व्यक्तिगत गीत

गीत 
१.अगर हम नही 
२.अनेकता में ऐक्य मंत्र को 
३.अरुणोदय हो चुका 
४.जननी जगन्मात की 
५.जहाँ दिव्यता ही जीवन है
६.जाग उठा है आज देश का 
७.दिव्य ध्येय की ओर तपस्वी 
८.नवचैतन्य हिलोरे लेता, 
९.भारत हमारी माँ है 
१०.मन समर्पित, तन समर्पित
११.मातृ-मंदिर का समर्पित दीप मै
१२.वसुन्धरा परिवार हमारा 
१३.साधना का पथ कठिन है 
१४.स्वयं प्रेरणा से 
१५.हम युवा है 
१६.अंतर्मन के भाव संजोकर
१७.देश उठेगा अपने पैरो 
१८.लोकमन संस्कार करना 
१९.जिसने मरना सीखा
२०.जीवन दीप जले
२१.तुमने सोता देश
२२.पथ का अन्तिम लक्ष्य
२३ माँ बस यह वरदान
२४.राष्ट्रदेव का ध्यान 
२५.संघ ह्रदय में धार चुके अब
२६.साधना का दीप ले निष्कम्प हाथों
२७.हम केशव के अनुयायी
२८.है वही पुरुषार्थी 


अगर हम नही देश के काम आए
धरा क्या कहेगी गगन क्या कहेगा ॥ 
चलो श्रम करे आज खुद को सँवारें
युगों से चढी जो खुमारी उतारें
अगर वक्त पर हम नहीं जाग पाएं
सुभा क्या कहेगी पवन क्या कहेगा ॥
अधुर गन्ध का अर्थ है खूब महके
पडे संकटों की भले मार सहके
अगर हम नहीं पुष्प सा मुस्कुराएं
लता क्या कहेगी चमन क्या कहेगा ॥ 
बहुत हो चुका स्वर्ग भू पर उतारें
करें कुछ नया स्वस्थ सोचें विचारें
अगर हम नहीं ज्योति बन झिलमिलाएं
निशा क्या कहेगी भुवन क्या कहेगा ॥
  

अनेकता में ऐक्य मंत्र को 

अनेकता में ऐक्य मंत्र को,
जन-जन फिर अपनाता है।
धीरे-धीरे देश हमारा,
आगे बढता जाता है।
इस धरती को स्वर्ग बनाया,
ॠषियों ने देकर बलिदान॥
उन्हीं के वंशज आज चले फिर,
करने को इसका निर्माण।
कर्म पंथ पर आज सभी को 
गीता ग्यान बुलाता है॥1॥
जाति, प्रान्त और वर्ग भेद के,
भ्रम को दूर भगाना है।
भूख, बीमारी और बेकारी, 
इनको आज मिटाना है।
एक देश का भाव जगा दें, 
सबकी भारत माता है॥2॥
हमें किसी से बैर नहीं है,
हमें किसी से भीति नहीं।
सभी से मिलकर काम करेंगे,
संगठना की रीति यही।
नील गगन पर भगवा ध्वज यह,
 लहर लहर लहराता है॥3॥ 

अरुणोदय हो चुका 

अरुणोदय हो चुका वीर 
अब कर्म-क्षेत्र में जुट जायें।
अपने खून पसीने द्वारा 
नवयुग धरती पर लायें॥
आज पुनः दानव बल नंगा 
धीरज को ललकार रहा ।
और उधर सीमा पर तक्षक 
फन फैला फुँकार रहा॥
असह दुराग्रह दुर्योधन का 
कुरुक्षेत्र व्रत अपनाये ॥१॥
सभी दिशाओं में सद्‌गुण की 
विमल ज्योति फैलानी है।
ग्राम नगर वन पर्वत ऊपर 
अरुण ध्वजा फहरानी है ॥
सागर लहरों पर विवेक सा 
भारत का यश लहरायें ॥२॥
केशव की किरणों ने अब तक 
लाखों सुमन खिलाये हैं।
माधव के वासन्तिक झोंके 
कली खिलाते आये हैं॥
मधुकर की इस फुलवारी में 
अनुपम वैभव विकसायें ॥३॥
अब तक अगणित बाधाओं में 
हमने मार्ग बनाया है।
कालकूट का पान किया है 
सेवाऽमृत छलकाया है॥
भरत भूमि के पग-पग पर फिर 
नूतन गंगा उमगायें ॥४॥
  

जननी जगन्मात की 

जननी जगन्मात की 
प्रखर मातृभक्ति की
सुप्त भावना जगाने हम चले॥
सदैव से महान जो 
सदैव ही महान हो
कोटि-कोटि कंठ से 
अखण्ड वंद्य गान हो
मातृ-भू की अमरता 
समृध्दि औ अखंण्डता की
शुभ्र कामना जगाने हम चले
जननी जगन्मात की ॥१॥
एक माँ के पूत एक 
धर्म एक देश है
फिर भी प्रेम के स्थान 
ईर्ष्या व व्देष है
सुबन्धुता व स्नेह की 
सुकार्य औ सुध्येय की
स्वच्छ भावना जगाने हम चले
जननी जगन्मात की ॥२॥
प्रान्त भेद भाषा-भेद 
भी अनेक है
छिद्र-छिद्र राष्ट्र का 
शरीर देख खेद है
अनेकता व भेदता से 
एकता अभेदता की
श्रेष्ठ भावना जगाने हम चले
जननी जगन्मात की ॥३॥
व्यक्ति-व्यक्ति के हृदय 
समष्टि भाव को जगा
सकामता व स्वार्थता के 
हेय भाव को मिटा
परहितों सुखों में निज के 
हित-सुखों को देखने की
श्रेष्ठ चाह को जगाने हम चले
जननी जगन्मात की ४॥
निज सुखों की एक ओर 
छोड़ करके लालसा
चल पड़े हैं मातृ-भू-
उत्थान का ले रास्ता
श्रम से तप से त्याग से 
संघ-दीप जगमगा
महान चेतना जगाने हम चले
जननी जगन्मात की ॥५॥
  
जहाँ दिव्यता 

जहाँ दिव्यता ही जीवन है
सागर का गांभीर्य जहाँ
जो कर्मो की फुलवारी है
नत-मस्तक है विश्व वहाँ ॥१॥
विपदाएँ कितनी आयी है
कितने ही आघात सहे
किन्तु अचल जो खड़ा हुआ है
वंदन शत-शत नरवर हे ॥२॥
जिसके मन में ध्येय देव का
निशिदिन चिंतन वंदन है
देशभक्ति का प्रकश हँसता
जग को पंथ दिखाता है ॥३॥
जिसका स्मित चैतन्य पुरुष है
शब्द-शब्द नवदीप प्रखर
जिसकी कृति से भविष्य उज्ज्वल
उसको जग का वंदन है ॥४॥
  
जाग उठा है 

जाग उठा है आज देश का 
वह सोया अभिमान।
प्राची की चंचल किरणों पर 
आया स्वर्ण विहान॥ जाग उठा...
स्वर्ण प्रभात खिला घर-घर में 
जागे सोये वीर
युध्दस्थल में सज्जित होकर 
बढ़े आज रणधीर
आज पुनः स्वीकार किया है 
असुरों का आह्वान॥ जाग उठा...
सहकर अत्याचार युगों से 
स्वाभिमान फिर जागा
दूर हुआ अज्ञान पार्थ का 
धनुष-बाण फिर जागा
पांचजन्य ने आज सुनाया 
संसृति को जयगान॥जाग उठा...
जाग उठी है वानर-सेना 
जाग उठा वनवासी
चला उदधि को आज बाँधने 
ईश्वर का विश्वासी
दानव की लंका में फिर से 
होता है अभियान॥।जाग उठा...
खुला शम्भु का नेत्र आज 
फिर वह प्रलयंकर जागा
तांडव की वह लपटें जागी 
वह शिवशंकर जागा
तालताल पर होता जाता 
पापों का अवसान॥जाग उठा...
ऊपर हिम से ढकी खड़ी हैं 
वे पर्वत मालाएँ
सुलग रही हैं भीतर-भीतर 
प्रलयंकर ज्वालाएँ
उन लपटों में दीख रहा है 
भारत का उत्थान॥।जाग उठा...
  

दिव्य ध्येय की 

दिव्य ध्येय की ओर तपस्वी 
जीवन भर अविचल चलता है ॥
सज धज कर आए आकर्षण 
पग पग पर झूमते प्रलोभन
हो कर सब से विमुख बटोही 
पथ पर संभल संभल बढता है ॥
अमर तत्व की अमिट साधना 
प्राणो मे उत्सर्ग कामना
जीवन का शाश्वत व्रत ले कर 
साधक हँस कण कण गलता है ॥
सफल विफल और आस निराशा 
इस की ओर कहाँ जिज्ञासा
बीहडता मे राह बनाता 
राही मचल मचल चलता है ॥
पतझड के झंझावातों मे 
जग के घातों प्रतिघातों मे
सुरभि लुटाता सुमन सिहरता 
निर्जनता मे भी खिलता है ॥
  


