारा लाई गई कार को देखने में मगन हो गए देखने में मगन हो गए हो गए। ...

बस्तर के क्रांति दूत 5

बस्तर के क्रांति दूत :-  पंचम पुष्प वन पुत्र नागुल दोरला प्राचीन समय से वन बस्तर रियासत का महत्वपूर्ण संसाधन रहा है ।बस्तर के आदिवासियों के लिए वन एवं वन्य उपज उनकी आजीविका का प्रमुख साधन रही है ।दक्षिण बस्तर में अंग्रेजों की शोषण व गलत वन नीति से आदिवासी काफी असंतुष्ट थे । कालांतर में दक्षिण बस्तर के आदिवासियों में अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह की भावना जागृत हुई । अंग्रेजों द्वारा साल के वृक्ष को काट कर बेचते थे। यह बस्तर के लोगों के साथ धोखा था । इसलिए  अंग्रेजो के खिलाफ आदिवासियों ने 1859 ईसवी में विद्रोह के झंडे को फहरा दिया। ‌ बस्तर के इतिहास में यह विद्रोह कोई विद्रोह के नाम से प्रसिद्ध है । नागुल दोरला फोतकेल, जमीदारी का जमीदार था । ‌बस्तर में ब्रिटिश सरकार की वन नीति एवं यहां की वनों  का ठेका हैदराबाद के व्यापारियों को दिए जाने के विरुद्ध नागुल दोरला को भोपालपटनम के जमीदार राम भाई और भेजी के जमीदार जुग्गाराजू को अपने पक्ष में कर विद्रोह कर दिया । ‌फोतकेल ,भेजी और भोपालपटनम के डंडामी ‌ माड़ियाओ को उस समय कोई कहा जाता था। ‌ इसलिए यह विद्रोह कोई विद्रोह के नाम से प्रसिद्...

बस्तर की क्रांति दूत 7

बस्तर की क्रांति दूत :-  सप्तम पुष्प क्रांति नेत्री स्वर्ण कुँवर अंग्रेजों के शासन काल काल में कई प्रकार के अत्याचार किए गए उसने सबसे बड़ा अत्याचार था आदिवासियों का उत्पीड़न व बस्तर के दोहन, इसके विरुद्ध ही सारी लड़ाइयां लड़ी गई।  राजमाता स्वर्ण कुँवर बस्तर के पूर्व राजा भैरव देव की की दूसरी रानी थी ।वे बस्तर आंदोलन को मार्गदर्शन देने वाली प्रमुख नेत्री थी। लगभग सभी लड़ाईओं में उनका मार्गदर्शन होता था ।तथा क्रांतिकारियों को सभी प्रकार से सहायता व उचित सुझाव  देते थे । बस्तर में पर्यावरण को सुरक्षित रखने में उनकी बड़ी भूमिका है ।कई स्थानों पर उन्होंने वृक्षारोपण करवाएं नींबू ,आंवला जैसे अनेकों पेड़ व वृक्ष लगवाए । अतः हम कह सकते हैं कि वे एक प्रयोग पर्यावरण प्रेमी थी। क्रांतिकारियों में उत्साह और उमंग जगाने वाली राजमाता को कई संघर्षों के बाद अंग्रेजों ने बंदी बना लिया तथा उन्हें रायपुर के जेल में भेज दिया भेज दिया । जहां अक्टूबर 1910 में उनकी मृत्यु हो गई।  वे बस्तर के हितों के लिए हमेशा संघर्ष करते रहे। आमचो बस्तर आमचो माटी जय भारत साभार :- बस्तर के क्रांति दूत पुस्तक ...

