बस्तर के क्रांति दूत 3
बस्तर के क्रांति दूत :- के तृतीय पुष्प
शहीद धुरवा राम
भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना आधुनिक भारत के इतिहास का एक अत्यंत आश्चर्यजनक घटना है।
भारत जैसे सभ्य और सुसंस्कृत देश पर मुट्ठी भर फटे हाल अंग्रेज और पेशेवर डाकू जो सात समुंदर पार से आए थे, और हम सब पर अधिकार प्राप्त कर लिया था ।
अंग्रेज शासकों के अत्याचारों और शोषण से जनता में कालांतर में विद्रोह की भावना का सूत्रपात हुआ।
फलस्वरुप स्वतंत्रता संग्राम का जन्म हुआ ।
1854 ईसवी में संपूर्ण बस्तर अंचल अंग्रेजी शासन के आधीन हो गया था। नए शासन के प्रति बस्तर की आदिवासी जनता नाराज थी, और उन्होंने सरकार से असहयोग किया ।
ब्रिटिश सरकार की शोषण नीति से तंग होकर बस्तर रियासत में स्थित लिंगागिरी परगने के तालुकेदार धुरवा राम अंग्रेजो के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
तथा 1856 ईसवी में अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध का बिगुल बज गया।
धुरवा राम माडिया जनजाति का थे।
लिंगागिरी की जनता ने इस युद्ध में धुरवा राम का खुलकर साथ दिया।
विद्रोहियों ने अंग्रेजो को लूटा ।
बैलगाड़ी में ले जा रहे सामानों को लूटा
इस प्रकार से अंग्रेजो के साथ संघर्ष प्रारंभ हुआ।
मारियो ने छापा मार युद्ध प्रणाली द्वारा अंग्रेजों से खुलकर युद्ध किया ।परिणाम यह हुआ कि अनेक स्थानों पर आदिवासियों का कब्जा हो गया।
सबसे महत्वपूर्ण संघर्ष 3 मार्च 1856 को चिंतलनार में हुआ।
और अंग्रेजों ने कुटिल चाल चलकर भोपालपटनम के जमीदार के सहयोग से धुरवा राम के विद्रोह का दमन किया।
धुरवा राम और उसकी पत्नी व बच्चे तथा लिंगागिरी के 400 मारिया परिवारों को बंदी बना लिया गया।
5 मार्च 1856 को अंग्रेजों ने धुरवा राम को फांसी दे दी ।
उसका परगना भोपालपटनम के जमीदार को दे दिया गया।
अंग्रेजी शासन के विरुद्ध भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के
व्यापक परिदृश्य के संदर्भ में लिंगागिरी विद्रोह का आकलन करें तो ज्ञात होता है , महान स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के
1 वर्ष पहले ही बस्तर की भूमि में क्रांति का आगाज हो चुका था।
बस्तर के इतिहास में अंकित वीर गाथा।
बस्तर के लिए आदर्श स्थापित करती है ।
यह छत्तीसगढ़ के इतिहास का स्वर्णिम पृष्ठ है।
धुरवा राम का विद्रोह बस्तर का महान मुक्ति संग्राम था।
वह अपने अंतिम समय तक बस्तर के लिए व इस माटी के लिए तथा अपनों के लिए संघर्ष करते रहे ।
और जब तक शरीर में प्राण थे वे आवाज बुलंद करते रहे।
धुरवा राम छत्तीसगढ के दूसरे शहीद है।
इन्हें बस्तर ही नहीं वरन छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम में स्थान मिलना चाहिए।
जय भारत
आमचो बस्तर
आमचो माटी
साभार :- बस्तर के क्रांति दूत पुस्तक से
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें