श्रीमध्वाचार्य

700 साल पहले की बात उत्तर भारत के कई स्थानों में इस्लाम पर जमा चुका था गंगा नदी के उस पार जलालुद्दीन खिलजी का अधिकार था इस्लामी सैनिकों का कड़ा पहरा था नदी पार करने नवका भी नहीं थी डर था कि कहीं इस तरह हिंदू राजाओं की गुप्तचर घोषणा पढ़े गंगा के इस पार नदी किनारे एक सन्यासी अपने शिष्य परिवार के साथ खड़े थे आगे बढ़ने का रास्ता बंद सामने गहरी नदी शिष्यों में आतंक छा गया शिष्यों की चिंता गुरु को मालूम हुई उन्होंने सांत्वना देते हुए कहा डरने का कोई कारण नहीं हर सांसारिक नदी पार कर चुके हैं इसलिए गंगा नदी पार कर सकते हैं गुरु के पीछे सारे शिष्य धैर्य के साथ पानी में उतर पड़े सैनिकों ने देखा और उन्हें गुप्तचर समझने लगे तो सन्यासी ने कहा रुको डरने की आवश्यकता नहीं हम लोग सन्यासी हैं हम तुम्हारे बादशाह से मिलने के लिए ही आ रहे हैं हमारे पास कोई हथियार नहीं है फिर भी सैनिकों ने तलवार लेकर उन्हें घेर लिया और उन्हें महल की ओर ले करके क्या है बादशाह ने उन्हें देखा तो है आश्चर्य हुआ सेना की कड़ी निगरानी से बचकर राज्य की सीमा में यह हिंदू वैरागी कैसे प्रवेश कर सके और सेना उनके पीछे-पीछे सहारा देते हुए आ रहे हैं अपनी जगह खड़े खड़े बादशाह ने ऊंची आवाज में सन्यासी को संबोधित करते हुए कहा मैं नदी किनारे सेना तैनात किया कि पड़ोसी राजा की गुप्त चरित्र घोषणा पड़े उनके हाथों से बचकर जिंदा कोई भी आज तक इधर नहीं आया लेकिन है बैरागी तुम कैसे उनसे बचकर आए और यहां आने का क्या उद्देश्य है सन्यासी ने मुस्कुराते हुए कहा आकाश में सूर्य की तरफ इशारा किया और बादशाह की अपनी भाषा में पाचन में जवाब दिया तुम्हारा मेरा हम सब का भगवान सारी दुनिया को प्रकाश देने वाला भगवान वहां है तुम्हारे लिए हल्ला है मेरे लिए नारायण चाहे किसी भी नाम से पुकारो भगवान एक ही है हर एक के लिए भगवान अलग नहीं तुम में हम सब उनके विशाल साम्राज्य के प्रशासन हैं प्रजा जन है उनकी कृपा से ही नाव के बिना नदी पार कर हम इधर है स्वामी जी की वाणी में एक प्रकार की जादू से सकती थी उनका गंभीर स्वर दिव्य तेज बादशाह के सामने खड़े होकर बोलने का साहस आत्मविश्वास देखकर बादशाह दंग रह गया बादशाह ने उन्हें यही मत बना कर रहने का आगरा किया लेकिन सन्यासियों ने मना कर दिया यह सन्यासी कौन थे यह थे आचार्य माधवा दुनिया के सामने ऊंची आवाज में या घोषणा करने वाले प्रवाद थे कि चाहे किसी भी भाषा में किसी भी नाम से पुकारो भगवान सुन सकता है कोई भी भाषा में किसी भी नाम से ईश्वर पुकार सकते हैं क्योंकि दुनिया में कोई भी ऐसी भाषा नहीं है जिसमें ईश्वर का नाम नहीं है समुद्र का गोश्त हवा की सायं सायं ध्वनि चिड़ियों की चहचहाहट प्राणी वर्ग की आवाज सारी दुनिया के जो भी नाथ हैं वे सब ईश्वर के गुण गाया नहीं है श्रीमद्भागवत गीता की समालोचना लिखते समय माधवाचार्य ने और भी थोड़ा बढ़-चढ़कर कहां है जाति पद्धति जो प्रचलित है वह देश से बढ़कर स्वभाव से संबंधित है स्वभाव ही जाति का निर्णय