बस्तर के क्रांति दूत 6

बस्तर के क्रांति दूत :-  षष्ठम पुष्प बस्तर केसरी लालकालेंद्र सिंह बस्तर केसरी लाल कालेंद्र सिंह बस्तर के माटी पुत्र थे। वे बस्तर में 1910 ईसवी की क्रांति अथवा भूम काल के जनक  थे। 1910 ईसवी की क्रांति के माध्यम से बस्तर में मुरिया राज की  स्थापना करना चाहते थे । बस्तर की अस्मिता के लिए लाल कालेंद्र सिंह ने अपने प्राणों तक की परवाह नहीं की। लाल कालेंद्र सिंह बस्तर के दीवान दल गंजन सिंह के पुत्र थे। दल गंजन सिंह बस्तर नरेश महिपाल देव के पुत्र थे । इनकी मृत्यु के बाद लाल कालेंद्र सिंह 1881इसवी  में बस्तर रियासत के दीवान बनाए गए । लाल कालेंद्र सिंह ने 1881- 1886 तक काफी सफलता पूर्वक बस्तर रियासत का शासन चलाया था। किंतु 1886 में ही अंग्रेजों ने लाल कालेंद्र सिंह के अधिकार छीन लिए, लाल कालेंद्र सिंह अपने अधिकारों के लिए लड़ते रहे 1980 में पंडा बैजनाथ को बस्तर रियासत का  प्रशासक बनाए जाने से बस्तर की राजमाता स्वर्ण कुंवर और लाल कालेंद्र सिंह काफी रुष्ट थे । इसे वे बस्तर की अस्मिता पर चोट समझते थे, उन्हें डर था कि बस्तर कहीं अंग्रेजों का उपनिवेश मात्र ही बन ...

बस्तर के क्रांति दूत 4

बस्तर के क्रांति दूत :-  चतुर्थ पुष्प वीर यादोराव शहीद धुरवा राम को जब अंग्रेजो के द्वारा फांसी दे दी गई। तब उसका सच्चा मित्र से रहा नहीं गया।  क्योंकि उसके सबसे अच्छे मित्र को  अंग्रेजों ने कुचक्र  में फंसा कर मार डाला। यह उसके लिए असहनीय था जब प्रत्येक मां का पुत्र इस देश की आजादी का नारा लगा रहा था । तब बस्तर कि इस लाडले ने देश ही सब कुछ है ऐसा भाव भर कर अंग्रेजों से विद्रोह करने का निश्चय करता है। जिसमे सबसे बड़ी बात थी की सेना खड़ी करना । उसको प्रशिक्षण देना और योजना समझाना।  बस्तर कि आदिवासियों में उत्साह जगाकर नवयुवकों को जोड़ना प्रारंभ किया । तेलंगा और दोरला जाति के लोगों को संगठित किया।  वैसे तो यादो राव भोपालपटनम जमीदारी के अंतर्गत आने वाले एक तालुके का तालुकेदार था।  यादोराव ने अपने संघर्ष को गति देने के लिए आहिरी जमीदारी के अंतर्गत आने वाले सोनमपल्ली के तालुकेदार बाबूराव एवं अरवल्ली व घोट के जमीदार व्यंकटराव से भी संबंध स्थापित कर लिए।  यादोराव की मोर्चाबंदी को देखकर अंग्रेज अधिकारी घबरा गए और उनके इस विद्रोह को विफल करने की रणनीति बनाई...

बस्तर के क्रांति दूत 3

बस्तर के क्रांति दूत :-  के तृतीय पुष्प  शहीद धुरवा राम भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना आधुनिक भारत के इतिहास का एक अत्यंत आश्चर्यजनक घटना है।   भारत जैसे सभ्य और सुसंस्कृत देश पर मुट्ठी भर फटे हाल अंग्रेज और पेशेवर डाकू  जो सात समुंदर पार से आए थे, और हम सब पर अधिकार प्राप्त कर लिया था । अंग्रेज शासकों के अत्याचारों और शोषण से जनता में कालांतर में विद्रोह की भावना का सूत्रपात हुआ।  फलस्वरुप स्वतंत्रता संग्राम का जन्म हुआ । 1854 ईसवी में संपूर्ण बस्तर अंचल अंग्रेजी शासन के आधीन हो गया था। नए शासन के प्रति बस्तर की आदिवासी जनता नाराज थी, और उन्होंने सरकार से असहयोग किया ।  ब्रिटिश सरकार की शोषण नीति से तंग होकर बस्तर रियासत में स्थित लिंगागिरी परगने के तालुकेदार धुरवा राम अंग्रेजो के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। तथा 1856 ईसवी  में अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध का बिगुल बज गया।  धुरवा राम माडिया जनजाति का थे।  लिंगागिरी की जनता ने इस युद्ध में धुरवा राम का खुलकर साथ दिया।  विद्रोहियों ने अंग्रेजो को लूटा ।  बैलगाड़ी में ले जा रहे सामानों...

