प्रहलाद

एक क्रूर राक्षस था उसने ब्रह्मा से प्राप्त वर्ग के कारण उसे कोई भी मार नहीं सकता था उसकी मृत्यु घर में या घर के बाहर भी नहीं होगी दिन या रात में उसे मौत नहीं आएगी कोई अस्त्र भी या कोई शस्त्र अभी उसे नहीं मार सकेगा उसके मृत्यु ना काश में होगी ना ही पृथ्वी पर इस प्रकार के बड़ा वरदान प्राप्त करने के बाद वह बड़ा हंकरी और इस कारण सभी देवगढ़ मनुष्य डर से कांपने लगते थे इस ग्रुप राक्षस का नाम है हिरण्यकश्यप और इसी का पुत्र हुआ प्रहलाद इस इसी कारण गुरु शुक्राचार्य को प्रह्लाद उसका शिष्य होने का अभिमान था प्रह्लाद विचार में डूबा था कि राजा के सेवक वहां आए और उसे मोहल्ले गए पिता ने अपने पुत्र को बड़े प्यार से पास बुलाया वह जानना चाहता था कि पुत्र ने क्या सीखा है हिरण्यकश्यप ने प्यार से प्रहलाद अपनी गोद में लिया और पूछा बेटा तुमने अपने गुरुजनों से क्या सीखा प्रहलाद ने उत्तर दिया पिताजी हमें सिखाते हैं कि एक व्यक्ति मेरा मित्र है दूसरा दुश्मन अच्छा नहीं लगता मैं जाना चाहता हूं वहां मैं भगवान श्रीहरि का ध्यान करूंगा उनको लगा कि कोई उसे कांतिल हिरण्यकशिपु ने गुरुजनों को बुलावा भेजा और कहा कि आपकी सालम कोई दुश्मन हो गया है वह नन्हे पुत्र में विष्णु के प्रति श्रद्धा का भाव निर्माण कर रहा है भगवान नारायण गिरी बस ऐसी भावनाओं से मुक्त हूं मैंने स्वयं सीखा है मुझे किसी ने सिखाया ऐसा उसने उत्तर दिया उसने कहा तुम राक्षस स्कूल पर कलंक हो जिसने तम्हारी चाचा की हत्या की ल ऐसे भगवान श्रीहरि हो तुम पूजा करना चाहते हो बाद में उसे अपने माता कयाधु के पास लेकर गए बाद में प्रहलाद में पिता जी से कहा कि कान में श्रीहरि के पवित्र नाम को सुनना मुंह में उनका नाम लेना मन में उन्हीं का विचार करना उन्हीं की पूजा करना उनके सामने ना उन्हीं का सेवा करना समर्पित कर देना ज्ञान है लेकिन पहलाद के मन में कोई भय नहीं था मैंने जो कुछ कहा वह अपवित्र नहीं है भगवान विष्णु की कृपा से मुझे यह ज्ञान प्राप्त हुआ है पुत्र प्रहलाद को खींचकर उसने सेवकों को आवाज लगाई और इस मनुष्य वालों को तुरंत मेरे सामने से हटा दो उसे घसीट कर ले जाओ और मार डालो ऐसा उसने हटा दिया है विशाल का राक्षस जो है नक्षत्रों से लैस थे उन्होंने जब राज्य आज्ञा सुनीता भी चकित हो गए प्रहलाद के पास पहुंचे भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए दिन खड़ा था भाले की नोक से राक्षसों ने उसे चेतना चाहा किंतु प्रहलाद और कुछ नहीं हुआ पुनः आदेश दिया गया हाथियों को लाओ और उसके पैरों तले कुचल वादो एक हाथी पहला के ऊपर खड़ा हो गय लेकिन पहला तो कुछ नहीं हुआ उसे नदी में फेंका गया उसे पहाड़ में फेंका गया फिर भी वह मृत्यु को प्राप्त नहीं हुआ थोड़े ही समय में हमारे पिता से गुरु शुक्राचार्य आएंगे वह इस बालक को ठीक है सिखा कर उसकी विधि में परिवर्तन कर देंगे प्रह्लाद ने बताया बहुत पहले की बात है मेरे पिता मंदार पर्वत पर ध्यान तब करने गए थे उस समय देवताओं ने सोचा कि राक्षसों की भूमि पर आक्रमण करने हेतु या उत्तम समय है राक्षसों की रक्षा करने उसका राजा वहां नहीं था राक्षस पराजित हुए और इधर उधर भाग खड़े हुए देवताओं ने राजमालपुर लूटा देवेंद्र मेरी माता का यादव को युद्ध बंदी बना कर ले जा रहे थे मेरी माता विलाप कर रही थी