नवचैतन्य हिलोरे 

नवचैतन्य हिलोरे लेता, 
जाग उठी है तरुणाई
हिंदु धर्म निज दिव्य रूप में, 
उठा पुनः ले अंगडाई
जाग उठी है तरुणाई ॥धृ॥
जाती भाषा वर्ग भिन्नता, 
हैं कितने मिथ्या अभिमान
क्षेत्र-क्षेत्र के स्वार्थ उभारे, 
ले अपनी-अपनी पहचान
हिंदु भाव का करे जागरण, 
पाट चलेंगे सब खाई ||१||
विविध पंथ मत दर्शन अपने,
 भेद नही वैशिष्ट्य हमारा
एक अभेद्य अखण्ड संस्कृति, 
की बहती अमृत धारा
सत्य सनातन धर्म अधिष्टित, 
शुभमंगल बेला आई ॥२||
भौतिकता ने जनजीवन को, 
सुख-सुविधा अम्बार दिए
विलासिता की इस आंधी ने, 
धर्म कर्म ही भुला दिए
स्वार्थ भाव को दूर भगाए,
 हर मानव समझे भाई ||३||
ध्येय समर्पित जीवन अपना, 
भीष्म प्रतिज्ञा दोहराए
एक-एक को हृदय लगाकर, 
विराट शक्ति प्रकटाए
हिंदु धर्म की जगत्-प्रतिष्ठा, 
यज्ञ पताका लहराई ॥४||
  

भारत हमारी माँ है 

भारत हमारी माँ है माता का रूप प्यारा
करना इसी की रक्षा कर्तव्य है हमारा ॥धृ॥
जननी समान धरती जिस पे जनम लिया है
निज अन्न वायु जल से जिसने बडा किया है
जीवन वो कैसा जीवन इसपे अगर न वारा ॥१॥
स्वरणिम प्रभात जिस की अमृत लुटाने आए
जहाँ सांझ मुस्कुराकर दिन की थकन मिटाए
दिन रात का चलन भी जहाँ शेष जग से न्यारा ॥२॥
जहाँ घाम भीगा पावस  भिनी शरद सुहाये
बीते शिशिर को पतझड देकर वसन्त जाये
जिसे धूप छांव वर्षा हिमपात ने सँवारा ॥३॥
पावन पुनीत मा का मंदिर सहज सुहाना
फिर से लुटे न बेटो तुम नींद मे न खोना
जागृत सुतों का बल ही मा का सदा सहारा ।४॥
  

मन समर्पित 

मन समर्पित, तन समर्पित
और यह जीवन समर्पित
चाहता हूँ देश की धरती 
तुझे कुछ और भी दूं ||
माँ तुम्हारा ॠण बहुत है, मैं अकिंचन
किन्तु इतना कर रहा फिर भी निवेदन
थाल में लाऊँ सजा कर भाल जब भी
कर दया स्वीकार लेना वह समर्पण
गान अर्पित, प्राण अर्पित
रक्त का कण कण समर्पित
चाहता हूँ देश की धरती 
तुझे कुछ और भी दूं  ||
मांज दो तलवार, लाओ न देरी
बाँध दो कस कर क़मर पर ढाल मेरी
भाल पर मल दो चरण की धूल थोड़ी
शीश पर आशीष की छाया घनेरी
स्वप्न अर्पित, प्रश्न अर्पित
आयु का क्षण क्षण समर्पित
चाहता हूँ देश की धरती 
तुझे कुछ और भी दूं  ||
तोड़ता हूँ मोह का बन्धन, क्षमा दो
गांव मेरे, द्वार, घर, आंगन क्षमा दो
आज सीधे हाथ में तलवार दे दो
और बायें हाथ में ध्वज को थमा दो
यह सुमन लो, यह चमन लो
नीड़ का त्रण त्रण समर्पित
चाहता हूँ देश की धरती 
तुझे कुछ और भी दूं   ||
  

मातृ-मंदिर का 

मातृ-मंदिर का समर्पित दीप मै
चाह मेरी यह की मै जलता रहूँ ॥धृ॥
कर्म पथ पर मुस्कराऊँ सर्वदा
आपदाओं को समझ वरदान मैं
जग सुने झूमे सदा अनुराग मे
उल्लसित हो नित्य गाऊँ गान मैं
चीर तम-दल अज्ञता निज तेज से
बन अजय निश्शंक मै चलता रहूँ ॥१॥
सुमन बनकर सज उठे जयमाल में
राह में जितने मिले वे शूल भी
धन्य यदि मै जिन्दगी की राह में
कर सके अभिषेक मेरा धूल भी
क्योंकि मेरी देह मिट्टि से बनी है
क्यों न उसके प्रेम में पलता रहूं ॥२॥
मै जलूँ इतना कि सारे विश्व में
प्रेम का पावन अमर प्रकाश हो
मेदिनी यह मोद से विहँसे मधुर
गर्व से उत्फुल्ल वह आकाश हो
प्यार का संदेश दे अन्तिम किरण
मैं भले अपनत्व को छलता रहूं ॥३॥
मातृ-मन्दिर का अकिंचन दीप मै
चाह मेरी यह कि मै जलता रहूं ||
  