बस्तर के क्रांतिदूत 2

बस्तर के क्रांति दूत का द्वितीय पुष्प:- शहीद शिरोमणि गेंदसिंह    गेंदसिंह  बस्तर रियासत के अंतर्गत आने वाली जमीदारी परलकोट के जमीदार थे।  वर्तमान में परलकोट कांकेर जिले के दक्षिण पश्चिम में स्थित है। डी ब्रेट के अनुसार परलकोट के जमीदार की उपाधि भूमिया राजा की थी । भूमिया राजा इन्हें इसलिए कहा गया क्योंकि इनके पूर्वज चट्टान से निकले थे ।पुराना किला नारायण पाटन आज भी है ,और यहां पत्थर की चट्टान है, जिसमें चिन्ह अंकित है। उसमें से निकलकर राजा समीप में बैठे थे । प्राचीन काल में परलकोट एक राज्य था ।यह सब तमाडिया राज्यों में से एक था । काकतीय वंश के समय पलकोट उत्तर  पश्चिम के प्रमुख जमीदारी थी ।बस्तर में मराठों और ब्रिटिश अधिकारियो की उपस्थिति से आदिवासियों को अपनी पहचान का खतरा उत्पन्न हो गया था।  परदेसी सभ्यता से अबूझ माड़िया खतरा महसूस करने लगे थे ।मराठों और अंग्रेजों की शोषण नीति से अबूझमाड़िया  तंग आ चुके थे । गेंद सिंह के माध्यम से अबूझमाडिया एक ऐसे संसार  की रचना करना चाहते थे ।जहां लूस खटोर और शोषण ना हो, यह विचार उन में मराठों और अंग्रेजों के प्र...

बस्तर के क्रांति दूत 1

बस्तर के क्रांति दूत भारतीय स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन और बस्तर को सुरक्षित रखने वाले ऐसे वीर क्रांतिकारी योद्धा व महापुरुष जिन्होंने अंग्रेजो के साथ लड़ाइयां लड़ी ।लोगों को जागरुक किया, संगठित किया और बस्तर के लोगों को सुरक्षित रखा ।  आज हमें सभी लोगों को स्मरण करने की आवश्यकता है। 1.महानायक शहीद गुंडाधूर 2.शहीद शिरोमणि गेंद सिंह  3.शहीद धुर्वा  राम 4.शहीद यादो राव 5.वनपुत्र नागुल दोरला   6.बस्तर केसरी लाल कालेन्द्र सिंह  7.क्रांति नेत्री स्वर्ण कुंवर 8.अमर शहीद हूंगा माझी  9.क्रांति पुत्र आयतू महरा 10.महाराजा प्रवीरचंद भजदेव   11.आजादी का सिपाही इंदरू केवट 12.देशभक्त प्रफुल्लचंद भजदेव  13.संविधान पुरुष रामप्रसाद पोटाई शत शत नमन......

