संघगीत 2 निर्माणों के पावन युग में
निर्माणों के पावन युग में
हम चरित्र निर्माण न भूले
स्वार्थ साधना की आंधी में
वसुधा का कल्याण ना भूलें ।।ध्रु।।
माना अगम अगाध सिंधु है
संघर्षों का पार नहीं है
किंतु डूबना मजधारों में
साहस को स्वीकार नहीं है
जटिल समस्या सुलझाने को
नूतन अनुसंधान न भूलें ।।१।।
शील विनय आदर्श शिष्टता
तार बिना झंकार नहीं है
शिक्षा क्या स्वर साध सकेगी
यह नैतिक आधार नहीं है
किंतु कौमुदी की गरिमा में
संस्कृति का सम्मान न भूलें ।।२।।
अविष्कारों की कृतियों में
यदि मानव का प्यार नहीं है
सृजन हीन विज्ञान व्यर्थ है
प्राणी का उपकार नहीं है
भौतिकता के उत्थानों में
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