  वसुन्धरा परिवार हमारा 

वसुन्धरा परिवार हमारा 
हिन्दु का यह विशाल चिन्तन
इस वैश्विक जीवन दर्शन से 
मानव जाती होगी पावन ॥दृ॥
अखिल विश्व के पथदर्शन की 
मुनिजन सन्तोकी अभिलाषा
बन्धुभाव से सब जग जोडे 
वेद और गीता की भाषा
समरसता मन्त्र के नाद से 
हम भर देंगे सारा त्रिभुवन ॥१॥
जड इहवादी तत्वज्ञान को 
पराभूत होते देख रहे
भक्तिसहित कर्तुत्व चढाकर 
पूजा चैतन्य की कर रहे
सदा विजय कर्तव्य धर्म का 
स्वतन्त्रता का मुख मे गायन ॥२॥
व्यक्ती व्यक्ती सब विलीन होकर 
समाज जीवन नित कुसुमित हो
सर्वस्वार्पण के कल्पतरु 
नवफल फूलोंसे शोभित हो
काल बाह्य सब छोड बनाये 
भविष्य अपना दिव्य चिरन्तन ॥३॥
आकांक्षा प्राचीन हमारी 
नवयुग की गा रही आरती
त्रिकाल विजयी संकल्पोंकी 
नवपुरुषार्थ करेगा पूर्ती
अखिल विश्व मे सुख शान्ती हो 
जनमानस का यह सन्कीर्तन ॥४॥
नव युग के नव आव्हानोंको 
नवसाहस से स्वीकारेंगे
भूतकाल पर विजय प्राप्त कर 
नव विक्रमध्वज लहरायेंगे
विश्व धर्म का अमृत देंगे 
आर्त जगत का यह संजीवन ॥५॥
  

साधना का पथ कठिन है 

शपथ लेना तो सरल है
पर निभाना ही कठिन है
साधना का पथ कठिन है
साधना का पथ कठिन है…धृ
है अचेतन जो युगों से
लहर के अनुकूल बहते
साथ बहाना है सरल
प्रतिकूल बहना ही कठिन है……।१
शलभ बर जलना सरल है
प्रेम की जलती शिखा पर
स्वयं को तिल तिल जलाकर
दीप बनना ही कठिन है……।।२
ठोकरे खाकर नियति की
युगों से जी रहा मानव
है सरल आंसू बहाना
मुस्कराना ही कठिन है…।…३
तप तपस्या के सहारे
इंद्र बनना तो सरल है
स्वर्ग का ऐश्वर पाकर
मद भुलाना ही कठिन है……४ 
  

स्वयं प्रेरणा से 

स्वयं प्रेरणा से माता की 
सेवा का व्रत धारा है
सत्य स्वयमसेवक बनने का 
सतत प्रयत्न हमारा है||धृ||
देश भक्ति अधिकार जन्म से 
जागृत हो कर जाना है
धर्मं भूमि सूत हिंदू हूँ मैं 
हमने यहाँ पहिचाना है
जीवन मरण सदा क्षण क्षण में 
यहाँ स्वदेश ही प्यारा है ||
प्यार नहीं व्यापार हमारा 
पुरस्कार की चाह नहीं
उपहारों का मोह नहीं 
जय हारों की परवाह नहीं
अंहकार को दूर रखेंगे 
प्रभु का सदा सहारा है ||
नित्य नियम से शाखा जाते 
गंगा गोते खाने को
संस्कारों से पल पल अपने 
तन मन को पुलाकाने को
आत्मा विजय के हेतु स्वयं का 
यहाँ अनुशासन सारा है ||
हम समाज के चेतन प्रहरी 
घर घर पहुँच जगायेंगे
गली गली में नगर गाँव में 
दीप से दीप जलाएंगे 
हिंदू धर्मं हो वैभव पूरित 
जीवन लक्ष्य विचारा है||
  


हम युवा है 

हम युवा है हम करे मु
श्किलों से सामना
मातृभूमी हित जगे है 
हमारी कामना ॥धृ॥
संस्कृती पली यहाँ 
पुण्य भू जो प्यारी है
जननी वीरों की अनेकों की 
भरत भू हमारी है
ऐसा अब युवक कहाँ 
दिल मे ज़िसके राम ना ॥१॥
ये कदम हजारों अब 
रुक ना पायेंगे कभी
मंझीलों पे पहुंचकर ही 
विराम ले सभी
ध्येय पूर्ती पुर्व अब रुक 
ना पाये साधना ॥२॥
ज्ञान के प्रकाश की ले 
मशाल हाथ में
शील की पवित्रता है 
हमारे साथ में
एकता के स्वर उठे 
छुनेको ये आसमाँ ॥३॥
आँधीयों में स्वार्थ की 
त्याग दीप ना बुझे
मातृभू को प्राण दूँ 
याद है शपथ मुझे
मै कहाँ अकेला हूँ 
साथ है ये कारवा ॥४॥ 
  


