प्रेरक प्रसंग- इंद्रिय
स्वामी रामतीर्थ कॉलेज से घर जा रहे थे। मार्ग में एक नींबू वाला दिखाई दिया। नींबू बहुत रसीले और एकदम ताजे थे। रामतीर्थ के मुंह में पानी आ गया। सोचा कि नींबू खरीद लेने चाहिए। उन्होंने नींबुओं को हाथ लगाकर देखा और उनके स्वादिष्ट होने को परखा। फिर जिह्वा के इस आमंत्रण को मन ने धिक्कारा, क्रनींबू देखकर विचलित होना ठीक नहीं। यह भी एक तरह का लोभ है, जो साधना के मार्ग में बाधक है।
रामतीर्थ आगे बढ़ गए, किंतु जिह्वा का शौक इतनी आसानी से हार मानने वाला नहीं था। जिह्वा ने उन्हें नींबुओं का स्वाद लेने के लिए उकसाया। वे फिर नींबू वाले के पास लौटे। लौटकर नींबुओं को देखते रहे। वीतरागी मन ने फिर पैरों को आगे बढ़ाया। चार कदम चलकर जिह्वा ने फिर लौटाया। नींबू वाला हैरान हो गया कि ये सज्जन बार-बार आना-जाना कर रहे हैं, किंतु नींबू खरीद नहीं रहे हैं। अंतत: उसने कह ही दिया, क्रसाहब! लेना है तो ले लीजिए। बार-बार क्यों आ-जा रहे हैं?
स्वामी रामतीर्थ ने दो नींबू खरीद लिए। घर आते ही पत्नी से चाकू मांगा और एक नींबू काट लिया। मगर जैसे ही वे एक फांक चूसने के लिए मुंह तक लाए कि मन ने ताना दिया, क्रवाह रे रामतीर्थ! तू इस अदनी-सी जिह्वा का गुलाम हो गया। वह तुझे जैसा आदेश दे रही है, तू बिना विचारे उसे मान रहा है।ञ्ज तभी पत्नी वहां आई। उसने पति को हाथ रोकते देखकर कहा, क्रनींबू चूसते-चूसते रुक क्यों गए? खाओ न।ञ्ज लेकिन रामतीर्थ ने तत्काल कटे और साबुत दोनों नींबू पत्नी को देते हुए प्रसन्नता से कहा, क्रमैं नहीं खाऊंगा। आज मैंने जिह्वा पर जीत हासिल कर ली। अब मुझे विश्वास है कि इंद्रियों को मैं भी वश में कर सकता हूं।ञ्ज जिन्हें ईश्वर से लौ लगानी हो, उन्हें भौतिक आसक्तियों से मुक्त होना चाहिए। यही मुक्ति उनके लिए मोक्ष का द्वार खोलती है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें