यद्यपि शुद्धं लोक विरुद्धम् नाचरणीयम् नाचरणीयम्

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यद्यपि शुद्धं लोक विरुद्धम् नाचरणीयम् नाचरणीयम्*
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           *जब कोई व्यक्ति सज्जन बनता है, तप करता है,तब उसे आत्मतत्व से साक्षात होता है।* 
               आत्मदर्शन के साथ ही उसे विश्वदर्शन भी होता है। *संसार के व्यवहारों के रहस्यों को जानने से वह ऋषि कहलाता है।* तब उसे मन्त्रों के दर्शन होते हैं जो कि वेद हैं।
                           *इसी तरह जो व्यक्ति वन, वृक्ष, भूमि,नदी प्राणी के साथ निरन्तर सम्पर्क में रहता है, सम्बन्ध स्थापित करता है, तादात्म्य स्थापित कर, उनकी अनुभूति के स्तर को प्राप्त करता है, यह लोकज्ञान है।*
-------------- *वेदज्ञान और लोकज्ञान का मूल एक ही है। दोनों की परिणति लोकहित है।*
      *लोकज्ञान जब व्यवस्थित हो जाता है तो उसे शास्त्र कहते हैं। लोकज्ञान एक विशाल नद है, वेद उस पर स्थित कुछ सुंदर टापू हैं।*

शास्त्र ज्ञान से भी अधिक व्यापक लोकज्ञान है।
*शास्त्रार्थ रुढिर्बलीयसी,,,,,*        अर्थात शास्त्र से अधिक प्रभावी लोक समर्थन है!!
    भारत में आज की तरह पढ़ाई नहीं थी तब भी लोक और शास्त्र में कहीं भी विरोध नहीं था। 
           पूरी कोशिश इस बात की थी कि लोकव्यवहार शास्त्रानुकूल हो, किंवा शास्त्र लोकानुकूल हो।
                *लोकानुरंजन के लिए सम्राट अपनी पत्नी को वनवास दे देता है।* 
             जो विवाद, न्यायालय के पढ़े लिखे जज, वर्षों तक नहीं सुलझा पाते वे एक अनपढ़ व्यक्ति चुटकियों में सुलझा देता था और सबको मान्य भी था।
*आज भी, जो जितना अनपढ़ है वह उतना ही लोकज्ञान सिद्ध है।*

 *आधुनिक पढ़ाई ने केवल चतुर मूर्ख पैदा किये हैं जो हर चीज को अपने इस्तेमाल के लिए चिंतित रहते हैं।*

-------- उदाहरण के लिए यदि आज सभी विवाद मिल बैठकर सुलझाने लगें तो वकील जन, कर सलाहकार, चिकित्सक जगत आदि सभी भूखे मरने लगें और वे अपनी उच्च शिक्षा का रोना रोते हुए पाए जाएंगे।
                    *दुर्भाग्य से आज हमने लोकज्ञान की परम्परा को दकियानूसी मान लिया। लोकज्ञान को ज्ञान ही नहीं माना जाता। उसे जादू टोना, जंतर मंतर, झाड़फूंक, डोरा धागा कहकर हेय घोषित किया जाता है। उसे अशास्त्रीय, अनधिकृत और कई मामलों में दण्डनीय अपराध माना जाता है।*

         भारत में लोकज्ञान परम्परा को दुहरी मार पड़ रही है। घर की परम्परा खंडित हो रही है और यूरो अमरीकी विचारधारा के आक्रमण से जूझना पड़ रहा है। गीत, नृत्य आदि दैनिक जीवन से हटकर प्रदर्शन की वस्तु बन गए हैं।
      उदाहरण,,,, पानी लाती महिलाएं झुंड में आते जाते पनिहारी गीत गाती थी, बंजारे बैलों की घण्टियों के साथ आलाप खींचते, 
*फसल कटाई के साथ ही बिहू नृत्य होता था,,,, काम के साथ उल्लास और उससे सर्वविध कल्याण,,,, क्या ही अद्भुत योजना रही होगी।*
            परन्तु आज यदि नृत्य देखना है तो काम रोको, थियेटर में बैठो, दर्शक बनो, ,,,, बस,,,, मन खाली का खाली रहता है।
*उदास, हताश, कुंठित मन, आधुनिक शिक्षा की देन है।*

       आज दोनों को एक दूसरे को समझना चाहिए। लोकज्ञ और वेदज्ञ को एक दूसरे का सम्मान करना चाहिए। दोनों के समन्वय की आवश्यकता है। दोनों एक दूसरे को परखें और परिष्कृत करें।
       *वेटरनरी डॉक्टर, शास्त्रज्ञ है, पशुओं का जानकार ग्रामीण लोकज्ञ है। डॉक्टर शास्त्रज्ञ है, घर की दादी अम्मा, लोकज्ञ हैं।*
दुर्भाग्य से इनमें भयंकर विषमता व्याप्त है।
         हजारों रुपये की मासिक तनख्वाह वाला वेटरनरी डॉक्टर आता है, पशु मर जाता है, कुछ भी शुल्क न लेने वाला ग्रामीण मृत्युमुख में गई गाय को बचा लेता है।
                *जब हम "शिक्षा के भारतीयकरण" की बात करते हैं तो शास्त्र के साथ लोक को अवश्यम्भावी मानते हैं।*
-------- प्रश्न सादर आमंत्रित हैं।👏💓🙌💓
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