महर्षि वेदव्यास
महर्षि वेदव्यास का जन्म द्वापर युग के अंत में हुआ वह महर्षि वशिष्ठ के प्रपत्र व शक्ति ऋषि के पुत्र थे उनके पिता पराशर मुनि व माता सत्यवती थी कृष्ण वर्ण के थे और द्वैपायन इसलिए कि उनका जन्म यमुना के एक दीप पर हुआ था अल्पायु में ही हो हिमालय में तपस्या करने चले गए उनका आश्रम बद्री में था इसलिए बद्रीनारायण भी कहलाए व्यास ने कहा मां यदि कभी तुमसे मिलना चाहो तो मेरा ही स्मरण भर कर लेना मैं तुरंत आपके सम्मुख उपस्थित हो जाऊंगा अनेक वर्ष बीत गए राजा शांतनु हसीना पूरे पर राज कर रहे थे 1 दिन में शिकार करने जंगल की ओर निकले तो सत्यवती को देखकर विवाह करने का निश्चय किया सत्यवती मछुआरे समाज के मुख्य दशरथ की पुत्री थ शांतनु सत्यवती का हाथ मांगने उसके पिता दास राज के पास गए डांस राज ने राजा शांतनु के सामने विवाह जलेसर का रखें सत्यवती के उपरांत संतान ही गुरू वंशी उधर अधिकारी होगा शांतनु नेहा सरका मारने से इनकार कर दिया उन्होंने कहा कि पहले ही अपने पुत्र देवव्रत को पूर्व अधिकारी घोषित कर चुके हैं सत्यवती का पिता अपनी शर्तों पर अधिक रहा शांतनु जब मेहर लौटे वे बहुत ही उदास और वह बीमार रहने लगे देवव्रत को जब पता लगा तो वह सत्यवती के पिता से मिलने वह विवाह का प्रस्ताव लेकर गए दास राज ने कहा और देवव्रत ने कहा आप पिताजी का सत्यवती से विवाह प्रस्ताव स्वीकार करें मैं वचन देता हूं कि मैं कभी राजा नहीं बनूंगा दसराज ने कहा मगर आपके बच्चे तोता अधिकारी बन सकते हैं तो देवव्रत ने तुरंत का मैं आपको वचन देता हूं कि मैं आजीवन विवाह नहीं करूंगा और ना ही संतान पैदा करूंगा दास राज देवव्रत की प्रतिज्ञा सुनकर स्टाफ धरा गया उसने सत्यवती का विवाह राजा के साथ करने की स्वीकृति दे दी इस प्रतिज्ञा के कारण ऑफिस में लाएं शांतनु और सत्यवती का विवाह संपन्न हुआ उनके चित्रांगद और विचित्रवीर्य नामक दो पुत्र हुए चित्रांगदा की युवावस्था में तथा विचित्रवीर्य की उसके विवाह के कुछ दिनों बाद वृद्धि हो गई उनकी पत्नियां थी अंबिका और अंबालिका सत्यवती बहुत दुखी थी क्योंकि राजन समाप्त हो रहा थ उसने अपने पुत्र ब्यास के स्मरण किया ब्यास हस्तिनापुर पहुंचे मां को प्रणाम करो ने पूछा व्यास ने उनकी दोनों बहुओं और राजमार्ग की दासी को पुत्र होने का आशीर्वाद दिया अंबिका का पुत्र धृतराष्ट्र अंबालिका का पुत्र पांडु और राजमहल की दासी के एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम भी दूर रखा राजा पांडु की मृत्यु हो गई सत्यवती ने पुनः प्याज के स्मरण किया व्यास आए और उन्होंने उनको संभावना थ व्यास ने तब तक सत्यवती बहुत बड़ी हो गई थी व्यास ने अपनी मां सत्यवती और दोनों बहुओं को लेकर के जंगल में चले गए व्यास ने राजस्व कधित होकर पूछा धृतराष्ट्र तुम परिवार के मुखिया हो तुमन पांडवों के साथ सर्वथा अनुचित व्यवहार किया है व्यास ने विदुर से भी प्रश्न किया विदुर भी लज्जित हुए बाद में पांडवों को वनवास हुआ वनवास से लौटकर युद्ध परम हुए 1 दिन युद्ध भूमि में दृष्टि और दुर्योधन आमने-सामने आ गए वह अपना वोट दुर्योधन पर चलाने वाले थे कि अचानक वह प्यासा पहुंचे और उन्होंने युधिष्ठिर को रोकते हुए कहा युधिष्ठिर रुको तुम्हारे भाई भीम ने दुर्योधन को मारने की प्रतिज्ञा की है बाद में युद्ध पूर्ण हुआ युधिष्ठिर का मनोबल बहुत कमजोर हो गया वह सब छोड़ कर के वापस स्वर्ग में चले जाना चाहते थ तो उनकी मनोबल बढ़ाने के लिए व्यास ने कथा सुनाई संघ और लिखित नामक दो ऋषि थे तो आश्रम के फल तोड़कर खा गए राजा द्वारा सजा सुनाया गया पुनः उनके हाथ वापस नदी में नहाने से वापस आ गए महाभारत की रचना गणेश जी की भूमिका समय बिता धृतराष्ट्र गांधारी और कुंती वृद्ध हो गए ऋषि व्यास उन्हें एक मां की लाश ने आश्रम ले गए वहां गांधारी कुंती और दृष्टांत ने अपने मृत पुत्रों को देखने की तीव्र इच्छा हुई व्यास ऐसे प्रसंग पर पांडवों की उपस्थिति चाहते थे उन्होंने पांडवों को संदेश भेजकर बुलवाया 1 दिन में सभी गंगा के तट पर एकत्र हुए बहुत राजवी जाने पर व्यास नदी में खड़े हो गए और उन्होंने मृतकों को नाम लेकर बुलाया एक-एक करके सभी नदी के किनारे उपस्थित हो गए 1 दिन दुर्योधन और उनके सारे भाई खड़े थे दूसरी और कर्ण अभिमन्यु और अन्य खड़े थे मित्रगण और अन्य सगे संबंधी भी उपस्थित थे सुबह होते ही परलोक से सभी मृतक अदृश्य हो गए उसके बाद 36 वर्ष के बाद श्री कृष्ण ने अपना शरीर छोड़ा इसे आज उनको बहुत पीड़ा हुई महर्षि व्यास अपनी तपस्या और योग साधना के कारण सैकड़ों वर्ष जीवित रह सकते थे महाभारत के 1 वर्षों बाद 1 दिन ब्रह्मा जी आश्रम हाय महर्षि व्यास ने उनका स्वागत किया फिर व्यास जी ने आश्रम में उनके आने का प्रयोजन पूछा तो उन्होंने कहा कि तुम महाभारत के प्रत्यक्षदर्शी हो यदि तुम महाभारत की कथा लिखोगे तो अच्छा होगा व्यास जी ने कहा ठीक है कथा का प्रसार व संपादन व्यास जी के शिष्यों ने किया हसीना पुर में अर्जुन के पुत राजा जनमेजय का राज्य था महर्षि व्यास नई वेदों को सरल करने के लिए चारबाग आयोजित किया ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद अथर्ववेद इन चारों वेदों में क्या है या उन्होंने स्पष्ट का इसी कारण है वेदव्यास कहा गया वेदव्यास जी के अनेक शिष्य है वैशंपायन पैर जैमिनी और सुमन तू महर्षि वेदव्यास जी ने शांतनु से जनमेजय तक सात पीढ़ियों का उद्धार पसंद है
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