करता है अध्यात्म विषय के बारे में थोड़ी जानकारी भी ना रखने वाले वेश माता के ब्राह्मण से अध्यापक पर पर चलने वाला जन्मता चांडाल श्रेष्ठ है तेरहवीं सदी का वह जमाना था जाति बंद का कट्टरता से पालन करने वाला जमाना था उस समय मध्य अचार्य हुए और उनके विचार हुए भारत के आचार्य पुरुषों की माला में दक्षिण के तीन आचार्य विश्व विख्यात है अद्वैत मत संस्थापक आचार्य शंकर विशिष्ट अद्वैत मत संस्थापक आचार्य रामानुज तथा अद्वैत मत संस्थापक आचार्य मध्य आचार्य शंकर ने कहा यह सारी दुनिया मेरी माया है ईश्वर ही एक मात्र सत्य है आचार्य रामानुज ने कहा यह विश्वात्मा ईश्वर के लिए यह विश्व ही शरीर है अतः यह सत्य है आचार्य मधु ने कहा यह दुनिया भगवान की लीला सृष्टि है ऐप लॉक करके उसकी महिमा का उपचार मत करना आचार्य मध्य है जो सिद्धांत स्थापित किया उसे तत्व व ईश्वर जादूगर नहीं द कहा गया यह दुनिया सपनों की माया नहीं है ईश्वर जादूगर नहीं ईश्वर सत्य कर्म है आचार्य मध्य व पक्के कर्नाटकी थे पाजा गाउन की जन्मभूमि विजयदशमी के दिन उनका जन्म हुआ सन 1238 यह बालक अन्य वाल की तरह सामान्य नहीं है ऐसा उनके माता-पिता को भी और परिवार के लोगों को लगता था बासुदेव 3 साल का बालक था एक बार माता-पिता उसे साथ लेकर निधि यूरो नामक गांव के अपने बंधु के घर गए थे वहां कोई समारोह था सैकड़ों लोग आए थे घर में शोरगुल हो रहा था सब के सब उत्सव के अनन्य कार्यों में वर्णित है इसी बीच वासुदेव घर से निकल पड़ा किसी को मालूम नहीं हुआ बहुत समय बीत गया किसी बंधुओं ने पूछा आपका बालक कहां है दिखाई नहीं देता तब मां जागृत हुई कहां है कहां है इधर-उधर ढूंढने लगी लेकिन बालक कहीं दिखाई नहीं पड़ा माता-पिता की आंखों में अशोक के बोले थे भट्ट जी अपने गांव की ओर दौड़ पड़े भक्त हमने वही उसे देखा तो लोग मंदिर की ओर दौड़ पड़े वहां बालक नहीं था पर देखते आए राह पर किसी ने कहा एक छोटा बालक कोटवारों मंदिर के पास जा रहा था वहां बालक नहीं था उडुपी से आने वाले राहगीरों ने कहा खेती-बाड़ी या पार करके 3 साल का छोटा बालक बनन जी मंदिर की तरफ जा रहा थ भट्ट उधर दौड़ पड़े उडुपी से वहां 10 किलो 10 मिनट का रास्ता था नदी लाए बालक को ढूंढते ढूंढते उडुपी पहुंच गए अपने इष्ट देव अंत ईश्वर के मंदिर में गए आश्चर्य बालक वासुदेव अंतर ईश्वर लिंग के सामने हाथ जोड़े खड़ा थ पिता के आंसू आनंदपुर में बदल गए जिस अंतर ईश्वर की कृपा से पुत्र पैदा हुआ था उसी अनंतेश्वर के सामने फिर से पुत्र मिला बाला सहज भाव से हंसते खड़ा था जैसा कुछ भी नहीं हुआ भट्ट अपने पुत्र के सर पर हाथ रखते हुए प्रेम से पूछा बेटा वासुदेव इतनी दूर तुम अकेले कैसे आए रास्ता कैसे मालूम हुआ बालक ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया पिताजी मैं अकेला नहीं आया पहले कोटवारों के सकरनारायण को देखा वहां से बनन जेके महा लिंगेश्वर के पास आया और फिर वहां से यहां चंद्रमौलेश्वर का दर्शन करके आया है यहां इस लिंग में बसे महादेव नारायण को देखा इन