संयोग से नारद मार्ग से मिल गए उन्होंने देवेंद्र देवेंद्र कैसा न्याय है क्या यह सब करने का तुम्हें दिखाएं वह पवित्र महिला है उसे तुम खींच कर ले जा रहे हो उसे छोड़ दो देना नहीं है देवेंद्र ने कहा महाराज मेरे मन में इस महिला के विषय में कोई बुरी भावना नहीं है वह इस समय गर्भवती है मुझे डर है कि उसका बच्चा भी अपने पिता के समान ही हमें कष्ट देगा मैं इसे घर ले जाऊंगा जब उसका बच्चा होगा तो मैं उसी हत्या कर दूंगा और फिर वापस भेज दूंगा नारद मुनि हंसने लगे कहने लगे मित्र तुझे सही बात का पता नहीं है इसे होने वाला पुत्र भगवान का भक्त होगा तो मुझसे मार नहीं सकोगे इसके अलावा क्या देवताओं के राजा का शोभा देता है उन्होंने मेरी माता के चरणों चरणों यार उन्होंने अपने आप चले गए मैंने इस शिक्षा दीक्षा को सुना दिन बीतते गए और मेरी मां भागवत धर्म को भूल गए लेकिन मेरे मन पर उसका प्रतिबिंब था क्या इसी ही श्रीहरि नेवरा का रूप लेगा तुम्हारे चाचा को नहीं मारा था छात्रों को भगवान की कहानी सुनाइए बड़े हुए देवताओं के स्वर पर आक्रमण कर दिया अक्षय को देख देवता भयभीत हुए और इधर-उधर भागने लगे हिरण ने समुद्र के देवता वरुण धवन के अकेले चुनौती दी भगवान से लड़ सकते हैं यह श्रीहरि को खोजने निकला है इसी समय पर ब्रह्म परमेश्वर की नासिका से एक वराह बाहर निकला वह बहुत छोटा था लेकिन देखते ही देखते वह बढ़ने लगा और पढ़ते-पढ़ते पहाड़ सा हो गया इस समय प्रीति समुद्र में डूबी हुई थी इसी बहाने प्रीति को अपनी सूंड में उठाया और उसे बाहर की सदा पर लाया वहां प्रीति को ब्रह्मा को अर्पित करना चाहता था जागरण जंक्शन इस विशालकाय 12 को देखा तो चकित रह गया तुम वराह के रूप में महाविष्णु ही हो मैं अब तुम्हारा सिर तोड़ दूंगा ऐसा कहते हैं ना चले बराह को रोकना चाहा किरण रूप से आंतों की ओर ध्यान नहीं दिया युद्ध सुबह से शाम तक चला ब्रह्मा की इच्छा थी कि यह युद्ध रात्रि के पूर्व समाप्त हो जाना चाहिए क्योंकि रात्रि के साथ ही राक्षसों की शक्ति बढ़ने लगती है वराह ने ब्रह्मा के मन की बात समझ ली और वह मुस्कुराया उसने हिरण्याक्ष पर चक्र है का यह चक्रण अक्षय की ओर जाते हैं * के सभी संस्थानों को खत्म कर दे गया चरण ना क्रोध से जला गुना आगे बढ़ा उसने बराबर अपनी बगल में दबाने का प्रयास किया वराह निर्णय के मुंह पर एक शक्तिशाली मुक्का जड़ दिया यह मौका इतना शक्तिशाली था कि सड़क पर जा गिरा और मर गया हिरण्याक्ष की कथा सुनाते गठित हो उठे कथा जारी रखें की मृत्यु से उसकी पत्नी वृषभानु अशोक में 1 दिन सभी को मरना पड़ता है किरण कैसे बुने दूसरों का संतप्त किया किंतु सामंतास में चल रहा थ उसने सेनापति अल्लाह नमो जी आदि को बुलाया उनको आदेश दिया कि विष्णु भक्तों को जितना भी संभव हो कष्ट जो जो भगवान की भक्ति करते हैं उन्हें खत्म कर दो देशभक्तों की नदियों को जला दिया मंदिरों को धराशाई कर दिया लेकिन राक्षसों के गुड़ तथ्यों को सुनकर पहलाद दुखी हुआ राक्षसों की प्रवृत्ति बदल देने को उसके मन में विचार हुआ राक्षसों के राजा हिरण्यकशिपु ने भगवान की आराधना शुरू कर दी मंदार पर्वत पर जाकर उन्हें घोर तप किया एड़ी पर खड़े रहते पूरे शरीर पर भारी पर डालना हाथ कंधे उठाकर आकाशी और लगाना आदि अनेक पुस्तकें अनेक वर्ष बीत गए किंतु हरिनगर सपूत