शहीद गुंडाधुर

मेरे प्यारे भाइयों ,  नमस्कार आपने आजादी की लड़ाइ की कई कहानी सुनी होगी। अनेकों क्रांतिकारियों के जीवनी पढी होगी। क्योंकि भारत की धरती वीरों से खाली नहीं है ।आजादी की लड़ाई हर व्यक्ति ने लड़ा लड़ा।  प्रत्येक मां का बेटा इस देश की रक्षा के लिए तैयार था। लक्ष्य था भारतवर्ष की आजादी, अंग्रेजों से मुक्ति । अपना बस्तर भी अंग्रेजो के कब्जे में था । बस्तर व कांकेर की रियासतें भी अंग्रेजों के अधीन थी।  अंग्रेजों का शोषण चरम पर था, वनवासी समाज को अंग्रेजो के द्वारा सताया जा रहा था, कई प्रकार के जुल्म ढाए जा रहे थे । प्रतिदिन शोषण बढ़ता ही जा रहा था।  और इस प्रकार से अनेकों अत्याचार इस समाज को सहना पड़ रहा था ।ऐसी स्थिति में अंग्रेजों से विद्रोह करने के लिए लिए बस्तरपुत्र गुंडाधुर खड़े हुए, साहस व शक्ति से भरपूर गुंडाधुर के नेतृत्व में अंग्रेजो के खिलाफ बिगुल फूंका गया।  और उसका नाम दिया गया मुक्ति संग्राम - भूमकाल विद्रोह  नेतानार नामक गांव में रहने वाला गुंडाधुर बस्तर में हो रहे अत्याचार के खिलाफ समाज को संगठित किया । अक्टूबर 1910 को बस्तर दशहरा के पवित्र दिवस पर स...

गीता :- शिव अर्जुन युद्ध

शिव अर्जुन युद्ध    हिमालय  पर्वतमाला में ‘इन्द्रकील’ बड़ा पावन और शांत स्थल था। ॠषि-मुनि वहां तपस्या किया करते थे। एक दिन पांडु पुत्र  अर्जुन  उस स्थल पर पहुंच गए। अर्जुन को अस्त्र-शस्त्रों से सज्जित देखकर मुनि कुमारों में खुसर-पुसर होने लगी। एक मुनि कुमार बोला, “यह अनजान व्यक्ति कौन है?” “कोई भी क्यों न हो, इसे पवित्र स्थान पर  अस्त्र शस्त्र  नहीं लाने चाहिए थे। “दूसरा बोला। ॠषि कुमार नदी के किनारे तक अर्जुन के पीछे-पीछे गए और यह देखने लगे कि वह करता क्या है? अर्जुन ने अपने अस्त्र-शस्त्र उतारे और वहां बने शिवलिंग के सामने बैठ गया। उसने बड़े मनोयोग से भगवान  शिव  की आराधना की, शिवलिंग पर फूल चढ़ाए। तभी एक मुनि कुमार अर्जुन को पहचान गया। बोला, ”अरे ये तो  पांडु  पुत्र अर्जुन है। मैंने इसके शौर्य के बहुत चर्चे सुने है। इस समय यह विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर है।“ "पर यह यहाँ आया किसलिए है?” दूसरे मुनिकुमार ने जिज्ञासा प्रकट की। “कपटी  दुर्योधन  के साथ जुए में सब-कुछ हारकर  पांडव  वनवास कर रहे है।“ पहले वा...

सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की कथा

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सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की कथा  राजा हरिश्चंद्र डेस्क-राजा हरिश्चंद्र का नाम सच बोलने के लिए जगत में प्रसिद्ध है। उनकी प्रसिद्धि चारों तरफ फैली थी। इनका जन्म इक्ष्वाकु वंश में त्रिशंकु नामक राजा तथा उनकी पत्नी सत्यवती के पुत्र के रूप में हुआ। राजा हरिश्चंद्र सच बोलने और वचन. पालन के लिए मशहूर थे। ये बहुत बड़े दानी भी थे। । वे जो वचन देते, उसे अवश्य पूरा करते। उनके बारे में कहा जाता, चाँद और सूरज भले ही अपनी जगह से हट जाएँ, पर राजा अपने वचन से कभी पीछे नहीं हट सकते। सत्यवादी हरिशचन्द्र के विषय में कहा जाता है कि - "चन्द्र टरे सूरज टरे, टरे जगत व्यवाहर । पै दृढ़ श्री हरिशचन्द्र को , टरे न सत्य विचार ॥ इनकी पत्नी का नाम तारामती (शैव्या) तथा पुत्र का नाम रोहिताश्व था। इनके गुरुदेव गुरु वशिष्ठ जी थे। एक बार ऋषि विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र की प्रसिद्धि सुनी। वे स्वयं इसकी परीक्षा करना चाहते थे। क्या हरिश्चंद्र हर कठिनाई झेलकर भी वचन का पालन करेंगे? लेकिन डर वसिष्ठ जी का था। वसिष्ठ जी ने कह दिया आपको यदि मेरे शिष्य और राजा पर शक है तो आप ख़ुशी-ख़ुशी परीक्षा ले सकते हैं और मैं भी बीच में ...

