भागीरथ

प्राचीन समय में कौशल नाम का एक राज्य था 16 वर्षीय भगीरथ राजा राज्य करते थे बचपन में ही अपने पिता से वंचित हो गए थे 16 वर्ष की आयु में कदम रखा तो माने उसकी विवाह एक सुंदर राजकुमारी से कर दिया वह महान राजा दिलीप के पुत्र थे जब राजा बनकर के दरबार में पहुंचे तो दरबारियों ने उनका स्वागत सगर के वंश की वृद्धि हो भगीरथ राजा की विजई हो दिलीप के पुत्र की विजई हो ऐसा जय खुश करने लगे जब दरबार समाप्त हुआ जब अपने महल में मंत्री के साथ लौटे उनके मस्तिष्क समय दो बातें चल रही थी सगर और दिलीप दिलीप के बारे में जानते थे क्योंकि वे उनके पिता थे परंतु सागर कौन था यह उन्हें ज्ञात नहीं था उन्होंने मंत्री से पूछा मंत्री ने उत्तर दिया महाराज को एक महान राजा थे जिन्होंने 100 अश्वमेघ यज्ञ पूरे किए थे उनके 60000 पुत्र थे उन्हीं के 1 से आप एक हो इस उत्तर से संतुष्ट नहीं हुए अपनी मां से पूछ ले मां के एहसास की हमारे वंश में सागर नाम के एक महान राजा थे माता का उत्तर था हां जब उसे 60000 पुत्र थे तो अभी उनके पुत्रों की और संबंधों की भीड़ लग जाती हम तो केवल 3 लोग ही हैं मां ने कहा बेटा तुम्हें पहले ही सारी कथा बतानी चाहिए थी अच्छा हुआ तुमने आज पूछ लिया सागर एक बहादुर सम्राट थे उन्होंने 99 असमय पूरे किए एक यज्ञ शेष रह गया था यह सब कुछ करने के बाद भी वह दुखी थे उन की दो पत्नियां थी परंतु एक भी संतान नहीं था जीवन में निराशा के कारण वे मंत्रियों के भरोसे राजा छोड़कर रानियों के साथ हिमालय में तपस्या करने के लिए चले गए व्रीगू प्रसारण व्रीगू महर्षि का आश्रम स्थल था राजा सगर इसे देखकर के प्रसन्न हुए और कुटिया बनाकर रोहिसा पत्नी के रहने लगे उनके कठिन तबसे भृगु ऋषि उनके सामने प्रकट हुए भृगु ऋषि ने उन्हें वरदान दिया तुम्हें एक पत्नी से एक उतरा होगा जो वंश वृद्धि करेगा एवं दूसरी से 60000 साथी बच्चे होंगे जो तुम्हारी महिमा बढ़ाएंगे वे प्रसन्न हुए परंतु पत्नियों को जानने की इच्छा हुई कि किसे एक और किसे 7000 पुत्र प्राप्त होगा ऋषि ने स्वयं निर्णय लेने को कहा किसी ने बड़ी रानी थी उसने एक पुत्र मांगा छोटी रानी ने साठ हजार पुत्रों की कामना की कुछ समय बीता दोनों को पुत्र प्राप्त हुए कैसी निकाय पुत्र हुआ जिसका नाम असमंजस रखा गया असमंजस एक पुत्र होने के कारण लाडला निकला लोगों के लाड प्यार के कारण खराब और उधम निकला वह परेशान करने लगा बच्चों को नदी किनारे बुला करके वह नदी में धक्का दे देता था जो बच्चों को तैरना नहीं आता तो सोचिए के डुबो देता था इस प्रकार के अनेक प्रकार के कृत्य करने लगे प्रजा ने राजा से शिकायत किया राजा ने उसे राज्य से बाहर निकाल देने का आदेश दिया चाहते हैं वह तपस्वी था इसलिए स्वतंत्र होना चाहता था उसके जाने के बाद जो मृत बच्चे थे पुनः जीवित हो उठे और अपने योग शक्ति के बल पर मोक्ष को प्राप्त किए असमंजस का एक उतरा था उसका नाम अंशुमन था अब राजा को सभी यज्ञ करने की इच्छा हुई उसने अपने सारे पुत्रों का स्वभाव और चाह रहा थ इसलिए हम सुमंत को सहने दल का सेनापति बनाया गय अंशुमन का सैन्य दल घोड़े के पीछे पीछे चलता रहा लेकिन इस अशोक कोई पकड़ता नहीं था इंद्र को भय सताने लगा इसलिए इंद्र ने गुप्त रूप से घोड़ा चौराहा और पाताल लोक में कपिल मुनि के आश्रम में उसे बांध दिया महर्षि कपिल