अंतर्मन के भाव संजोकर

अंतर्मन के भाव संजोकर
राष्ट्रदेव का ध्यान करें।
अपना तन-मन अपना जीवन
इस वेदी पर दान करें॥
जिसकी रक्षा करने को ही
देवों के अवतार हुए।
जिसके पावन कर्म देवता
संस्कृति के आधार हुए।
जिसकी पूजा की वीरों ने
सदियों अपने प्राणों से।
माँ बहिनों ने शिशु बालों ने
निज अनुपम बलिदानों से।
इसको अजर अमर करने को
फिर सशक्त बलवान बनें॥१॥
सबसे उर्वर इसकी धरती
सबसे शुचि इसका पानी।
अन्नपूर्णा लक्ष्मी है यह
सिंह वाहिनी मर्दानी।
विविध अन्न फल फूल यहाँ पर
उगते आये सदा अपार।
स्वर्ण रजत हीर मोती की
यह वसुधा अक्षय आगार।
अपने श्रम अपने उद्यम से
फिर इसको धनवान करें॥२॥
ऊँच-नीच के भेद भुला
भाई -भाई सब एक रहें।
अनुशासन से ह्रदय सींचकर
पौरुष के अतिरेक बनें।
राष्ट्र हेतु सर्वस्व समर्पण
को जनमन तैयार रहे।
ह्रदय-ह्रदय से राष्ट्र भक्ति की
बहती अविरल धार रहे।
संगठनों से सारे जग में
फिर इसको छविमान करें॥३॥



देश उठेगा अपने पैरो 

देश उठेगा अपने पैरो 
निज गौरव के भान से
स्नेह भरा विश्वास जगाकर 
जिए सुख सम्मान से ॥
परावलंबी देश जगत मे 
कभी न यश पा सकता है
मृगतृष्णा मे मत भटको 
छिना सबकुछ जा सकता है
मायावी संसार चक्र मे 
कदम बढाओ ध्यान से
अपने साधक नही बढेंगे 
औरों के गुणगान से ॥
अथक किया था श्रम अनगिन 
जीवन अर्पित निर्माण मे
मर्यादित उपभोग हमारा 
पवित्रता हर प्राण मे
परिपुरक परिपूरण सृष्टी 
चलती ईश विधान से
अपनी नवरचनाए होंगी 
अपनी ही पेहचान ॥
आज देश की प्रज्ञा भटकी 
अपनोंसे हम टूट गए
क्षुद्र भावना स्वार्थ जगे है 
श्रेष्ठ तत्व सब छूट गए
धारा स्व-की पुष्ट करेंगे 
समरस अमृत पान से
कर संकल्प गरज कर बोले 
भारत निज सम्मान से ॥
केवल सुविधा अधिकारोंकी 
भाषा अब हम नही कहे
हो कर्तव्य परायण सारे 
अवसर सबको सुलभ रहे
माँ को वैभवपूर्ण करेंगे 
सभी दिशा उत्थान से
जल थल अंबर फिर गूंजेगा 
भारत के जय गान से ॥



लोकमन संस्कार करना 


लोकमन संस्कार करना 
यह परम गति साधना है।
और रचना गौण है सब 
यह शिखर संयोजना है ॥
कार्यक्रम की कल्पनाएँ 
धारणाएँ योजनाएँ
एक ही उद्देश्य प्रेरित 
तीव्र उत्कट कामनाएँ
हर सुमन को खाद जल से 
पूर्ण विकसित पालना ॥१॥
राष्ट्र की अट्टालिका हो 
विश्व में सर्वोच्च अनुपम
गोद में होवे क्रियान्वित 
प्रगति के सोपान उत्तम
किन्तु हर निर्माण के हित 
ईंट पक्की डालना है ॥ २ ॥
परम वैभव स्वप्न सुन्दर 
क्षितिज सा है दूर दुर्लभ
किन्तु उस नन्दन कुसुम को 
पा चुके माधुर्य सौरभ
राह काँटों से भरी है 
कुशलता से लाँघना है ॥ ३॥
राष्ट्र मन्दिर में विराजी 
मूर्ती सुन्दर मातृ-भू-की
अर्चना में भेट अर्पण 
पूर्वजों ने शीष की थी
आज उनकी मालिका में 
फूल अनगिन डालना है ॥ ४॥
  