सूट भर नहीं मिला उनके शरीर से चलाएं निकलने लगी उसने सारे ब्रह्मांड को व्याप्त किया नदियां और समुद्र उबलने लगा आपने से हिलने लगा चारों और अग्नि फैलने लगी देवता पैसे कांपने लगे मेरे साथ चलोगे ब्रह्मा से अनुरोध किया कि उन्हें बचा है ब्रह्मा देव राक्षस राज के सामने प्रकट हुए और उन्हें काहे हिरण्यकशिपु मैं तुम्हारी बात से संतुष्ट हो गया हूं मैंने नहीं देखा मैं हूं तुम जो चाहो मांग लो तब उसने स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई है उन्हें इस बात नहीं कर पाएंगे राक्षसों के पास पहुंच गए प्रहलाद को लाने के लिए उसके सेवकों को भेजा है प्रह्लाद आकर राजा के सामने खड़ा हुआ उसे देखते ही रहने का सपूत हावड़ा अरे कूल कलंक लोग भयभीत होते हैं लेकिन तुम मेरे पुत्र मेरी अवज्ञा करते हो तुम बहुत छोटे हो लेकिन पहलाद ने शांति से उत्तर दिया श्रीहरि ने मुझसे यह साहस भरा है श्रीहरि सबसे शक्तिमान है आप और पूरा ब्रह्मांड ब्रह्मा विश्व हरि की शक्ति के सामने सूत्र है जिसकी धाक सभी देवी देवताओं का शिव चर्चा हिरण्यकशिपु क्रोध से पागल हो उठा और जोर से चिल्लाया भाग्य मूर्ख लड़के तेरी मौत करीब आ गई है मैं सभी लोगों का राजा हूं स्वामी हूं मेरे अलावा और कौन है कहां है वह मुझे बता चुनाव में पहला तरह सभी स्थानों में व्याप्त है हिरण्यकशिपु अपना प्रोत्साहन न कर पाया कहने लगा क्या यह सर्वत्र व्याप्त है सेवा सामने क्यों नहीं आता तुम्हें मौत के घाट उतार देता हूं तुम्हारी सहायता के लिए आता है हिरण्यकशिपु ने बयान से तलवार बाहर निकाली और उस छोटे से बालक पर तिल पड़ा इसी समय भयंकर धनी हुई पराक्रमी वीर हिरण्यकशिपु की आवाज सुने अपने स्थान से हिल गए वह खंभा दो भागों में फर्क पड़ा और नरसिंह के रूप में श्रीहरि सामने प्रकट हो गए नरसिंह का सील सिंगार मनुष्य शरीर का था विशालकाय नरसी की आंखें चमक रही थी उसके सिर व मूंछों के बाल सीधे खड़े हो गए उसका धारदार जबड़ा चोरों से हिल रहा था कान भी खड़े हो गए थे वह भी पहाड़ की गुफा के समान दिखाई दिया उसे देखकर कोई भी भैंस घबरा जाता है या भयंकर रूप से बाहर आया था लेकिन हिरण्यकशिपु एक नजर देख रहा था उसका धैर्य असाधारण था उस upने गांव तो या महाविष्णु इसी ने मारा करो घर मेरे भाई को मारा था यदि मैं खत्म हो जाएंगे ऐसा सोचते आस्था भगवान नरसिंह ने हिरण्यकशिपु को सहित दबोच लिया जैसे गर्म सांप को पकड़ लेता है लेकिन हिरण्यकश्यप उसकी पकड़ से छूट गया भगवान नरसी ने उसे वैसे ही पकड़ लिया जैसे सर पर चूहे को पकड़ता है दौड़ते हुए उसे दहलीज पर ले आए भगवान नरसिंह डर ही पर बैठ गए और हिरण्यकशिपु को उन्होंने अपनी गोद में सुला दिया है बाजार ने देश नाखून उसके पेट में गहरे गाड़ दिया और पेट फाड़ दिया अतरिया बाहर निकली और माला पहन कर डाल दी यह दृश्य दरबार के लोगों ने देखकर भयभीत हो गए लेकिन अपने राजा का अंत हुआ देकर खत्म कर दिया और इस तरह से व्यवस्था ठीक होने लगा नन्हे से बालक प्रहलाद में भक्ति भाव से भगवान नरसिंह के चरणों को स्पर्श या वे चांद भी वे और क्रोध का स्थान प्रेम और कृपा ने ले लिया नरसिंह ने प्रहलाद को प्यार से उठा लिया हिरण्यकशिपु ब्रह्मा से प्राप्त वरदान क अनुसार ही उसे मृत्यु को प्राप्त हुआ

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