संघगीत 14 भारत हमारी मा है
भारत हमारी माँ है माता का रूप प्यारा
करना इसी की रक्षा कर्तव्य है हमारा ॥धृ॥
जननी समान धरती जिस पे जनम लिया है
निज अन्न वायु जल से जिसने बडा किया है
जीवन वो कैसा जीवन इसपे अगर न वारा ॥१॥
स्वरणिम प्रभात जिस की अमृत लुटाने आए
जहाँ सांझ मुस्कुराकर दिन की थकन मिटाए
दिन रात का चलन भी जहाँ शेष जग से न्यारा ॥२॥
जहाँ घाम भीगा पावस भिनी शरद सुहाये
बीते शिशिर को पतझड देकर वसन्त जाये
जिसे धूप छांव वर्षा हिमपात ने सँवारा ॥३॥
पावन पुनीत मा का मंदिर सहज सुहाना
फिर से लुटे न बेटो तुम नींद मे न खोना
जागृत सुतों का बल ही मा का सदा सहारा ।४॥
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