जिसने मरना सीखा

जिसने मरना सीखा लिया है 
जीने का अधिकार उसी को।
जो काँटों के पथ पर आया 
फूलों का उपहार उसी को॥
जिसने गीत सजाये अपने
तलवारों के झन-झन स्वर पर
जिसने विप्लव राग अलापे
रिमझिम गोली के वर्षण पर
जो बलिदानों का प्रेमी है 
जगती का प्यार उसी को॥१॥
हँस-हँस कर इक मस्ती लेकर
जिसने सीखा है बलि होना
अपनी पीड़ा पर मुस्काना
औरों के कष्टों पर रोना
जिसने सहना सीख लिया है 
संकट है त्यौहार उसी को॥२॥
दुर्गमता लख बीहड़ पथ की
जो न कभी भी रुका कहीं पर
अनगिनती आघात सहे पर
जो न कभी भी झुका कहीं पर
झुका रहा है मस्तक अपना 
यह सारा संसार उसी को॥३॥


जीवन दीप जले

जीवन दीप जले
जीवन दीप जले ऐसा 
सब जग को ज्योति मिले
जीवन दीप जले।
इसी सत्य पर रामचन्द्र ने 
राजपाट सब त्याग दिया
छोड़ अवध माया की 
नगर कानन को प्रस्थान किया
सुख वैभव को लात मारकर 
कष्टों का सहवास किया
षट्रस-व्यंजन त्याग 
जंगली फल खाये सर-नीर पिया
स्वयं कंटकों को चूमा 
औरों के कंटक दूर किये
जन्म सफल है उस मानव का जो 
परहित ही सदा जिये
तृषितों को सुरसरि देने जो 
हिमगिरि सा चुपचाप गले
जीवन दीप जले॥१॥
रसिक शिरोमणि कृष्णचन्द्र ने 
वृन्दावन को बिसराया
छोड़ बिलखते ग्वाल-बाल वह 
निर्मोही भी कहलाया
किन्तु लोक-कल्याण मार्ग ही 
केवल उसने अपनाया
वही गोपियों का नटवर फिर 
योगिराज कहलाया
गीता की हर पंक्ति-पंक्ति में 
अर्जुन को वे समझाते
आगे बढ़ नरसिंह जगत के 
झूठे सब रिश्ते-नाते
अति विस्तृत कर्त्तव्य मार्ग है 
हर मानव इस ओर चले
जीवन दीप जले॥२॥
सत्य ढूँढ़ने वन -वन भटके 
बुध्ददेव बन संन्यासी
छोड़ भवन परिवार बना 
युवराज जंगलों का वासी
विष्णुगुप्त ने निज प्रतिभा से 
भारत -भाग्य जगाया था
किन्तु कभी क्या उस योगी को 
शासन-लोभ सताया था
वीर प्रताप शिवा वैरागी 
सबके हैं संदेश यही
मातृभूमि हित जो मरता है 
माँ का सच्चा पूत वही
वही सुमन सुरभित हो खिलते 
जो काँटों के बीच पले
जीवन दीप जले।।३॥
सत्य-सृष्टि करने केशव थे 
नगर-ग्राम घर-घर फिरते
संघ-मंत्र में हिन्दुराष्ट्र की 
प्रतिमा वे देते चलते
निज जीवन सर्वग्य लगा वे 
मूक वेदना छोड गये
हिन्द राष्ट्र के भव्य -भवन का 
स्वप्न अधूरा छोड़ गये
हृदय -हृदय में अग्नि बसी जो 
दावानल सम प्रगटायें
उस दधीचि का ध्येय पूर्णकर 
दिव्य -शक्ति बन छा जायें
धन्य द्येयवादी जीवन वे 
केशव -व्रत जो लिये चले
जीवन दीप जले।४॥



तुमने सोता देश

तुमने सोता देश जगाया 
सोते युवक जगाये।
धर्म -कर्म के संघ तत्व के 
अनुपम पाठ पढ़ाये।
घोर दासता का बन्धन था 
संघ मंत्र के दाता।
स्वार्थ तिमिर में देश फँसा था 
नव भारत निर्माता।
नवल सृष्टि की तुमने केशव 
जीवन दीप जलाये॥१॥
अपनी संस्कृति धर्म जाति का 
गौरव भी सिखलाया।
शक्ति-संगठन -राष्ट्र -प्रेम को 
जीवन लक्ष्य बनाया।
कर्मयोग के पथिक तुम्हारे 
पथ पर जग चल पाये॥२॥
मिट्टी से तुम मुर्ति बनाकर 
प्राण फूँक देते तेथे ।
युवकों को तुम स्नेह-शक्ति से 
दिव्य दृष्टि देते थे।
घर-घर में कर्मवीरों को 
तुम निर्मित कर पाये॥३॥
केशव स्वप्न तुम्हारा 
कितने ही नयनों में छाया
और साधना के पथ पर ही 
यौवन बढ़ता आया।
बाधाओं से मिले प्रेरणा 
माँ का दीप जलाये॥४॥


