सुभाषित

*प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम्*

*यदि सन्ति गुणा: पुंसां विकसन्त्येव ते स्वयं,*
*म्नहि कस्तूरिकामोद: शपथेन विभाव्यते।*

भावार्थ :-
*कस्तूरी की गन्ध को सिद्ध नही करना पड़ता, वह तो स्वयं फैलकर अपनी सुगन्ध से वातावरण को सुवासित कर देती है।*
        *उसी प्रकार गुणवान् तथा प्रतिभावान मनुष्य के गुण अपने आप फैल जाते है, उनका प्रचार नही करना पड़ता।*

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