में तपस्या कर रहे थे घोड़ा जब इधर उधर कहीं दिखा नहीं तो अंशुमन और उसे साथी चिंतित हुए निराश होकर अयोध्या लौट आया राजा को सारी घटना बताई राजा सगर वह चिंतित हुए उन्होंने अपने साठ हजार पुत्रों को घोड़े की खोज में भेजा पृथ्वी के सभी कोणों में उन्होंने ढूंढा पर घोड़े का कहीं नामोनिशान नहीं मिला निराशा से क्रोधी आने लगा जब पृथ्वी पर घोड़ा ना पा सके थे तो उन्होंने पृथ्वी को छेद करके पता लोग पहुंच गए इसी प्रकार में कपिल मुनि के आश्रम के पास पहुंचे वहां की सभी वृक्षों लताओं कानून तोड़ डाला इसी प्रकार बढ़ते हुए वहां पहुंचे जहां महर्षि कपिल मुनि समाधि स्थित है उनका घोड़ा भीमा विराजमान था उन्होंने सोचा कि मुन्नी घोड़ा चुराकर तपस्या का बहाना कर रहा है इसलिए सभी सागर पुत्र उसकी और चिल्लाते हुए दो पड़े मासी कपिल की तपस्या और उन्होंने साठ हजार पुत्रों को तपोबल से भस्म करके राख का ढेर बना दिया बहुत दिनों तक बहुत दिनों तक सागर पुत्र वापस नहीं लौटे तो राजा को बहुत चिंता हुई स्वयं घोड़े खोज में नहीं जा सकते थे तो उन्होंने अपने नाती हम सुमन को इस कार्य के लिए भेजा वे ढूंढते ढूंढते पृथ्वी के चक्कर काटते हुए पाताल लोक पहुंचा कपिल मुनि के आश्रम तक पहुंचा जहां वह राख का ढेर पड़ा हुआ था आगे जाने का रास्ता नहीं दिख रहा था लेकर आ गया तो काश वाडी से पता चला कि यह पर्वत तुम्हारे चाचा को का है जो कपिल होनी है कोर्ट में भस्म हो गया है आकाशवाणी सुनकर से बहुत निराशा हुआ इधर उधर पानी के लिए देखा परंतु वहां कोई पानी का ढेर नहीं था ऊपर आकाश में गरुड़ विदेव दिखे गरुड़ जी ने अंशुमन से कह राजकुमार चिंता मत करो तुम्हारे यह सभी चाचा संसार की भलाई के लिए मृत्यु को प्राप्त हुए हैं उनकी आत्मा को सादर क्रिया से शांति नहीं मिलेगी वह मुन्नी के क्रोध का शिकार बने हैं उन्हें तभी मुख से मिलेगा जब देवी गंगा को स्वर्गभूमि पर लाया जाएग गंगाजल के स्पर्श से ही मोक्ष पा सकेंगे इसलिए पहले तो मिस घोड़े को लेकर घर जाओ बतावा घोड़े को लेकर आजा लौट गए परंतु जब स्वर्ग से गंगा नहीं आती तब तक पुत्रों को मोक्ष नहीं मिल सकता था यही चिंता उन्हें सताया जा रही थी अंत में निराश होकर के अपने राज्य की बागडोर अंशुमन के सुपुत्र कर तपस्या के 11 चले गए अपने पूर्वजों को मोक्ष दिलाने का दायित्व अंशुमन तक के ऊपर आ गया उसका भी मनराज का आदमी नहीं लगता था इसलिए उन्होंने अपने पुत्र दिलीप को राज्यसभा अरे तपस्या के लिए चल दिए भगीरथ की मां उन्हें या कहानी सुनाते हुए फिर कहने लगी कि राजा दिलीप ही तुम्हारे पिता थे उनका भी कोई संतान नहीं था अंत में हमने गुरु वशिष्ठ और नंदिनी गौ माता की सेवा कर तुम्हें प्राप्त किया यही तुम्हारे वंशिका था तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है अब मुझे देखना कि तुम क्या कर सकते हो भगीरथ ने भी राज्य को त्याग दिया उसके समय बहुत बड़ी चुनौती थी मां से आशीर्वाद लेकर वह तपस्या के लिए निकले गंगा नदी को पृथ्वी पर लाने के लिए ब्रह्मा जी को प्रसन करने के लिए तब आरंभ किया हिमालय की ओर चल पड़े सर्वप्रथम पद्मासन की स्थिति में उन्होंने तब शुरू किया प्रीति कुछ दिनों बाद शीत ऋतु में सरोवर में खड़े होकर उन्होंने तब आरंभ किया कृष्ण प्रारंभ होने पर तपस्या और अधिक उग्र हुआ उन्होंने पांच प्रकार