टेढ़ी खीर।। कहावतों की कहानियाँँ

टेढ़ी खीर।। एक नवयुवक था। छोटे से क़स्बे का। अच्छे खाते-पीते घर का लेकिन सीधा-सादा और सरल सा। बहुत ही मिलनसार। एक दिन उसकी मुलाक़ात अपनी ही उम्र के एक नवयुवक से हुई। बात-बात में दोनों दोस्त हो गए। दोनों एक ही तरह के थे। सिर्फ़ दो अंतर थे, दोनों में। एक तो यह था कि दूसरा नवयुवक बहुत ही ग़रीब परिवार से था और अक्सर दोनों वक़्त की रोटी का इंतज़ाम भी मुश्किल से हो पाता था। दूसरा अंतर यह कि दूसरा जन्म से ही नेत्रहीन था। उसने कभी रोशनी देखी ही नहीं थी। वह दुनिया को अपनी तरह से टटोलता-पहचानता था। लेकिन दोस्ती धीरे-धीरे गाढ़ी होती गई। अक्सर मेल मुलाक़ात होने लगी। एक दिन नवयुवक ने अपने नेत्रहीन मित्र को अपने घर खाने का न्यौता दिया। दूसरे ने उसे ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार किया। दोस्त पहली बार खाना खाने आ रहा था। अच्छे मेज़बान की तरह उसने कोई कसर नहीं छोड़ी। तरह-तरह के व्यंजन और पकवान बनाए। दोनों ने मिलकर खाना खाया। नेत्रहीन दोस्त को बहुत आनंद आ रहा था। एक तो वह अपने जीवन में पहली बार इतने स्वादिष्ट भोजन का स्वाद ले रहा था। दूसरा कई ऐसी चीज़ें थीं जो उसने अपने जीवन में इससे पहले कभी नहीं खाईं थीं। इसमें ...

न तीन मे न ग्यारह मे।।

एक नगर सेठ थे। अपनी पदवी के अनुरुप वे अथाह दौलत के स्वामी थे। घर, बंगला, नौकर-चाकर थे। एक चतुर मुनीम भी थे जो सारा कारोबार संभाले रहते थे। किसी समारोह में नगर सेठ की मुलाक़ात नगर-वधु से हो गई। नगर-वधु यानी शहर की सबसे ख़ूबसूरत वेश्या। अपने पेश की ज़रुरत के मुताबिक़ नगर-वधु ने मालदार व्यक्ति जानकर नगर सेठ के प्रति सम्मान प्रदर्शित किया। फिर उन्हें अपने घर पर भी आमंत्रित किया। सम्मान से अभिभूत सेठ, दूसरे-तीसरे दिन नगर-वधु के घर जा पहुँचे। नगर-वधु ने आतिथ्य में कोई कमी नहीं छोड़ी। खूब आवभगत की और यक़ीन दिला दिया कि वह सेठ से बेइंतहा प्रेम करती है। अब नगर-सेठ जब तब नगर-वधु के ठौर पर नज़र आने लगे। शामें अक्सर वहीं गुज़रने लगीं। नगर भर में ख़बर फैल गई। काम-धंधे पर असर होने लगा। मुनीम की नज़रे इस पर टेढ़ी होने लगीं। एक दिन सेठ को बुखार आ गया। तबियत कुछ ज़्यादा बिगड़ गई। कई दिनों तक बिस्तर से नहीं उठ सके। इसी बीच नगर-वधु का जन्मदिन आया। सेठ ने मुनीम को बुलाया और आदेश दिए कि एक हीरों जड़ा नौलखा हार ख़रीदा जाए और नगर-वधु को उनकी ओर से भिजवा दिया जाए। निर्देश हुए कि मुनीम ख़ुद उपहार लेकर जाएँ। मु...

