संघगीत 13 जय भारती वंदे भारती
जय भारती, वंदे भारती ||
सर पे हिमालय का छत्र है
चरणों में नदियाँ एकत्र है
हाथों में वेदों के पत्र हैं
ऐऽऽऽ देश नही ऐसा अनयत्र है ||
धुऐं से पावन ये व्योम हैं
घर-घर में होता जहाँ होम हैं
पुलकित हमारे रोम-रोम हैं
आदि-अनादि शब्द ओम है ||
जिस भूमि पे जन्म लिया राम नें
गीता सुनाई जहाँ श्याम नें
पावन बनाया चारों धाम नें
स्वर्ग भी लजाये जिसके सामने ||
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