की अग्नि यों के बीच पंचाग्नि तपस्या रब की चारों और की अग्नि और ऊपर से सूर्य पांचवी अग्नि के रूप में विराजमान थे ऐसे कठिन तपस्या राम हुआ उन्होंने अपना भोजन भी बदल दिया प्रारंभिक कुछ दिनों तक उन्होंने एक बार फिर महीने में एक बार फिर भोजन करने त्याग दिया केवल जलपरी रहने लगे अंत में हवा ही उनका एकमात्र सहारा थ ब्रह्मा जी उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए भगीरथ ने अत्यंत प्रसन्न होकर उनका अभिवादन किया और कहा मेरे पूर्वज पाताल लोक में मृत पड़े हैं अभी व राख के ढेर के रूप में हैं उन्हें स्वर्ग प्राप्त हो इसलिए गंगा जी को पेश कर मेरी सहायता करें ब्रह्मा जी ने कहा तुम्हारी इच्छा पूरी होगी परंतु गंगा जी का प्रवाह बहुत शक्तिशाली है अतः आप शिव जी को प्रसन्न करो कि वह गंगा जी का प्रवाह को कम करने में आपकी सहायता करें भागीरथ ने तपोबल से शिवजी को प्रसन्न किया गंगा को उन्होंने अपने जगह में नियंत्रित किया भगवान शिव प्रसन्न होकर बोले तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हुआ मैं गंगा अपनी जटाओं से स्वतंत्र करूंगा उसे साथ शाखा / करू सातवीं शाखा तुम्हारे साथ तुम्हारी इच्छा अनुसार जाएगी इतना कहकर शिवजी ने गंगा को मुक्त कर दिया गा 3 शाखाएं पूर्व का और तीन पश्चिम का अनुसरण करेगी पुणे में शिव जी को नमस्कार कर दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े शर्मीली लकड़ी लड़की की भांति गंगा ने उनके पीछे चलना शुरू किया भागीरथ आगे-आगे गंगा उनके पीछे पीछे चलने लगी कई प्रकार के स्थानों से हुए चलते चलते रास्ते में एक आश्रम घोषित सूरत फल और फूल में संपन्न शांति स्थान मिला यह जश्ने ऋषि का आश्रम था उन्हें भक्ति और श्रद्धा के साथ आश्रम में प्रवेश किया कहते हैं कि गंगा यहां पर थोड़ी नटखट स्वरूप दिखाने लगी इसलिए गंगा नदी के कारण की समाधि में विघ्न पड़ा नटखट लड़की को सबक सिखाना चाहिए ऐसा सोचकर पवित्र गंगा को हथेली में रखकर उन्हें एक घूंट में पीलिया इधर भगीरथ तो अपने पीछे गंगा को लेकर बहुत चिंतित हुए उन्हें डर लगा कि दूसरी बाधा उत्पन्न हो गई हो उन्होंने आश्रम में जाकर रिसीव से कहा की गंगा नहीं दिख रही है उन्होंने ऋषि ने कहा कि मुझे पी गया हूं अब उसे सबक सिखाना चाहता था भगीरथ के प्रार्थना से ऋषि ने उन्हें अपने कानों से मुक्त किया और जानू ऋषि की कृपा जो प्रणाम का भागीरथ उस आश्रम से निकले उन्हें डर था कि किसी राह में किसी प्रकार की दूसरी कठिनाई ना जाए वह पूर्वजों द्वारा पृथ्वी के अंदर तक है पाताल प्रवेश करने का छोटा चित्र विशाल क्षेत्र हो गया था और वहां बड़ी मात्रा में जल का स्रोत बहाने लगा सगर पुत्रों द्वारा निर्मित यह स्थान सागर और अब महासागर के नाम से प्रख्यात है भागीरथ पाताल लोक पहुंचकर राख के पर्वत के पास खड़ा हो गया है उसने गंगा से प्रार्थना की है माता या मेरे मृत पूर्वजों की राह का पर्वत है इस छूकर उनकी आत्मा को मोक्ष प्रदान करो अबे पवित्र हो गए सर्वप्रथम गंगा का नाम भागीरथी पड़ा क्योंकि एक पुत्र की भांति उसने भगीरथ का अनुसरण किया फिर तीन पति का नाम से विख्यात हुई क्योंकि वह तीनों लोग के मार्ग से प्रभावित हुई ऋषि जहानों के काम से बहाने कारण उनका नाम जान जहान्वी अभी पड़ा

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