सभी मंदिरों के ईश्वर रास्ते भर में मेरे साथ थे वह मेरे संग संग चले रास्ता बता रहे थे 30 वर्ष की आयु में जो बात मुसलमान बादशाह को बताई थी वही बात 3 वर्ष की आयु में पिता के सामने रखी गई थी दोनों में एक ही तत्व एक ही अर्थ बादशाह से कहा था भगवान की दया से हम आए यहां पिता से भी वही बात जो लक्षण बच्चों ने दिखाई पड़ते हैं वही अंदर तक विकसित होते हैं 3 साल की उम्र पूरी हुई तो पिता ने बालक को पढ़ाई लिखाई करने के लिए अभ्यास कराया 1 दिन का पाठ हुआ दूसरे दिन उन्हीं अक्षरों को फिर शिकायत बासु ने वासुदेव ने पिता से कहा क्यों फिर वही दिखाते हो कल तो सीखा लिया ना आज कोई नया अक्षर सिखाइए आगे का पाठ पढ़ाइए पुत्र बड़ा प्रतिभाशाली था माता को कहीं डर भी लगता है कहीं बुरी नजर न लग जाए माधवाचार्य शारीरिक पुष्टि शक्ति को बहुत महत्व देने वाले थे देश का युवा पीढ़ी सिर्फ बौद्धिक ही नहीं रही शक्ति को भी अर्जित करें आचार्य मत बने सन्यासी शिष्यों के लिए भी अंग साधना अनिवार्य बनाई थी उन्होंने कहा दुनिया में और किसी के सामने सिर झुका कर खड़े ना रहो शिवा भगवान के निर्भय होकर छाती तान कर चलो पर भगवान के सामने नतमस्तक हो जाओ मल्लयुद्ध का अभ्यास हुआ करता था बासुदेव 11 साल का था वेद सूक्त का अध्ययन पूरा हो गया इनके विषय जो बाकी थे उसे ही पूर्व पूर्ण किया 1 दिन प्रातः काल विस्तार से उठा तो सीधे ₹1 चला गया रूपी में अचूक प्रज्ञा नामक विश्वविख्यात यदि और अन्य थे वासुदेव सीधा उनके पास गया और नमस्कार करो हमसे कहा मुझे अपना शिष्य बना लीजिए यदि वर्णने मान गए शिष्य तो स्वीकार करके वासुदेव मठ में ही रह गया जब पुत्र बहुत समय तक वापस नहीं आया तो नारायण भट्ट पुत्र को ढूंढते उडुपी आए मठ में आकर पुत्र को देखा और घर बुलाया वासुदेव ने कहा मुझे अपने जीवन के उद्देश्य को पूरा करना है मुझे अपनी राह पर छोड़ दे मैं सन्यासी बनने जा रहा हूं पुत्र की बातें सुनकर पिता को बड़ा दुख हुआ और बेटे से कहा इस बूढ़े बाप पर दया दिखाओ सन्यास लेकर बुढ़ापे में हमें बेसहारा ना छोड़ो शिवा तुम्हारे हमारे लिए और कौन हैं वासुदेव के पास जवाब तैयार था पिताजी अगर पुत्र सन्यासी हो तो ही पिता उनके चरणों पर नमस्कार कर सकता है अन्यथा या पाप है आपने मेरे चरण पर नमस्कार कर मुझे सन्यासी मान लिया नारायण भी निरुत्तर हो गए फिर भी हार नहीं मानी कई घंटों तक पिता पुत्र वाद विवाद चलता रहा वासुदेव ने सभी तत्वों का सटीक उत्तर दिया नारायण भट्ट निराश हुए और उन्होंने कहा मैं तो तुम्हें सन्यास अनुमति दे सकता हूं पर तुम्हारी माता को मनवाना संभव नहीं है वासुदेव ने कहा या का मुझ पर छोड़ दीजिए वह खाली हाथ घर लौटे और अपनी पत्नी को सारी बात बताई और कहा कि वासुदेव को सन्यासी बनने की अनुमति तो तुम बिल्कुल मत देना वासुदेव जानता था कि मां को कैसे मनाया जाए मां के पास आया वह कुछ कहा नहीं चाहती थी कि वासुदेव बोल उठा मां अगर तुम चाहती हो कि तुम्हारे पुत्र हमेशा तुम्हारे सामने ही रहे तो सन्यास के लिए अनुमति