पथ का अन्तिम लक्ष्य

पथ का अन्तिम लक्ष्य नहीं है
सिंहासन चढ़ते जाना।
सब समाज को लिये साथ में
आगे है बढ़ते जाना॥
इतना आगे इतना आगे
जिसका कोई छोर नहीं
जहाँ पूर्णता मर्यादा हो
सीमाओं की डोर नहीं
सभी दिशाएँ मिल जाती हैं
उस अनन्त नभ को पाना॥१॥
छोटे-मोटे फल को पाने
यह न परिश्रम सारा है
देवों को भी दुर्लभ है जो
ऐसा संघ हमारा है
सफल राष्ट्र का अनुपम वैभव
सभी भांति से है लाना॥२॥
वैभव तब ही सच्चा समझे
सब सुख पाएँ लोक सभी
बाधाओं भय कुण्ठाओं से
मुक्त धरा गत-शोक सभी
गुरु की पूजा न्याय व्यवस्था
निखिल विश्व में सरसाना॥३॥
इस महान उद्देश प्राप्त हित
लगे भले जीवन सारा
एक् जन्म क्या बार -बार ही
इसी हेतु जीवन -धारा
जियें इसी हित और मृत्यु को
इसी हेतु है अपनाना॥४॥



माँ बस यह वरदान

माँ बस यह वरदान चाहिए
जीवन-पथ जो कंटकमय हो
विपदाओं का घोर वलय हो
किन्तु कामना एक यही बस
प्रतिपल पग गतिमान चाहिए॥१॥
हास मिले या त्रास मिले
विश्वास मिले या फाँस मिले
गरजे क्यों न काल ही सम्मुख
जीवन का अभिमान चाहिए॥२॥
जीवन के इन संघर्षो में
दुःख-कष्ट के दावानल में
तिल-तिल कर तन जले न क्यों पर
होंठों पर मुस्कान चाहिए॥३॥
कंटक पथ पर गिरना चढ़ना
स्वाभाविक है हार जीतना
उठ-उठ कर हम गिरें उठें फिर
पर गुरुता का ज्ञान चाहिए॥४॥
मेरी हार देश की जय हो
स्वार्थ -भाव का क्षण-क्षण क्षय हो
जल-जल कर जीवन दूँ जग को
बस इतना सम्मान चाहिए॥५॥



राष्ट्रदेव का ध्यान 

राष्ट्रदेव का ध्यान करें
अन्तर्मन के भाव संजोकर 
राष्ट्रदेव का ध्यान धरें
अपना तन मन अपना जीवन 
इस वेदी पर दान करें
जिसकी रक्षा करने को ही 
देवों के अवतार हुए
जिसके पावन कर्म देवता 
संस्कृति के आधार हुए
पूत देववाणी कहलायी 
जिनसे यह संस्कृति भाषा
देव धरा पर कभी न पनपी दु
ष्ट दानवों की आशा
इसी राष्ट्र का निज पौरुष से 
विक्रम से निर्माण करें॥१॥
जिसकी पूजा की वीरों ने 
सदियों अपने प्राणों से
माँ बहनों ने शिशु बालों ने 
निज अनुपम बलिदानों से
जिसकी जय -जय कहते -कहते 
लाखों ने फाँसी पायी
जिसके आँगन में स्वतन्त्रता 
देवी ने लोरी गायी
इसको अजर अमर करने को 
फिर सशक्त बलवान बने॥२॥
सबसे उर्वर इसकी धरती 
सबसे शुचि इसका पानी
अन्नपूर्णा लक्ष्मी है 
यह सिंहवाहिनी मर्दानी
विविध अन्न फल-फूल यहाँ पर 
उगते आये सदा अपार
स्वर्ण रजत हिरे मोती की 
यह वसुधा अक्षय आगार
अपने श्रम अपने उद्यम से फिर 
इसको धनवान करें॥३॥
ऊँच नीच के भेद भुला दें 
बन्धु-बन्धु सब एक रहें
अनुशासन से ह्रदय सींच कर 
पौरुष के अतिरेक बनें
राष्ट्र हेतु सर्वस्व समर्पण को 
जन-जन तैयार रहे
ह्रदय -ह्रदय से राष्ट्र -भक्ति की 
बहती अविरल धार रहे
संगठनों से सारे जग में 
फिर इसको छविमान करे॥४॥



