बस्तर के क्रांति दूत 5
बस्तर के क्रांति दूत :- पंचम पुष्प
वन पुत्र नागुल दोरला
प्राचीन समय से वन बस्तर रियासत का महत्वपूर्ण संसाधन रहा है ।बस्तर के आदिवासियों के लिए वन एवं वन्य उपज उनकी आजीविका का प्रमुख साधन रही है ।दक्षिण बस्तर में अंग्रेजों की शोषण व गलत वन नीति से आदिवासी काफी असंतुष्ट थे ।
कालांतर में दक्षिण बस्तर के आदिवासियों में अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह की भावना जागृत हुई ।
अंग्रेजों द्वारा साल के वृक्ष को काट कर बेचते थे। यह बस्तर के लोगों के साथ धोखा था ।
इसलिए अंग्रेजो के खिलाफ आदिवासियों ने 1859 ईसवी में विद्रोह के झंडे को फहरा दिया।
बस्तर के इतिहास में यह विद्रोह कोई विद्रोह के नाम से प्रसिद्ध है । नागुल दोरला फोतकेल, जमीदारी का जमीदार था ।
बस्तर में ब्रिटिश सरकार की वन नीति एवं यहां की वनों का ठेका हैदराबाद के व्यापारियों को दिए जाने के विरुद्ध नागुल दोरला को भोपालपटनम के जमीदार राम भाई और भेजी के जमीदार जुग्गाराजू को अपने पक्ष में कर विद्रोह कर दिया ।
फोतकेल ,भेजी और भोपालपटनम के डंडामी
माड़ियाओ को उस समय कोई कहा जाता था।
इसलिए यह विद्रोह कोई विद्रोह के नाम से प्रसिद्ध हुआ । नागुल दोरला के नेतृत्व में फोतकेल, भेजी और भोपालपटनम के जमीदारों और आदिवासियों ने सर्व अनुमति से निर्णय लिया की अब बस्तर के साल वृक्ष को काटने नहीं दिया जाएगा ।
अपने इस निर्णय की सूचना उन्होंने हैदराबाद के ब्रिटिश ठेकेदारों को दे दी ।
ब्रिटिश सरकार ने नागुल दोरला और उनके समर्थकों के निर्णय को अपनी प्रभुसत्ता को चुनौती मानकर वृक्षों की कटाई करने वाले मजदूरों की रक्षा करने के लिए बंदूकधारी सिपाही भेजें ।
आदिवासियों को जब यह खबर लगी तो जलती हुई मसालों को लेकर जंगलों की ओर दौड़े ।
उन्होंने लकड़ी के तारों को जला दिया आरा चलाने वालों को सिर काट डाला ।
आंदोलनकारियों ने 1 साल वृक्ष के पीछे एक व्यक्ति के सिर का नारा दिया ।
इस जन आंदोलन से अंग्रेज सरकार और हैदराबाद निजाम घबरा उठा।
अंग्रेजों और निजाम ने नागुल दोरला के साथ समझौता किया और जंगलों से मजदूरों ठेकेदारों को हटा दिया तथा बाध्य होकर उसने ठेकेदारी प्रथा को ही समाप्त कर दिया । वृक्षों की कटाई में हैदराबाद के ठेकेदारों का साथ बंजारों ने भी दिया था ।
नागुल दोरला के नेतृत्व में दंडामी माड़िया आदिवासियों ने बंजारों के कारवां को जगह-जगह लूटा ।
ग्लॉसफर्ड नामक अंग्रेज अधिकारी के प्रयासो के कारण बंजारों और विद्रोहियों के मध्य समझौता हुआ।
और युद्ध की स्थिति टल गई ।
नागुल दोरला के नेतृत्व में दक्षिण बस्तर के आदिवासियों ने वनों की रक्षा के लिए जो विद्रोह किया। वह आपने किस्म का अनोखा विद्रोह था।
वे हरे भरे वृक्षों को नष्ट नही होने देना चाहते थे। नागुल दोरला ने आदिवासियों को लेकर यह लड़ाई अंग्रेजों के शोषण के विरुद्ध भालो और तलवारों से लड़ी।
और इस लड़ाई में विजय हासिल की ।
साल वनों की रक्षा के लिए नागुल दोरला के नेतृत्व में आदिवासियों ने जो आहुति दी।
वह बस्तर के इतिहास में अमर रहेगी ।
नागुल दोरला जैसे महानायक के त्याग को मान्यता ना देना यह हमारी भूल है ।
यह बात स्पष्ट है कि बस्तर क्षेत्र में प्रकृति प्रेमी ,वृक्षों को बचाने वाला, वनों की कटाई को रोकने वाला, एक योद्धा के रूप में नागुल दोरला हमेशा खड़े रहे ।
और अपनी आखरी सांस तक वनों की सुरक्षा व वृक्षों की कटाई पर काम करते रहे।
ऐसे पुत्र नागुल दोरला को इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा और उनको स्मरण किया जाएगा ।
जय भारत
आमचो बस्तर
आमचो माटी
साभार:- बस्तर के क्रांति दूत पुस्तक से
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