अंधेर नगरी चौपट राजा टके सेर भाजी टके शेर खाजा।।

काशी-तीर्थयात्रा की वापसी में एक गुरु और शिष्य किसी  नगरी में पहुँचे। नाम उसका अंधेर नगरी था। शिष्य बाजार में सौदा खरीदने निकला तो वहाँ हर चीज एक ही भाव-‘सब धान बाइस पसेरी।’ भाजी टका सेर और खाजा (एक मिठाई) भी टका सेर। शिष्य और चीजें खरीदने के झंझट में क्यों पड़ता ? एक टके का सेर भर खाजा खरीद लाया और बहुत खुश होकर अपने गुरु से बोला, ‘‘गुरुजी, यहाँ तो बड़ा मजा है। खूब सस्ती हैं, चीजें, सब टका सेर। देखिए, एक टका में यह सेर भर खाजा लाया हूँ। हम तो अब कुछ दिन यहीं मौज करेंगे। छोड़िए तीर्थयात्रा, यह सुख और कहाँ मिलेगा ?’’ गुरु समझदार थे, बोले, ‘‘बच्चा, इसका नाम ही अंधेर नगरी है। यहाँ रहना अच्छा नहीं, जल्दी भाग निकलना चाहिए यहाँ से। वैसे भी, साधु का एक ठिकाने पर जमना अच्छा नहीं। कहा है, ‘साधु रमता भला, पानी बहता भला।’’ पर शिष्य को गुरु की बात नहीं भाई। बोला, ‘‘अपने राम तो यहाँ कुछ दिन जरूर रहेंगे।’’ गुरु को शिष्य को अकेले छोड़ जाना उचित नहीं लगा। बोले, ‘अच्छा, रहो और कुछ दिन। जो होगा, भुगता जाएगा।’’ अब तक शिष्य अंधेर नगरी का सस्ता माल खा-खाकर खूब मोटा हो गया। उन्हीं दिनों एक खूनी को फाँसी...

विनाश काले विपरीत बुद्धि।।। कहावतें

पाण्डवों के वन जाने के बाद नगर में अनेक अपशकुन हुए। उसके बाद नारदजी वहां आए और उन्होंने कौरवों से कहा कि आज से ठीक चौदह वर्ष बाद पाण्डवों के द्वारा कुरुवंश का नाश हो जाएगा. (कुछ ).... द्रोणाचार्य की बात सुनकर धृतराष्ट्र ने कहा गुरुजी का कहना ठीक है। तुम पाण्डवों को लौटा लाओ। यदि वे लौटकर न आवें तो उनका शस्त्र, सेवक और रथ साथ में दे दो ताकि पाण्डव वन में सुखी रहे। यह कहकर वे एकान्त में चले गए। उन्हें चिन्ता सताने लगी उनकी सांसे चलने लगी। उसी समय संजय ने कहा आपने पाण्डवों का राजपाठ छिन लिया अब आप शोक क्यों मना रहे हैं? संजय ने धृतराष्ट्र से कहा पांडवों से वैर करके भी भला किसी को सुख मिल सकता है। अब यह निश्चित है कि कुल का नाश होगा ही, निरीह प्रजा भी न बचेगी। सभी ने आपके पुत्रों को बहुत रोका पर नहीं रोक पाए। विनाशकाल समीप आ जाने पर बुद्धि खराब हो जाती है। अन्याय भी न्याय के समान दिखने लगती है। वह बात दिल में बैठ जाती है कि मनुष्य अनर्थ को स्वार्थ और स्वार्थ को अनर्थ देखने लगता है तथा मर मिटता है। काल डंडा मारकर किसी का सिर नहीं तोड़ता। उसका बल इतना ही है कि वह बुद्धि को विपरित करके भले को...

