एकलव्य

एकलव्य बनवासी था परंतु बहुत ही स्वाभिमानी और वीर था इन्हें निम्न कोटि की जाती समझी जाती थी उनके माता-पिता के साथ एक सुंदरवन में रहते थे एकलव्य के पिता हिरण्य धनु उसी वन के अदीपति थे एकलव्य उनका एकमात्र पुत्र था दुर्गा दुर्भाग्यवश अपने राजा की ओर से युद्ध करते हुए ईरान ने धनु वीरगति को प्राप्त हुए मृत्यु के पश्चात वन का दायित्व एकलव्य पर आ गया जंगल में बहुत दे दिए थे जो हिरणों को छोटे-छोटे बच्चों को खा जाते थे इससे वह बहुत चिंतित था इसलिए धनुर्विद्या सीखने की इच्छा प्रकट हुई मां से 1 दिन कहा कि मुझे धनुर्विद्या सीखना है इसके लिए मुझे क्या करना पड़ेगा तो मां ने उसे द्रोणाचार्य के पास जाने को कहा कौरव पांडव राजकुमार बहुत छोटे थे एक दिन खेलते हुए 3 गेंद कुएं में गिर गई बहुत प्रयास के बाद भी गेम को बाहर नहीं निकाल सके कुएं से थोड़ी ही दूरी पर उन्होंने एक दुबले-पतले ब्राह्मण को देखा वह प्रौढ़ व्यक्ति द्रोणाचार्य थे बच्चों ने उनके पास जाकर गेंद निकालने की मदद मांगी द्रोणाचार्य ने कुछ तीर हाथ में लिए और एक तीर गेंद की ओर निशाना साध कर फेंका 30 सटीक गेंद में जा लगा फिर वह एक के बाद एक तीर फेंकते गए जब छोड़े गए तीर आपस में जुड़ गए तो बच्चों ने रस्सी की तरह उन्हें खींचने लगे इस प्रकार केंद्र बाहर आ गई यह सभी दृश्य देख कर उन बच्चों ने द्रोणाचार्य से कहा क्या आप कहां से हैं कौन हैं द्रोणाचार्य ने संक्षिप्त परिचय देकर कहा बच्चों अभी जो तुमने देखा उसे अपने भीष्म पितामह को जाकर कहो वह सब समझ जाएंगे बच्चों ने घर आकर विश्व पितामह को सारी बातें बताई भीष्माचार्य स्वयं द्रोणाचार्य से मिलने गए उन्हें राजकुमारों को धनुर्विद्या वस्त्र कला में निपुणता के शिकार करने हेतु निवेदन किया ढूंढ के संबंध में अपनी मां से सारी बातें सुनकर एकलव्य द्रोणाचार्य उन्हें देख लूंगा वही मेरे गुरु हैं मैं उसे विद्या प्राप्त कर लूंगा इसी भाव से रोमांचित हो कर पहुंचा शहर के बाहरी उसे द्रोणाचार्य के दर्शन हुए अपने शिष्यों को अस्त्र विद्या का पाठ सिखा रहे थे एकलव्य संकोच करते हुए उनके पास गया उनके समझाने की पद्धति बहुत ही स्पष्ट और सरल थी कैसे खड़े होना किस पैर पर शरीर का भार रखना हाथ की उंगलियों की स्थिति कैसी होनी चाहिए धनुष और बाण कैसे चढ़ाना लक्ष्य कैसे बांधना मन को एकाग्र कैसे करना धनुष की प्रशंसा कहां तक खींचना बाढ़ कब चुना आदि एक-एक बात गुरुचरण बड़ी सावधानी समझा रहे थे एकलव्य आवक हो करो सब दृश्य देख रहा था एकलव्य प्रणाम करके दो ना 4:00 से मिला तो स्वर्गवासी बालक को द्रोणाचार्य प्रेम पूर्वक आशीर्वाद दिया और उसने कहा गुरुदेव मेरी इच्छा आपसे धनुर्विद्या सीखने की है मैं आपसे प्रार्थना हूं क आप मुझे शिष्य के रूप में स्वीकार कर तो दोनों आचार्य जी ने कहा कि मैं तो राजवंशों को ही धनुर्विद्या सिखाता हूं बेटा एकलव्य विद्या सीखना तुम्हारे लिए कठिन नहीं तुम जन्मजात धनुर्धारी हो वन में जाकर ही तुम अभ्यास करो और यह समझो कि तुम मेरे ही सच्चा हो और एकलव्य जंगल में आकर मूर्ति को ही गुरु के रूप में स्वीकार करके उसने अभ्यास प्रारंभ किया एक बार कौरव और पांडव राजकुमार वन में जा रहे थे उनके साथ उनके कुत्ता भी था वह आगे-आगे दौड़ रहा था उसी वन में मुखौटा पहनकर कौड़ी से बनी माला धारण कर एकलव्य अपने अभ्यास से मांगना था कुत्ता उसे देख कर जोर जोर से भूख ने लगा इस एकलव्य का ध्यान टूटा उसके अभ्यास में बाधा पड़ी कुत्ते का भोकना बंद करने के उद्देश्य से उसने बाण से समूह बंद करना चाहा जैसे कुत्ता भोकने के लिए अपना मुंह खोलता वही निशाना साथ कार उसने एक के बाद एक अनेक वार्ड कुत्ते के मुंह में भर दिए कुत्ता सर पढ़ाता हुआ राजकुमार के पास थोड़ा या दृश्य देखकर राजकुमार चकित रह गए इतना चतुर धनुषधारी कौन है यह जानने के लिए आप दूर हुए अर्जुन तो आश्चर्य से आतंकित हुआ क्योंकि उसे लगा कि मुझसे अधिक धनुषधारी और कोई हो ही नहीं सकता फिर यह कौन है गुरु द्रोण का वचन था अर्जुन का सर्वश्रेष्ठ इधर-उधर बनाने का इसलिए उन्होंने एकलव्य से अपना गुरु दक्षिणा में उसका अंगूठा मांग आंखें मूंदकर चिंता में बैठे आचार्य को एकलव्य ने प्रणाम कर कहा गुरुदेव गुरु दक्षिणा स्वीकार कीजिए आचार्य के आंखों के सामने एकलव्य का रक्तरंजित अंगूठा सामने रखा है और शिष्य नतमस्तक होकर शांत खड़ा है अपने शिष्य को दिए धन से आचार्य द्रोण को अपार दुख हुआ एकलव्य का पिता हिरण ने धनु अपने राजा की सेवा में काम आया था अब उसका पुत्र एकलव्य अपने राजा का यानी कौरव का ही साथ देगा उसके दाहिने हाथ का अंगूठा अब नहीं आया अभी सकता था फिर भी उच्च कोटि के धर्म और धारों में उनकी गणना होती थी ऐसा माना जाता है कि एकलव्य के कौरव पक्ष में जाने की आशंका से महाभारत युद्ध से पूर्व ही श्री कृष्ण ने उसका सहार कर उसे मुक्ति दी

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