ध्रुव
उत्तानपाद नाम का एक राजा प्राचीन काल में हो गए उसकी दो रानियां थी बड़ी का नाम सुनीति और छोटी का सुरुचि राजा को छोटी रानी सुरुचि अधिक विर्य थी अत्यंत प्रेम करने के कारण राजा भी उचित अनुचित का विचार किए बिना उसकी सभी बातों को स्वीकार कर देते थे सुनीति विनम्र शब्दों और अच्छे स्वभाव की थी वहां योग्य योग्य उचित अनुचित आदि का विचार करके ही काम करती थी स्वभाव से धीर गंभीर थी राजा सुरुचि के हाथ की कठपुतली थे सुनीत के पुत्र का नाम ठाकरे ध्रुव ध्रुव महल में नहीं रह सकता राज्य का उत्तराधिकारी सुरुचि का पुत्र उत्तम बने यह उसके मन में रहता था इसलिए ध्रुवा सुनती को महल में नहीं रहने देती थ बड़ी रानी होते हुए भी वह सामान्य लोगों की तरह जीवन व्यतीत कर रही थी राजा उत्तानपाद ने उसे कभी विचार नहीं किया छोटा बालक चाहता है कि उसे माता-पिता उसे प्यार करें क्या यह सच है ना ध्रुव को मां का प्रेम मिला था पर पिता का प्रेम उन्हें नहीं मिला 1 दिन ध्रुव खेलते खेलते महल में चला गया उस समय वह 5 वर्ष का था राजा सुरुचि और उत्तम के साथ रत्ना जड़ित 66 में बैठे थे उसने उत्तम को पीता की गोदी में बैठे देखा यह देखकर उसने भी पिता की गोद में बैठने की इच्छा हुई उसमें शासन की तरफ बढ़े तो सुरुचि ने ध्रुव को पिता की ओर बढ़ते देखकर ध्रुव ने 86 टीचर के पिता के पास आकर का पिता जी मैं भी अपनी गोद में बैठना चाहता हूं मुझे भी गोद में देना तो उसने कहा क्या तुम इस के योग्य हो उसने पिता की मौत पर हाथ रखा सुरुचि के आंखों से रोशनी एक तरफ उसके पुत्र के प्रति प्रेम और ऊपर से देखा सुरुचि द्वारा ध्रुव की कहानी सुनकर उसके माता-पिता के पास वीजा नीति का मन बहुत दुखी हो गए थोड़ी देर तक उसके मुंह में सत्य ही नहीं निकल सके इतना मासूम भोला भाला बालक है उसके साथ ऐसा व्यवहार क्यों हुआ सुनीति ने सोचा की पटरानी का पद प्राप्त नहीं कर सकी और एक साधारण नागरिक की तरह व्यतीत कर रही हूं तो क्या सुरुचि मेरे बच्चे से लेना चाहती है नीतीश कुमार हो तब माताजी ने कहा कि बेटा हो सके यही हमारी ईश्वर की इच्छा होगी तो बाद में ध्रुव ने कहा क्या मैं ईश्वर का दर्शन कर सकता हूं माताजी ने ध्रुव का ईश्वर भक्ति संबंधी कहानी सुनाया करती थी जिसे कारण ईश्वर अपने भक्तों के कष्टों को दूर करते हैं ऐसा बताया करती थी तो ध्रुव के मन में आए क्या महेश्वर का दर्शन कर सकता हूं तो माताजी ने कहा बेटा उसके लिए बहुत तब करना पड़ता है गुरु ने कहा मां मैं वन में जाऊंगा रिश्वत के दर्शन करूंगा मैं उन्हें भक्ति से प्रसन्न करूंगा और मैं उनसे आशीर्वाद मारूंगा मैं उन्हें भक्ति से प्रसन्न करूंगा बेटा यहां मार्ग बड़ा कठिन है सरल नहीं है ऐसा समिति ने कहा और ध्रुव के इस विचार समिति के हृदय को छू गए बालक ध्रुव के हृदय में ईश्वर की दर्शन की तीव्र भावना उत्पन्न हो गई थी मैं ईश्वर का