दो वरना भूल जाओ तुम्हारा कोई पुत्र था हमेशा के लिए तुम्हारे लिए पुत्र ही नहीं रहेगा तीर निशाने पर ठीक लग गया और माताजी अनुमति दे दी लेकिन एक बात उनके मन को कचोट दी रही बुढ़ापे का सहारा हमारा एकमात्र पुत्र भी अब पास में नहीं रहा मां की व्यथा पुत्र को मालूम हो गई उसने कहा जब तक आपकी देखरेख करने के लिए एक और पुत्र जन्म नहीं लेता तब तक मैं सन्यास नहीं लूंगा और कुछ दिनों के बाद उन्हें एक और पुत्र का जन्म हुआ फिर मत दो सन्यास दीक्षा लेकर सन्यासी बने आचार्य जी का आश्रम नाम पूर्ण प्रज्ञा पड़ा जावेदान पीठ पर अभिषिक्त हुए तो नाम आनंद तीर्थ रखा गया माधवन का वैदिक नाम है इधर इस्लाम ने भारत पर आक्रमण किया था ईसाई धर्म भी थोड़ा बहुत आ चुका था इस प्रकार विदेशी धर्मों के प्रभाव से भारत में लोगों के मन में एक प्रकार की संधि तथा घर चुकी थी साथ ही भारतीयों में ही 1020 आंतरिक मतभेद पंत भेद और उसमें झगड़े विवाद चल रहे थे ऐसे वातावरण में देश भर का भ्रमण कर आचार्य मध्य ने लोगों को धार्मिक दिलासा दिया जीने के लिए भरोसा दिया भगवान की भक्ति का सहारा दिया एक कथा है कि द्वारिका से एक जहाज निकल पड़ा अन्य सामानों के साथ गोपी चंदन के बड़े-बड़े ढेले भी उसमें रखे गए थे उडुपी से 3 मील दूरी पर मलपे नामक स्थान पर जब यह जहां चल रहा था तो तूफान की चपेट में आकर समुद्र में किनारे स्थित एक बड़े पत्थर से टकरा गया और जहाज टूट कर डूब गया 1 दिन ध्यान योग से उठकर आचार्य मधु अचानक मलबे की ओर निकल पड़े समुद्र तल में डूबी भगवान की प्रतिमा को खारे पानी से निकलवा कर स्वयं अपने कंधे पर लिए उडुपी ले आए अपने मठ में मूर्ति को प्रतिष्ठित किया कई वर्षों तक सबसे विष्णु की पूजा करते रहे इस प्रकार 700 साल पहले से श्री कृष्ण उडुपी का आधी दे वर्तमान कर देश के भक्त जनों के अभीष्ट दाता के रूप में उडुप में है आचार्य मधुबनी उलूपी को अपना केंद्र बनाकर अपने तत्व के प्रसार का कार्य आरंभ किया उन्हें धर्म प्रचार कार्य में बड़ी मात्रा विरोध का सामना भी करना पड़ जब समाज पुराने तालाब की तरह सड़ जाता है तो उसमें नया जीवन भरन नई चाल्दे ने महापुरुषों का अवतरण होता है परंपरा से चली आई प्रथा को आचार्य माधव तोड़फोड़ रहे हैं संप्रदाय विरोधी बातें करते हैं एहसास और कुछ लोगों ने मचाना शुरू किया जब शास्त्रार्थ में अचार्य जी को हराना संभव हो गया तो वहां मार्ग का प्रयोग भी हुआ उनके ग्रंथों को चोरी कर लिया गया उस समय के तत्कालीन राजा जयसिंह को अपनी राजधानी कासरगोडू में हुए पुस्तक चोरी का पता चला अत्यंत दुखी हुए राजा ने पदमा तीर्थ के सारे ग्रंथ बरामद किए और आचार्य को भी उन्हें पुनः राज्य उठाने का नियम अंतर दिया माधवाचार्य जी वापस राज्य में आए और कई दिनों तक वहां रह करके नगर के लोगों की सेवा की चाहते हैं बचपन एक बार उन्हें कलिंग नाक काटने दौड़ पड़ा तो उसे पैरों से मसल डाला था उन्हें भय नाम का शब्द का अर्थ मालूम ही नहीं

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