महर्षि रमण
महर्षि रमण का जन्म सन 1869 में तमिलनाडु के एक छोटे से गांव तिरूचूली में हुआ। तिरूचूली मदुरै से 30 मील दूर है। 12 वर्ष की आयु में पिताजी का निधन हो गया। एक दिन इनके घर में एक अतिथि आए वह अरुणाचल से आए थे। अरुणाचल शब्द सुनकर बालक रमन को जादुई असर डाल दिया था। और उसके बारे में जिज्ञासा पैदा होने लगी। बाद में वे अरुणाचल देखने के लिए निकल पड़े, वेंकटरमन गाड़ी में सवार होकर एक डिब्बे में बैठकर अरुणाचल के लिए निकल पड़े खाने का रोकने का कोई व्यवस्था नहीं है फिर भी मंजिल अरुणाचल पहुंचना था। वेंकटरमन के पास यात्रा के लिए भी पैसे नहीं थे तो उसने अपने सोने की बालियों को उतार कर उन्होंने एक व्यापारी को बेचे। वह ₹4 दिए उस व्यापारी भाग अवतार नामक व्यक्ति ने सोने की बाली ₹20 आंकी बाद में और पैसे देने की बातचीत हुई और उसने अपना पता वेंकटरमन को दिया पर वह पता को उन्होंने फाड़ कर फेंक दिया। क्योंकि बाकी शेष पैसा उन्हें नहीं चाहिए थे । जब अरुणाचल में अरुणाचलेश्वर मंदिर पहुंचे तो खुशी का ठिकाना ना रहा वह वहां ध्यान करने लग गए, परंतु कुछ शरारती बच्चे उन्हें परेशान करने लग गए थे। मां को जब पता चला तो वे अपने भाई को भेजा कि रमन को घर ले आवे भाई बहुत मनाया फिर भी वह घर लौटने को तैयार नहीं हुए ,बाद में मां स्वयं आई परंतु मां से उन्होंने कोई बातचीत नहीं किया। मां बहुत निराश हुई वेंकटरमन कठोरतम को साध चुके थे। मां वापस घर आई कुछ दिन के बाद वह बीमार रहने लग गई तब बाद में मां वेंकटरमन के आश्रम में रहने लगी, और वेंकटरमन मां की अच्छी सेवा करने लग गए और इसी आश्रम में उन्होंने अपना देह त्यागा। एक बार आश्रम में चोर घुस आया चोर ने महर्षि रमण को घुसा भी मारा जिससे लोगों को गुस्सा आया उन्होंने चोर को पकड़ लिया पकड़ने के बाद उसे सजा देने की बारी आई तो वेंकटरमन ने उसे सजा देने से मना कर दिया और शिष्यों को समझाते हुए उन्होंने कहा कि सांप का गुण है डसना, बिच्छू का डंक मारना तथा बैल का सीग से मारना हैं उसे दंडित करना कहां तक उचित है । चोर भले ही यह सोचे कि चोरी करना उसका स्वाभाविक धर्म है । पर हमारा धर्म है उसे क्षमा करना है। वह पशु पक्षियों से बहुत प्रेम करते थे। आश्रम में एक लक्ष्मी नामक गाय पाल के रखे थे जब वह मर गई तब वह रोते रह गए, ऐसे सभी जीवो पर प्रेम करने वाले वेंकटरमन थे। बाद में उनका नाम महर्षि रमण पड़ा।
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