वस्त्र दर्शन करूंगा मेरे लौटने तक तुम धर्य बनाए रखना ऐसा माताजी को कहा और भी ऋषि-मुनियों के दर्शन को निकल गए 5 वर्ष के छोटे से बालक निसर्ग दर्शन करने का निश्चय कर लिया भगवान नारायण के नाम का उच्चारण करते हुए वह कठोर तप में लग गए उसी समय नारद अचानक उपस्थित हुए भगवान नारायण के परम भक्त थे तीनों लोगों में भ्रमण करते थे हाथ में तमूरा लिए और मंजीरे लिए नारायण के नाम का गान करते हो नाटक को आते देख कर रुक वतन आनंद हुआ उनके चरणों का स्पर्श करते हुए नीचे झुक और अपनी व्यथा बताई आज तुम ईश्वर के दर्शन इसलिए करना चाहते हो क्योंकि तुम्हारा मन दुखी है वही मनुष्य ईश्वर दर्शन कर सकता है जो तू कार्यशैली तो हो अर्थात उसे समान मानकर चलें उसे इच्छाओं आकांक्षाओं का और क्रोध का क्या करना पड़ता है सब कुछ भूलकर ईश्वर की प्रार्थना करो यमुना नदी किनारे मधुबन नाम का ही स्थान है जहां नदी में स्नान का पवित्र मन से ईश्वर का चिंतन करो ध्रुव का मार्गदर्शन करने के बाद वहां मुनि नारद राजा उत्तानपाद के महान की ओर चल पड़े सुरुचि जादू का अपमान किया था उसने तो राजा उसके स्थान पर भी आंसुओं को नहीं रोक पाए थे नारद मुनि राजा को ढांढस बंधाया महाराष्ट्र लड़का जरूर सब लड़कों से निराला है इससे उसकी रक्षा कर रहे हैं अपने मन को स्थिर आकर भक्ति में दुर्गा स्थान प्राप्त करेगा जिसे अब कोई नहीं पा सका धैर्य धारण करो पश्चाताप आदरणीय गुरुदेव आप मुझे क्षमा कीजिए इस पर कितनी प्रतिमा को अपने हृदय में स्पीकर भगवान नारायण के पवित्र नाम के इस 1 मीटर दूर स्थित भक्ति में संलग्न आ रहा भगवान नारायण धुरू की भक्ति और तप से प्रसन्न हुए विद्रोह के समूह अपनी दिव्य किरणों के आलोक को फैलाते हुए प्रकट हुए द्रोणेश्वर को सरलता से कहा भगवान आपका दर्शन करने के लिए ही मैंने तपस्या की पर अब आपके दर्शन के बाद मुझे नहीं समझ में आ रहा है कि कि आ कैसे मैं आपका पूजन व सरकार करूं आप अपने भक्तों में मुझे सर्वोच्च स्थान प्राप्त कीजिए बस मुझे कुछ नहीं चाहिए बाला की शब्दों को सुनकर भगवान आनंदित है फिर फिर से गले लगाकर भगवान ने कहा मेरे बच्चे तुम्हारी सभी इच्छाएं पूर्ण होगी अब अपने राज्य में लौट जाओ उचित उम्र में राजा बनकर अपने राज्य शासन करो प्रत्येक व्यक्ति में अपनी उपस्थिति का अनुभव करके उसका आदर सम्मान करो उसके शुभ दुकान करो से कक्षाओं की पूर्ति करो धर्म का पालन करते हुए शासन करो ऐसा आशीर्वाद देकर भगवान अंतर्धान हो गए ध्रुव को लगा ही क्या मैंने सच भगवान के दर्शन किया मैंने कोई गलती तो नहीं की मैंने उनके पास अपने आप को अर्पित करने की कामना क्यों नहीं की हे भगवान फिर से मुझे इन से पूछना पड़ेगा राजा उत्पाद उत्तानपाद ने जब सुना कि ध्रुव ने अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण कर लिया अब वापस अपने राज्य में आ रहा है तो उसे देखने को