संघ ह्रदय में

संघ ह्रदय में धार चुके अब
घर-घर हमको जाना है
घर-घर हमको जाना है॥ध्रु०॥
संघ कार्य जीवन व्रत मेरा
कभी न यह बिसराना है।
अहंकार व्यक्तितत्व ह्रदय से
पूर्ण मिटाकर चलना है।
तत्व ज्ञान की शिक्षा पाकर
स्वर्णिम समय बिताना है।
तत्व सुधारस पीकर निज को
अमृत पूर्ण बनाना है॥१॥
हिन्दु एक अपनत्व भावना
रोम -रोम में भरना है।
हिन्दु ह्रदय सब एक रुप कर
बिन्दु सिन्धुवत करना है।
ह्रत्सीमा के बाहर अपने
संघ शक्ति प्रकटाना है।
कार्य कुशलता से अपना
आगे पैर बढ़ाना है॥२॥
सिध्दांतो पर अपने डटकर
संघ नींव को भरना है।
निर्भय होकर दृढ़ता से
अब विपत्तियों से लड़ना है।
अन्तरंग बहिरंग हमारा
एक समान सुनिर्मल है।
राष्ट्रीयता का अनुभव निज
कार्यरुप में लाना है॥३॥
संघ शक्ति के प्रकर्ष में ही
हिन्दु ह्रदय उत्कर्ष भरा।
संघ शक्ति के प्रकर्ष में ही
रिपु दल का है नाश भरा।
राष्ट्र भक्ति की प्रदीप्त ज्वाला
धधक रही मन मन्दिर में
जल से जल सायुज्य मुक्ति का
तेज भरे प्रभु भारत में॥५॥



साधना का दीप ले

साधना का दीप ले निष्कम्प हाथों
बढ रहे निज ध्येय पथ साधक निरंतर ॥ध्रु॥
क्षूद्र भावोंको मिटाने भेद के तम को हटाने
नित्य शाखा संस्कारों को जगा
राष्ट्रभक्ति लीन हो साधक निरंतर॥१॥
को ई पूजा की विधी हो विविध पंथोंकी निधी हो
धर्म का आधार व्यापक है घना
प्रेम वृष्टी कर रहे साधक निरंतर॥२॥
को ई भूखा ना रहेगा कष्ट को ई ना सहेगा
परमवैभव से भरा यह देश हो
बस इसी धुन में लगे साधक निरंतर ॥३॥
मातृभूमी अखण्ड होगी कण्टकोंसे शून्य होगी
संघटित सामर्थ्य की कर गर्जना
जगत को ललकारते साधक निरंतर ॥४॥



हम केशव के अनुयायी

हम केशव के अनुयायी हैं
हमने तो बढ़ना सीखा है।
लक्ष्य दूर है पथ दुर्गम है
किन्तु पहुँचकर ही दम लेंगे।
बाधाओं के गिरि शिखिरों पर
हमने तो चढ़ना सीखा है॥१॥
ख्याति प्रतिष्ठा हमें न भाती
केवल माँ की कीर्ति सुहाती।
माता के हित प्रतिपल जीवन
हमने तो जीना सीखा है।
अंधकार में बन्धु भटकते
पंथ बिना व्याकुल दुख सहते।
पथ दर्शन दीपक बन
तिल-तिल हमने तो जलना सीखा है
तृषित जनों को जीवन देंगे
शस्य-श्यामला भूमि करेंगे।
सुरसरि देने हिमगिरि के सम
हमने तो गलना सीखा है॥
धरती को सुरभित कर देंगे
हे माँ हम मधुऋतु लायेंगे।
शूलों में भी सुमनों के सम
हमाने तो खिलना सीखा है॥३॥


है वही पुरुषार्थी 

है वही पुरुषार्थी जो संघ पथ चलता रहे || धृ
शील धिरज स्नेह के रथ बैठ कर बढता रहे
है वही पुरुषार्थी जो संघ पथ चलता रहे
सौख्य में फूले नहीं विपदा पदे रोवे नहीं
कंटकों के मार्ग में भी धैर्य बल खोवे नहीं
शत्रू जिसका डेख साहस (हाथ बस मलता रहे) ||… है वही
चूमती हैन सफलताए चरण ऐसे वीर की
भरी कभी खाते न जो चमकती शमसेर की
संघ के उत्थान हित नित (नव चयन करता रहे) ||… है वही
मान-औ-अपमान सब कुछ हिन्दु हित स्वीकार हो
हिन्दु का हित हो जहां तो मौत भी स्वीकार हो
है यहा वट व्रुक्षा अपना (फूलता फलता रहे) ||… है वही
जागरण के गीत गाना ही सदा भाता जिसे
काल का दुष्चक्र किन्चित छू नही पाता जिसे
जो तिमिर को फाडता (दीपक जला हरता रहे) ||…है वही





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