महर्षि कणाद
एक वृद्ध ऋषि रुग्ण अवस्था में अपनी सैया पर पड़े हुए थे। उनके आसपास उनके शिष्यों का, रिश्तेदारों का और चाहने वालों की बड़ी भीड़ बैठी हुई थी। ऋषिवर की हालत देखकर सभी बहुत चिंतित थे। ऋषि के गले से मंद मंद घुर्र घुर्र की आवाज आ रही थी। उनके लिए सांस लेना भी बहुत ही कष्ट प्रद थी। बीच-बीच में लंबी सांस लेते थे, उनका अगले सांस ले पाएंगे या नहीं कहना कठिन था। उनकी हालत देखकर सबके मन में आ रही थी । पास में बैठे वैधराज ने एक दवा की खुराक बनाई और ऋषिवर को दी , कुछ ही देर बाद उन्होंने आंखें खोली सभी के चेहरे पर खुशी थी। एक शिष्य से पूछा ऋषिवर आप क्या लेना चाहते हैं । जल लेंगे क्या? ऋषिवर ने धीरे से गर्दन हिलाई और अत्यंत मंद स्वर में कहा नहीं मुझे कुछ नहीं चाहिए । उनके बड़े भाई वहां उपस्थित थे। वह बोले अरे कांतिमान अब तुम परमेश्वर को चिंतन करो और उस बूढ़े शरीर के मुख से आवाज आई पीलू पीलू पीलू वैधराज ने कहा - आपके इष्ट देवता का नाम स्मरण करो कुलदवता का नाम लो । ऋषिवर फिर से बोले पीलो पीलो पीलो उनके एक शिष्य ने मधुर भजन गाया। ऋषिवर ने शांति चित्र से सुना भजन स...