जैसा करोगे वैसा भरोगे।। कहावतें

एक बुढ़िया थी। उसका एक ही बेटा था। वह हमेशा यही सपने देखती थी कि उसके बेटे का विवाह होगा तो बेटा और बहू दोनों मिलकर उसकी बहुत सेवा करेंगे और उसे घर का भी काम नहीं करना पड़ेगा। धीरे-धीरे वह दादी बन जाएगी और उसका घर स्वर्ग बन जाएगा। आखिर वह दिन भी आ गया जब बुढ़िया के बेटे का विवाह बड़ी धूमधाम से हुआ। वह दादी भी बन गई लेकिन संयोग से उसका कोई भी सपना पूरा नहीं हुआ। बुढ़िया का बेटा तो सुबह काम पर चला जाता और पोता स्कूल चला जाता, तब बहू उसके साथ बहुत बुरा व्यवहार करती। बहू बुढ़िया से घर में झाड़ू लगवाती, झूठे बर्तन साफ़ करवाती और टूटे-फूटे बर्तनों में उसे भोजन देती। शुरू में तो बहू अपने पति और बेटे के पीछे ही बुढ़िया से झगड़ती थी, लेकिन धीरे-धीरे वह अपने पति के सामने भी बुढ़िया का अपमान करने लगी। एक दिन टूटे बर्तनों में बुढ़िया को भोजन करते देखकर उसके बेटे को बहुत दुःख हुआ। उसने अपनी माँ का पक्ष लेते हुए अपनी पत्नी को बहुत डांटा। पति-पत्नी दोनों में बहुत कहा-सुनी हो गई। धीरे-धीरे बुढ़िया के बेटे ने भी पत्नी का विरोध करना छोड़ दिया। धीरे-धीरे पोता बड़ा होने लगा तो वह अपनी माँ का विरोध करने लगा। वह अपनी दादी...

सेर पर सवा सेर।।। कहावतें

एक बार अपनी समस्याओं पर विचार करने के लिए बहुत सारे खरगोश एक स्थान पर इकट्ठा हुए। एक खरगोश ने कहा-'हम सभी जीवों से अधिक सुन्दर हैं। हमें खूंखार जानवर, पशु-पक्षियों से हमेशा अपनी जान का खतरा बना रहता है। हमसे कोई भी नहीं डरता लेकिन हम सबसे डरते हैं। मनुष्य भी हमारा मांस खाने में कभी नहीं हिचकिचाते।हमें अपने जीवन का पल-पल खतरा बना रहता है।' दूसरे खरगोश ने कहा-'हाथी तो हमारा मांस नहीं खाते, लेकिन उनका शरीर इतना बड़ा है कि सैकडों खरगोश भाई हाथी के पैरों के नीचे कुचल कर मर जाते हैं। तीसरे खरगोश ने कहा-'भाइयो,इस संसार में केवल शक्तिशाली ही जीवित रह सकते हैं। हम जैसे दुर्बल और छोटे जीवों का इस संसार में रहना बहुत मुश्किल है। मेरे विचार से तो हमारी समस्या का कोई समाधान नहीं है।' सभी खरगोशों के निराशापूर्ण शब्द सुनकर एक बूढ़ा अनुभवी खरगोश बोला-'मैंने अपनी समस्या का हल खोज लिया है,जो हमारे सभी कष्टों को दूर कर सकता है। हम सबको एक साथ नदी में कूदकर आत्महत्या कर लेनी चाहिए। मौत को गले लगाकर हम सारे दुःखों से मुक्ति पा सकते हैं। बूढ़े खरगोश की बात सभी खरगोशों को बहुत पसंद आई। व...