बस्तर के क्रांति दूत 6
बस्तर के क्रांति दूत :- षष्ठम पुष्प
बस्तर केसरी लालकालेंद्र सिंह
बस्तर केसरी लाल कालेंद्र सिंह बस्तर के माटी पुत्र थे। वे बस्तर में 1910 ईसवी की क्रांति अथवा भूम काल के जनक थे।
1910 ईसवी की क्रांति के माध्यम से बस्तर में मुरिया राज की स्थापना करना चाहते थे ।
बस्तर की अस्मिता के लिए लाल कालेंद्र सिंह ने अपने प्राणों तक की परवाह नहीं की।
लाल कालेंद्र सिंह बस्तर के दीवान दल गंजन सिंह के पुत्र थे। दल गंजन सिंह बस्तर नरेश महिपाल देव के पुत्र थे ।
इनकी मृत्यु के बाद लाल कालेंद्र सिंह 1881इसवी में बस्तर रियासत के दीवान बनाए गए ।
लाल कालेंद्र सिंह ने 1881- 1886 तक काफी सफलता पूर्वक बस्तर रियासत का शासन चलाया था।
किंतु 1886 में ही अंग्रेजों ने लाल कालेंद्र सिंह के अधिकार छीन लिए, लाल कालेंद्र सिंह अपने अधिकारों के लिए लड़ते रहे 1980 में पंडा बैजनाथ को बस्तर रियासत का प्रशासक बनाए जाने से बस्तर की राजमाता स्वर्ण कुंवर और लाल कालेंद्र सिंह काफी रुष्ट थे ।
इसे वे बस्तर की अस्मिता पर चोट समझते थे, उन्हें डर था कि बस्तर कहीं अंग्रेजों का उपनिवेश मात्र ही बन कर न रह जावे।
अंग्रेजों ने लाल कालेंद्र सिंह की बहुत सी भूमि को सुरक्षित वन के अंतर्गत ले लिया था ।सरकार ने उनकी भूमि के बदले जो क्षतिपूर्ति दी थी उससे वह संतुष्ट नही थे ।
लाल कालेंद्र सिंह आदिवासियों के बीच काफी लोकप्रिय थे। वे आदिवासियों की शिकायतें सुनने व उन्हें दूर करने के लिए सदैव तत्पर रहते थे ।
1891 ईस्वी से लाल कालेंद्र सिंह तडोकी में रहने लगे ।
यह अंतागढ़ तहसील में स्थित एक गांव है जो जगदलपुर से 100 मील की दूरी पर है।
तडोकी में रहकर लाल कालेंद्र सिंह ने आदिवासियों को अंग्रेजों के विरुद्ध भड़काया और कहा कि अंग्रेजों के कारण मां दंतेश्वरी नाराज है।
अंग्रेजों को यदि बस्तर से बाहर नही भगाया गया तो मां दंतेश्वरी देवी हम सब पर अप्रसन्न होगी ।
अक्टूबर 1890 दशहरे के दिन राजमाता स्वर्ण कुंवर ने लाल कालेंद्र सिंह की उपस्थिति में तडोकी में आदिवासियों को अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति के लिए प्रेरित किया।
तडोकी की सभा में लाल कालेंद्र सिंह ने आदिवासियों में से नेतानार के क्रांतिकारी गुंडाधुर को 1910 ईसवी की क्रांति का नेता बनाया ।
एक बहादुर व्यक्ति को विद्रोह का संचालन करने के लिए नेता मनोनीत किया ।
लाल कालेंद्र सिंह के मार्गदर्शन में अंग्रेजों के विरुद्ध कांति करने के लिए एक गुप्त योजना बनाई गई ।
जनवरी 1910 में तडोकी में पुनः गुप्त सम्मेलन हुआ इस सम्मेलन में लाल कालेंद्र सिंह के समक्ष क्रांतिकारियों ने कसम खाई की बस्तर की अस्मिता के लिए अपना जीवन और धन कुर्बान कर देंगे ।
तडोकी के मंदिर में सभी ने संकल्प लिया कि वह देवी दंतेश्वरी के वस्त्र में कलंक का दाग नहीं लगने देंगे ।
देवी की पूजा के बाद लाल कालेंद्र सिंह ने आदिवासी नेताओं को एक कटार भेंट की क्रांतिकारियों ने यह कटार एक हाथ से दूसरे हाथ में देते हुए क्रांतिकारियों को शस्त्र उठाने के लिए प्रेरित किया ।
पोलिटिकल एजेंट डी ब्रेड क्रांतिकारियों की योजना से बेखबर रहा ।
1 फरवरी 1910 ईस्वी को समूचे बस्तर में क्रांतिकारियों ने क्रांति की शुरुआत की ।
लाल कालेंद्र सिंह ने विद्रोही जनता को संदेश दिया कि वह पुलिस थानों और जंगल विभागों के ठिकानों को जला दें। लाल कालेंद्र सिंह के कहने पर विद्रोहियों ने कुकानार, करंजी पर आक्रमण किया।
7 फरवरी 1910 ईस्वी को गीदम की मुक्त सभा में मुरिया राज की घोषणा की गई ।
विद्रोहियों ने बारसूर ,कोन्टा ,फुटरो , दंतेवाड़ा , कुआंकोंडा, भोपालपटनम ,जगरगुंडा पर अधिकार प्राप्त कर लिया।
अबूझमाड़ क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले छोटे डोंगर और कुतुल में विद्रोहियों का अंग्रेजों के साथ भयंकर युद्ध हुआ।
मूरिया क्षेत्र में ब्रिटिश सेना ने प्रवेश कर क्रांतिकारियों को क्षति पहुंचाई।
8 फरवरी से 12 फरवरी के मध्य अंग्रेजों ने केशकाल बहिगाव, में क्रांतिकारियों का दमन किया।
16 फरवरी 1910 ईस्वी को इंद्रावती के खड़क घाट में अंग्रेजों और क्रांतिकारियों में भीषण संघर्ष हुआ इस संघर्ष में अंग्रेज सफल रहे ।
24 फरवरी 1910 ईस्वी को गंगामुंडा में क्रांतिकारी परास्त हो गए।
गंगामुंडा की सफलता के बाद अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों के दमन के लिए रणनीति बनाई। 26 फरवरी 1980 को लाल कालेंद्र सिंह तथा अन्य प्रमुख क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने गिरफ्तार किया ।
गिरफ्तारी के बाद अंग्रेजों ने तोड़ोकी पर हमला किया और लाल कालेंद्र सिंह के मकान को जला दिया ।
आदिवासियों द्वारा विरोध करने पर उन्हें अंग्रेजों ने गोलियों से भून दिया ।
अंग्रेजों ने आदिवासी क्षेत्रों पर व्यापक हमले किए और क्रांतिकारियों को कठोर कारावास की सजा दी ।
हजारों आदिवासियों को कोड़ा लगाने का आदेश दिया गया लाल कालेन्द्र सिंह को नागपुर से 175 मील दूर पर स्थित एलिचपुर के बंदीगिरी में डाल दिया।
जहां 1916 में उनकी मृत्यु हो गई ।
लाल कालेंद्र सिंह जननायक थे।
बस्तर की अस्मिता की रक्षा के लिए उसने खुशी खुशी अपना बलिदान दे दिया।
वे आदिवासियों के मसीहा थे।
ब्रिटिश राज्य के प्रति उनकी साहस पूर्ण चुनौती ने उन्हें बस्तर के इतिहास में महान क्रांतिकारी बना दिया
जय भारत
आमचो बस्तर
आमचो माटी
साभार:- बस्तर के क्रांति दूत पुस्तक से
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