बस्तर की क्रांति दूत 8
बस्तर की क्रांति दूत :- अष्टम पुष्प
अमर शहीद हूंगा मांझी मांझी
बस्तर की क्रांति में अनेकों युद्ध हुए जिसमें खडग घाट का युद्ध बस्तर के इतिहास में विशेष महत्व रखता है।
यह युद्ध आदिवासियों ने 16 फरवरी 1910 ने 16 फरवरी 1910 को हूंगा मांझी और गुंडाधुर के नेतृत्व में अंग्रेजों के साथ इंद्रावती के खड़क घाट में लड़ा था ।
हूँगा मांझी और गुंडाधुर के नेतृत्व में 50000 आदिवासी अंग्रेजों से युद्ध करने के लिए इंद्रावती नदी के खडग घाट पर एकत्र हुए थे ।
क्रांतिकारी आदिवासी जगदलपुर की बाहरी सीमा पर अंग्रेज सेना को घेरना चाहते थे ।उन दिनों इंद्रावती नदी पर पूल का अभाव था बस्तर के पूर्व अंग्रेज प्रशासक गेयर आदिवासियों को पांच दलों में योजनाबद्ध तरीके से एकत्रित देख आश्चर्यचकित हो गया ।
धूर्त गेयर ने ने आदिवासियों को यह झूठा आश्वासन दिया कि वह उनसे लड़ने के लिए फौज नहीं लाया है ।वह पूर्व की तरह उनके दुख दर्द को जानने के लिए आया है ।अंग्रेजों से लड़ने के लिए तैयार आदिवासियों ने गियर की बातों पर विश्वास किया और वह गियर द्वारा लाई गई कार को देखने में मगन हो गए देखने में मगन हो गए हो गए।
आदिवासियों के लिए गियर की मोटर कार कार मोटर कार कार की मोटर कार कार मोटर कार कार कौतूहल व आश्चर्य की वस्तु थी। क्योंकि ऐसा कार बस्तर के आदिवासियों ने पहली बार देखा पहली बार देखा था। आदिवासी गियर पर विश्वास कर मोटर कार को देखने को देखने कार को देखने उसके चारों और भारी संख्या में एकत्रित होने लगे ।
अंग्रेज पुलिस बल को यह लगा कि आदिवासी उन पर पर हमला कर रहे हैं ।गेयर ने पुलिस बल को आदिवासियों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया ।
अंग्रेज पुलिस बल द्वारा जब बंदूकों से दनादन गोलियां चलाई गई तब हूँगा मांझी ने जादुई शक्ति शक्ति जादुई शक्ति शक्ति का प्रयोग करते हुए कुछ समय के लिए अंग्रेज पुलिस दल की की बंदूकों को निष्क्रिय कर दिया।
गेयर, डी ब्रेड ब्रेड, पुलिस अधीक्षक और रेनडाल इस दृश्य को देखकर आश्चर्यचकित हो गए हो गए ।
गेयर ने आस-पास पेट्रोल छिड़कवा कर उसमें आग लगवा दी दी। इस घटना के बाद आदिवासियों एवं अंग्रेजों के मध्य इंद्रावती के खड़ग घाट पर घमासान युद्ध होता रहा ।
यह युद्ध लगातार 6 घंटे घंटे तक चलता रहा ।
इस युद्ध में विद्रोही सेना के 10,000 आदिवासी आदिवासी सैनिक मारे गए थे और असंख्य सैनिक घायल हुए थे ।
खड़गघाट के युद्ध में में क्रांतिकारी हूँगा मांझी ने अपनी वीरता और साहस का परिचय दिया था। अंग्रेज सेना की प्रचंड गोलीबारी के कारण होगा मांझी लहूलुहान हो गए और वीरगति को प्राप्त हुए।
अंग्रेजों की बंदूकों के आगे धनुषधारी क्रांतिकारी टिक न सके न सके न सके और बुरी तरह परास्त हो गए। खड़क घाट का युद्ध का युद्ध निर्णयात्मक था।
इस युद्ध में अंग्रेजो को बस्तर पर शासन करने का अवसर करने का अवसर प्रदान किया था। किंतु इस युद्ध ने प्रमाणित कर दिया की आदिवासी अंग्रेजी शासन से संतुष्ट नहीं हैं ।
अंग्रेजों के दस्तावेज के अनुसार खड़क घाट के युद्ध में 5 आदिवासी मारे गए थे। किंतु वास्तविकता यह है कि इस युद्ध में हजारों क्रांतिकारी आदिवासी मारे गए थे जिनमें हूंगा मांझी ,आयतू ,एकड़ा ,कोला, रेका , भीमा ,बीज्जा, बोडी प्रमुख नाम है ।
अंग्रेजों ने खड़गघाट के युद्ध को छल कपट और बंदूकों की नोक पर जीता था।
हूँगा मांझी बस्तर की अस्मिता के लिए बलि वेदी पर चढ़ गए।
वर्षों तक हूँगा मांझी अपनी वीरता के लिए आदिवासियों के दिलों पर अंकित रहेंगे।
आमचो बस्तर
आमचो माटी
जय भारत
साभार :- बस्तर के क्रांति दूत पुस्तक से
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