बस्तर के क्रांतिदूत 2
बस्तर के क्रांति दूत का द्वितीय पुष्प:-
शहीद शिरोमणि गेंदसिंह
गेंदसिंह बस्तर रियासत के अंतर्गत आने वाली जमीदारी परलकोट के जमीदार थे।
वर्तमान में परलकोट कांकेर जिले के दक्षिण पश्चिम में स्थित है। डी ब्रेट के अनुसार परलकोट के जमीदार की उपाधि भूमिया राजा की थी ।
भूमिया राजा इन्हें इसलिए कहा गया क्योंकि इनके पूर्वज चट्टान से निकले थे ।पुराना किला नारायण पाटन आज भी है ,और यहां पत्थर की चट्टान है, जिसमें चिन्ह अंकित है। उसमें से निकलकर राजा समीप में बैठे थे ।
प्राचीन काल में परलकोट एक राज्य था ।यह सब तमाडिया राज्यों में से एक था ।
काकतीय वंश के समय पलकोट उत्तर पश्चिम के प्रमुख जमीदारी थी ।बस्तर में मराठों और ब्रिटिश अधिकारियो की उपस्थिति से आदिवासियों को अपनी पहचान का खतरा उत्पन्न हो गया था।
परदेसी सभ्यता से अबूझ माड़िया खतरा महसूस करने लगे थे ।मराठों और अंग्रेजों की शोषण नीति से अबूझमाड़िया तंग आ चुके थे ।
गेंद सिंह के माध्यम से अबूझमाडिया एक ऐसे संसार की रचना करना चाहते थे ।जहां लूस खटोर और शोषण ना हो, यह विचार उन में मराठों और अंग्रेजों के प्रति बदले की भावना के कारण पैदा हुए थे। गेंद सिंह के आहवान पर अबूझमाड़िया आदिवासी 24 दिसंबर 1824 ईसवी को परलकोट में एकत्रित होने लगे ।एकत्रित होने के बाद गेंद सिंह के नेतृत्व में अबूझमाड़िया ऐसे सुनहरे बस्तर की रचना करना चाहते थे ,जो इनके मिथकीय नायक कर्ण के साम्राज्य से मिलता-जुलता हो।
गेंदसिंह के नेतृत्व में मराठों और अंग्रेजों के विरुद्ध परलकोट से विद्रोह की शुरुआत हुई।
विद्रोहियों ने सर्वप्रथम मराठों को रसद की पूर्ति करने वाले बंजारों को लूटा ।
मराठा तथा अंग्रेज अधिकारियों पर घात लगाना प्रारंभ कर दिया।
अबूझमाड़िया धावड़ा वृक्ष की टहनियों को विद्रोह के संकेत के रूप में एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजते थे ।
पत्तों के सूखने से पहले वर्ग विशेष को विद्रोहियों के पास जाने की हिदायत थी ।
कम समय में पूरे माड अंचल में विद्रोह की चिंगारी फैल गई थी ।
गेंदसिंह के नेतृत्व में विद्रोही आदिवासी किसी मराठा या अंग्रेज को पकड़ते थे, तो उसकी बोटी बोटी बोटी कर डालते थे ।विद्रोही मराठा सरकार द्वारा लगाए गए नए करो का विरोध करते थे ।विद्रोह का संचालन अलग-अलग टुकड़ियों में मांझी लोग करते थे ।
रात्रि में विद्रोही घोटूल में इक्कठा होते थे और अगले दिन की योजना बनाते थे। विद्रोहियों का प्रमुख लक्ष्य विदेशी सत्ता को धूल चटाना व बस्तर को गुलामी से मुक्त कराना था। मिस्टर एवेन्यू के निर्देश पर चांदा के पुलिस अधीक्षक कैप्टन पेब ने मराठा और अंग्रेजो के बल पर 12 जनवरी 1825 ईसवी तक विद्रोहियों का बुरी तरह दमन किया था गेंदसिंह को गिरफ्तार कर 20 जनवरी 1825 को उसके महल के सामने फांसी दे दी गई ।
गेंदसिंह का बलिदान बस्तर भूमि की मुक्ति के लिए एक अविस्मरणीय विशाल अध्याय है ।
गेंदसिंह का उत्सर्ग काल के निकट पर उभरी एक स्वर्ण रेखा की भांति है।
अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम शंघनाद करने वाले गेंदसिंह ही थे ।
उनका साहस अनूठा और अविस्मरणीय है प्रत्येक बस्तर वासी का सर गर्व से ऊँचा हो जाता है कि बस्तर जैसे पिछड़े आदिवासी बहुल आरण्यक अंचल में स्वतंत्र चेतना के प्रथम बीजारोपण के लिए उर्वर भूमि मिली ।
गेदसिंह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में बस्तर के ही नहीं वरन संपूर्ण छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद थे ।
आश्चर्य है ऐसे महान व्यक्तित्व का आज तक कोई स्मारक भी नहीं बना।
आमचो बस्तर
आमचो माटी
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