उत्सुक हो उठे और प्रसन्न होकर मंत्रियों राज्य के गणमान्य नागरिकों के साथ रुके अगवानी करने के लिए मंगल वादों के साथ चल पड़े रुको देखते ही उन्होंने उसे प्रेम रोग लगा लिया है तब तूने आदर पूर्वक अपनी सौतेली मां सुरुचि के चरणों का स्पर्श किया उसने उसे उठाकर आशीर्वाद दिया उसकी मां समिति के आनंद की कोई सीमा नहीं रही के पश्चात आनंद के तीर से उसे वाचन छोड़ दिया ध्रुव को सुसज्जित राशि हाथी पर बिठाकर उसकी शोभायात्रा निकाली गई उसके दर्शन के लिए पूरा नगर एकत्र हुआ प्रत्येक घर में दीपक ओं के प्रकाश से जगमग आ रहा था स्त्रियां रास्तों में दोनों और फल फूल के थाल सजाकर खड़ी थी नागरिकों का सम्मान और आशीर्वाद पाखरू नगर प्रवेश किया उच्च शिक्षा दिलाई कलाओं के क्षेत्र में योग्यता प्राप्त कर ली जब वह उनकी इच्छा अनुसार प्रजापति की पुत्री पुत्री सुरुचि का अनुयाई एक बार खेलने के लिए निकला उची उची यश ने जंगल भारत आज जला रखी थी सुरुचि उस आग की चपेट में आ गई ध्रुव ने जब सुना कि उसकी मां सुरुचि और उसे प्यारे भाई उत्तम कोई अच्छे ने मार डाला है तो उसे अत्यंत दुख हुआ इस पर उसने अत्यंत गुस्सा आया उसने अच्छे से लड़ने की तैयारी प्रारंभ कर दी यक्ष केसर अलकापुरी को से जीत लिया उसने अक्षरों को स्वर्ग में नीचे जाने के लिए बाध्य किया गुरु ने यक्ष पर बाण चलाए पर भयंकर तूफान आने पर वृक्ष से चलने वाली पत्ते की तरफ जाते थ लक्ष्मण अपनी चमत्कारी शक्ति से चारों ओर अंधेरा कर दिया धानक तूफान शुरू होगा सांपों और सिखों ने ध्रुव का पीछा किया इससे क्रोधित होकर उन्हें अपनी तरफ से भगवान नारायण के मंत्र का उच्चारण कर बाहर निकाला और उसे चलाया सभी अच्छा रूचि पत्नियां और उसके बच्चे मारे गए अलकापुरी मरघट में बदल गया ध्रुव मनु के वंश का था उसने दादा स्वयंभू मनु ने जब देखा कि हमारी जा रहे हैं तब उनका हृदय द्रवित हो गया ऋषि-मुनियों के साथ लेकर थ्रू के पास पहुंचे और जो मार्ग पर चलने की शिक्षा दी अपने दादा के चरणों में झुक गया है स्वयंभू मनु ने कहा कि भोले-भाले अच्छों का कारण मार रहे हो किसी एक की गलती सबको देना अनुचित है ध्रुव अपनी राजधानी में लौट आए उन्होंने शासन के राजकाज में व्यस्त हो गए ईश्वर की इच्छा के अनुसार उसने राज्य में शासन किया है जब तू पूरा हुआ उसने अपने पुत्र का राज्य अभिषेक किया राज्य का त्याग कर उसमें पवित्रा बद्री केदार आश्रम में जागेश्वर भक्ति की और इस लोक को प्राप्त कर लो क्वासी को बाल्यावस्था में भगवान नारायण से प्राप्त वरदान के अनुसार ध्रुव सभी तारा गणों में श्रेष्ठ हुआ और उसका मुकुट मणि बना वह संपूर्ण सृष्टि का केंद्र बना इस तरह सृष्टि की दूरी उसने धारण की उसी दिन से भारतवासी जब भी दूर तारीख को देखते हैं उन्हें बालक ध्रुव की पवित्र भक्ति का ध्यान आ जाता है
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