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दिसंबर, 2022 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

भागीरथ

प्राचीन समय में कौशल नाम का एक राज्य था 16 वर्षीय भगीरथ राजा राज्य करते थे बचपन में ही अपने पिता से वंचित हो गए थे 16 वर्ष की आयु में कदम रखा तो माने उसकी विवाह एक सुंदर राजकुमारी से कर दिया वह महान राजा दिलीप के पुत्र थे जब राजा बनकर के दरबार में पहुंचे तो दरबारियों ने उनका स्वागत सगर के वंश की वृद्धि हो भगीरथ राजा की विजई हो दिलीप के पुत्र की विजई हो ऐसा जय खुश करने लगे जब दरबार समाप्त हुआ जब अपने महल में मंत्री के साथ लौटे उनके मस्तिष्क समय दो बातें चल रही थी सगर और दिलीप दिलीप के बारे में जानते थे क्योंकि वे उनके पिता थे परंतु सागर कौन था यह उन्हें ज्ञात नहीं था उन्होंने मंत्री से पूछा मंत्री ने उत्तर दिया महाराज को एक महान राजा थे जिन्होंने 100 अश्वमेघ यज्ञ पूरे किए थे उनके 60000 पुत्र थे उन्हीं के 1 से आप एक हो इस उत्तर से संतुष्ट नहीं हुए अपनी मां से पूछ ले मां के एहसास की हमारे वंश में सागर नाम के एक महान राजा थे माता का उत्तर था हां जब उसे 60000 पुत्र थे तो अभी उनके पुत्रों की और संबंधों की भीड़ लग जाती हम तो केवल 3 लोग ही हैं मां ने कहा बेटा तुम्हें पहले ही सारी कथा बतानी चाह...

महर्षि वेदव्यास

महर्षि वेदव्यास का जन्म द्वापर युग के अंत में हुआ वह महर्षि वशिष्ठ के प्रपत्र व शक्ति ऋषि के पुत्र थे उनके पिता पराशर मुनि व माता सत्यवती थी कृष्ण वर्ण के थे और द्वैपायन इसलिए कि उनका जन्म यमुना के एक दीप पर हुआ था अल्पायु में ही हो हिमालय में तपस्या करने चले गए उनका आश्रम बद्री में था इसलिए बद्रीनारायण भी कहलाए व्यास ने कहा मां यदि कभी तुमसे मिलना चाहो तो मेरा ही स्मरण भर कर लेना मैं तुरंत आपके सम्मुख उपस्थित हो जाऊंगा अनेक वर्ष बीत गए राजा शांतनु हसीना पूरे पर राज कर रहे थे 1 दिन में शिकार करने जंगल की ओर निकले तो सत्यवती को देखकर विवाह करने का निश्चय किया सत्यवती मछुआरे समाज के मुख्य दशरथ की पुत्री थ शांतनु सत्यवती का हाथ मांगने उसके पिता दास राज के पास गए डांस राज ने राजा शांतनु के सामने विवाह जलेसर का रखें सत्यवती के उपरांत संतान ही गुरू वंशी उधर अधिकारी होगा शांतनु नेहा सरका मारने से इनकार कर दिया उन्होंने कहा कि पहले ही अपने पुत्र देवव्रत को पूर्व अधिकारी घोषित कर चुके हैं सत्यवती का पिता अपनी शर्तों पर अधिक रहा शांतनु जब मेहर लौटे वे बहुत ही उदास और वह बीमार रहने लगे देवव्रत को...

एकलव्य

एकलव्य बनवासी था परंतु बहुत ही स्वाभिमानी और वीर था इन्हें निम्न कोटि की जाती समझी जाती थी उनके माता-पिता के साथ एक सुंदरवन में रहते थे एकलव्य के पिता हिरण्य धनु उसी वन के अदीपति थे एकलव्य उनका एकमात्र पुत्र था दुर्गा दुर्भाग्यवश अपने राजा की ओर से युद्ध करते हुए ईरान ने धनु वीरगति को प्राप्त हुए मृत्यु के पश्चात वन का दायित्व एकलव्य पर आ गया जंगल में बहुत दे दिए थे जो हिरणों को छोटे-छोटे बच्चों को खा जाते थे इससे वह बहुत चिंतित था इसलिए धनुर्विद्या सीखने की इच्छा प्रकट हुई मां से 1 दिन कहा कि मुझे धनुर्विद्या सीखना है इसके लिए मुझे क्या करना पड़ेगा तो मां ने उसे द्रोणाचार्य के पास जाने को कहा कौरव पांडव राजकुमार बहुत छोटे थे एक दिन खेलते हुए 3 गेंद कुएं में गिर गई बहुत प्रयास के बाद भी गेम को बाहर नहीं निकाल सके कुएं से थोड़ी ही दूरी पर उन्होंने एक दुबले-पतले ब्राह्मण को देखा वह प्रौढ़ व्यक्ति द्रोणाचार्य थे बच्चों ने उनके पास जाकर गेंद निकालने की मदद मांगी द्रोणाचार्य ने कुछ तीर हाथ में लिए और एक तीर गेंद की ओर निशाना साध कर फेंका 30 सटीक गेंद में जा लगा फिर वह एक के बाद एक तीर फेंकत...

सावरकर जी व यमुनाबाई का संवाद

एक कल्पना कीजिए... तीस वर्ष का पति जेल की सलाखों के भीतर खड़ा है और बाहर उसकी वह युवा पत्नी खड़ी है, जिसका बच्चा हाल ही में मृत हुआ है... इस बात की पूरी संभावना है कि अब शायद इस जन्म में इन पति-पत्नी की भेंट न हो. ऐसे कठिन समय पर इन दोनों ने क्या बातचीत की होगी. कल्पना मात्र से आप सिहर उठे ना?? जी हाँ!!! मैं बात कर रहा हूँ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे चमकते सितारे विनायक दामोदर सावरकर की. यह परिस्थिति उनके जीवन में आई थी, जब अंग्रेजों ने उन्हें कालापानी  (Andaman Cellular Jail) की कठोरतम सजा के लिए अंडमान जेल भेजने का निर्णय लिया और उनकी पत्नी उनसे मिलने जेल में आईं.  मजबूत ह्रदय वाले वीर सावरकर (Vinayak Damodar Savarkar) ने अपनी पत्नी से एक ही बात कही... – “तिनके-तीलियाँ बीनना और बटोरना तथा उससे एक घर बनाकर उसमें बाल-बच्चों का पालन-पोषण करना... यदि इसी को परिवार और कर्तव्य कहते हैं तो ऐसा संसार तो कौए और चिड़िया भी बसाते हैं. अपने घर-परिवार-बच्चों के लिए तो सभी काम करते हैं. मैंने अपने देश को अपना परिवार माना है, इसका गर्व कीजिए. इस दुनिया में कुछ भी बोए बिना कुछ उगता नहीं ...