शहीद गुंडाधुर
मेरे प्यारे भाइयों ,
नमस्कार
आपने आजादी की लड़ाइ की कई कहानी सुनी होगी। अनेकों क्रांतिकारियों के जीवनी पढी होगी। क्योंकि भारत की धरती वीरों से खाली नहीं है ।आजादी की लड़ाई हर व्यक्ति ने लड़ा लड़ा। प्रत्येक मां का बेटा इस देश की रक्षा के लिए तैयार था। लक्ष्य था भारतवर्ष की आजादी, अंग्रेजों से मुक्ति ।
अपना बस्तर भी अंग्रेजो के कब्जे में था ।
बस्तर व कांकेर की रियासतें भी अंग्रेजों के अधीन थी। अंग्रेजों का शोषण चरम पर था, वनवासी समाज को अंग्रेजो के द्वारा सताया जा रहा था, कई प्रकार के जुल्म ढाए जा रहे थे ।
प्रतिदिन शोषण बढ़ता ही जा रहा था।
और इस प्रकार से अनेकों अत्याचार इस समाज को सहना पड़ रहा था ।ऐसी स्थिति में अंग्रेजों से विद्रोह करने के लिए लिए बस्तरपुत्र गुंडाधुर खड़े हुए, साहस व शक्ति से भरपूर गुंडाधुर के नेतृत्व में अंग्रेजो के खिलाफ बिगुल फूंका गया।
और उसका नाम दिया गया मुक्ति संग्राम - भूमकाल विद्रोह
नेतानार नामक गांव में रहने वाला गुंडाधुर बस्तर में हो रहे अत्याचार के खिलाफ समाज को संगठित किया ।
अक्टूबर 1910 को बस्तर दशहरा के पवित्र दिवस पर सशस्त्र क्रांति का शुरुआत हुआ ।
घोटूल में आने वाले युवकों व नौजवानों को शस्त्र अस्त्र के लिए में तैयार किया गया ।
जनवरी 1910 में तोड़ोकी नामक स्थान पर एक गुप्त सम्मेलन किया जाता है ।
और तोड़ोकी की मंदिर में सभी लोगों ने यह संकल्प लिया कि बस्तर की माटी और मां दंतेश्वरी के वस्त्र में कभी भी दाग लगने नहीं देंगे।
और उस संकल्प को पूरा करने के लिए सशस्त्र कांति का आगाज किया गया।
1 फरवरी 1910 में संपूर्ण बस्तर में क्रांति की ज्वाला से भूचाल आ गया, प्रत्येक जवान बस्तर की रक्षा के लिए तत्पर था ।
देशभक्ति की भावना प्रबल थी ,गुंडाधुर के नेतृत्व में अंग्रेजों के ठिकानों पर आक्रमण हुए आग लगाई गई ,पुलिस चौकी और कार्यालयों में भी आक्रमण हुआ।
एक साथ अंग्रेजों के ठिकानों पर आक्रमण हुआ जिससे अंग्रेजों को बड़ा नुकसान हुआ।
और यह योजना इतनी सफल और व्यापक थी, कि जो चाहते थे वह पूरा हुआ ।
और अंग्रेजों को इस बात की भनक भी नहीं लगी।
यह एक सफल क्रांतिकारी का उदाहरण था
7 फरवरी 1910 को गीदम में एक गुप्त सभा रखा गया।
जिसमें गुंडाधुर भी उपस्थित थे ।
राजमाता स्वर्ण कुँवर जी ने घोषणा की बस्तर में ब्रिटिश सरकार समाप्त होने वाला है। और शीघ्र ही मुरियाराज स्थापित होगी।
सभी ने संकल्प लिया और क्रांति का आगाज हुआ ।
इस घोषणा के बाद सभी कांतिकारियो में दोगुना उत्साह आ गया ।
और उसी दिन 7 फरवरी को गीदम पर पूर्ण अधिकार प्राप्त हो गया।
पर अंग्रेज शांत कैसे रह सकते थे, उन्होंने गुंडाधूर को पकड़ने जी का योजना बनाई, षड़यंत्र किया, परंतु अंग्रेजो के नाक में दम कर के रखने वाले गुंडाधूर तो सफल क्रांतिकारी थे।
अंग्रेजों की योजनाओं को भाप लेते थे और निर्धारित स्थान से दूसरे स्थान पर पलायन कर जाते थे ।
एक ऐसी घटनाएं 16 फरवरी 1910 को जगदलपुर के इंद्रावती नदी के घाट पर भीषण युद्ध हुआ ।
अंग्रेजों और गुंडाधूर के साथियों के साथ ।
परंतु गुंडाधूर वहां से बच निकले ।
एक से 15 फरवरी 1910 तक जगदलपुर शहर पूरी तरह से गुंडाधूर के कब्जे में बना रहा।
मगर अंग्रेज अधिकारी गियर के कूटनीति के कारण जगदलपुर क्रांतिकारियों के यहां से निकल गया।
और उसने कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया ।
फरवरी 1910 को जगदलपुर से 8 किलोमीटर की दूरी पर अलनार नामक गांव में अंग्रेजों व क्रांतिकारियों के मध्य युद्ध हुआ ।
अलनार में गुंडाधुर ने एक बड़ी सेना एकत्र करके रखा था। जिसका उद्देश्य था, जगदलपुर पर आक्रमण करना परंतु डरपोक अंग्रेज अधिकारी गियर ने अंधेरी रातों का फायदा उठाते हुए सोते हुए क्रांतिकारियों पर गोलियां चला दी ।
कई क्रांतिकारी गोलियों से छलनी कर दिया गया और वो शहीद हो गए।
लेकिन गुंडाधूर वहां से भाग निकले, इसके बाद गुंडाधूर व उसके साथी डिवरी धुर जंगलों की वादियों में घूमते रहे ।
और इस प्रकार यह विद्रोह बिखर सा गया।
परन्तु एक कुशल संगठक गुंडाधूर युध्द के दौरान गोलियों की बौछार के बीच में भी क्रांतिकारियों का उत्साह बढ़ाने रहते थे।
गुंडाधूर अंग्रेजों के नाक में दम भरने वाला ।
गुंडाधूर यानी उत्साह व साहस का प्रतीक
इसलिए अंग्रेज सरकार ने गुंडाधुर को जिंदा या मुरदा पकड़ कल लाने पर ₹10000 का इनाम उस समय रखा था।
दोस्तों आज भी घरों में गुंडाधूर की क्रांति की कहानी सुनाई जाती है । गुंडाधूर बस्तर के सच्चे सपूत है।
वह बस्तर के लिए जिये
इस माटी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया ।
बस्तर सदैव उनका स्मरण करता रहेगा।
आने वाली कई पीढ़ियों तक इस महामानव की साहस की कथा सुनाई जाएगी ।
ऐसे वीर क्रांतिकारी को हमारा नतमस्तक है
आमचो बस्तर
आमचो माटी
साभार :- बस्तर के क्रान्तिदूत, पुस्तक
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