बस्तर के क्रांति दूत 4
बस्तर के क्रांति दूत :- चतुर्थ पुष्प
वीर यादोराव
शहीद धुरवा राम को जब अंग्रेजो के द्वारा फांसी दे दी गई। तब उसका सच्चा मित्र से रहा नहीं गया।
क्योंकि उसके सबसे अच्छे मित्र को अंग्रेजों ने कुचक्र में फंसा कर मार डाला। यह उसके लिए असहनीय था जब प्रत्येक मां का पुत्र इस देश की आजादी का नारा लगा रहा था ।
तब बस्तर कि इस लाडले ने देश ही सब कुछ है ऐसा भाव भर कर अंग्रेजों से विद्रोह करने का निश्चय करता है।
जिसमे सबसे बड़ी बात थी की सेना खड़ी करना ।
उसको प्रशिक्षण देना और योजना समझाना।
बस्तर कि आदिवासियों में उत्साह जगाकर नवयुवकों को जोड़ना प्रारंभ किया ।
तेलंगा और दोरला जाति के लोगों को संगठित किया।
वैसे तो यादो राव भोपालपटनम जमीदारी के अंतर्गत आने वाले एक तालुके का तालुकेदार था।
यादोराव ने अपने संघर्ष को गति देने के लिए आहिरी जमीदारी के अंतर्गत आने वाले सोनमपल्ली के तालुकेदार बाबूराव एवं अरवल्ली व घोट के जमीदार व्यंकटराव से भी संबंध स्थापित कर लिए।
यादोराव की मोर्चाबंदी को देखकर अंग्रेज अधिकारी घबरा गए और उनके इस विद्रोह को विफल करने की रणनीति बनाई गई ।
परंतु यादो राव अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए बिजली की भांति दहाड़ पडे।
आदिवासी सेना को लेकर अंग्रेजों के ठिकानों पर हमला किए ।रायगढ़ा परघने को लूटा ।
यादोराव , बाबू राव व वेंकट राव की संयुक्त सेना ने 29 अप्रैल 1858 ईस्वी को गार्टलैंड, हाल तथा पीटर की सेना पर हमला कर दिया ।
गाटलैंड व हाल संघर्ष में मारे गए तथा पीटर युद्ध से भागने में सफल रहा।
परंतु अपनों की गद्दारी के कारण ही क्रांतिकारी अपने उद्देश्य में विफल रहे ।
परिणाम यह हुआ की यादोराव को पकड़ा गया और अंग्रेजों ने 1860 में फांसी दे दी ।
इस प्रकार से बस्तर के लाडले सपूत यादोराव
इस मिट्टी के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया।
धन्य है यह भारत भूमि
धन्य है यहां की मिट्टी
जो देश के लिए बलिदानी
भाव जागृत कराती है
शत शत वंदन
जय भारत
आमचो बस्तर
आमचो माटी
साभार :- बस्तर के क्रांति दूत पुस्तक से
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