अरुंधती

सन्ध्या ब्रह्मा की मानस पुत्री थी जो तपस्या के बल पर अगले जन्म में अरुन्धती के रूप में महर्षि वसिष्ठ की पत्‍‌नी बनी। वह तपस्या करने के लिये चन्द्रभाग पर्वत के बृहल्लोहित नामक सरोवर के पास सद्गुरु की खोज में घूम रही थी। सन्ध्या की जिज्ञासा देखकर महर्षि वसिष्ठ वहाँ प्रकट हुए और सन्ध्या से पूछा- कल्याणी! तुम इस घोर जंगल में कैसे विचर रही हो, तुम किसकी कन्या हो और क्या करना चाहती हो? सन्ध्या कहने लगी- भगवन्! मैं तपस्या करने के लिये इस सूने जंगल में आयी हूँ। अब तक मैं बहुत उद्विगन् हो रही थी कि कैसे तपस्या करूँ, मुझे तपस्या मार्ग मालूम नहीं है। परन्तु अब आपको देखकर मुझे बडी शान्ति मिली है। वसिष्ठ जी ने कहा- तुम एकमात्र परम ज्योतिस्वरूप, धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष के दाता भगवान विष्णु की आराधना करके ही अपना अभीष्ट प्राप्त कर सकती हो। सूर्यमण्डल में शंख-चक्र-गदाधारी चतुर्भुज वनमाली भगवान विष्णु का ध्यान करके ॐ नमो वासुदेवाय ॐ इस मन्त्र का जप करो और मौन रहकर तपस्या करो। पहले छ: दिन तक कुछ भी भोजन मत करना, केवल तीसरे दिन रात्रि में एवं छठे दिन रात्रि में कुछ पत्ते खाकर जल पी लेना। उसके पश्चात् तीन दिन तक निर्जल उपवास करना और फिर रात्रि में भी पानी मत पीना। भगवान तुम पर प्रसन्न होंगे और शीघ्र ही तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण करेंगे। इस प्रकार उपदेश करके महर्षि वसिष्ठ अन्तर्धान हो गये और वह भी तपस्या की पद्धति जानकर बडे आनन्द के साथ भगवान की पूजा करने लगी। इस प्रकार बराबर चार युग तक उसकी तपस्या चलती रही।

भगवान् विष्णु उसकी भावना के अनुसार रूप धारण करके उसकी आँखों के सामने प्रकट हुए। गरुडपर सवार अपने प्रभु की मनोहर छवि देखकर वह सम्भ्रम के साथ उठ खडी हुई और क्या कहूँ? क्या करूँ? इस चिन्ता में पड गयी। उसकी स्तुति करने की इच्छा जानकर भगवान ने उसे दिव्य ज्ञान, दिव्य दृष्टि एवं दिव्य वाणी प्रदान की। अब वह भगवान की स्तुति करने लगी। स्तुति करते-करते वह भगवान के चरणों पर गिर पडी। भगवान को बडी दया आयी और उन्होंने अमृतवर्षिणी दृष्टि से उसे हृष्ट-पुष्ट कर दिया तथा वर माँगने को कहा। सन्ध्या ने कहा- भगवन्! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो कृपा करके पहला वर तो यह दें कि संसार में पैदा होते ही किसी प्राणी के मन में काम के विकार का उदय न हो, दूसरा वर यह दीजिये कि मेरा पातिव्रत्य अखण्ड रहे और तीसरा यह कि मेरे भगवत्स्वरूप पति के अतिरिक्त और कहीं भी मेरी सकाम दृष्टि न हो। जो पुरुष मुझे सकाम दृष्टि से देखे वह पुरुषत्वहीन अर्थात नपुंसक हो जाये। भगवान ने कहा कि चार अवस्थाएँ होती हैं-बाल्य, कौमार्य, यौवन और बुढापा। इनमें तीसरी अवस्था अथवा दूसरी अवस्था के अन्त में लोगों में काम उत्पन्न होगा। तुम्हारी तपस्या के प्रभाव से आज मैंने यह मर्यादा बना दी कि पैदा होते ही कोई प्राणी कामयुक्त नहीं होगा। त्रिलोकी में तुम्हारे सतीत्व की ख्याति होगी अैार तुम्हारे पति के अतिरिक्त जो भी तुम्हें सकाम दृष्टि से देखेगा वह तुरन्त नपुंसक हो जायगा। तुम्हारे पति बडे भाग्यवान्, तपस्वी, सुन्दर और तुम्हारे साथ ही सात कल्पतक जीवित रहनेवाले होंगे। तुमने मुझसे जो वर माँगे थे वे दे दिये। अब जो तुम्हारे मन में बात है वह बताता हूँ। तुमने पहले आग में जलकर शरीर त्याग करने की प्रतिज्ञा की थी सो यहीं चन्द्रभागा नदी के किनारे महर्षि मेधातिथि बारह वर्ष का यज्ञ कर रहे हैं, उसी में जाकर शीघ्र ही अपनी प्रतिज्ञा पूरी करो, वहाँ ऐसे वेश से जाओ कि मुनिलोग तुम्हें देख न सकें। मेरी कृपा से तुम अगिन्देव की पुत्री हो जाओगी। जिसे तुम पति बनाना चाहती हो, मन से उसका चिन्तन करते-करते अपना शरीर त्याग करो। यह कहकर भगवान ने अपने करकमलों से सन्ध्या के शरीर का स्पर्श किया और तुरन्त ही उसका शरीर पुरोडाश (यज्ञ का हविष्य) बन गया। इसके बाद सन्ध्या अदृश्य होकर उस यज्ञमण्डप में गयी। भगवान की कृपा से उस समय उसने अपने मन में मूर्तिमान् ब्रह्मचर्य और तपश्चर्या के उपदेशक वसिष्ठ को पति के रूप में वरण किया और उन्हीं का चिन्तन करते-करते अपने पुरोडाशमय शरीर को अगिन्देव को समर्पित कर दिया। अगिन्देव ने भगवान की आज्ञा से उसके शरीर को जलाकर सूर्यमण्डल में प्रविष्ट कर दिया। सूर्य ने उसके शरीर के दो भाग करके अपने रथ पर देवता और पितरों की प्रसन्नता के लिये स्थापित कर लिया। उसके शरीर का ऊपरी भाग जो दिन का प्रारम्भ यानी प्रात:काल है, उसका नाम प्रात:सन्ध्या और शेषभाग दिन का अन्त सायं सन्ध्या हुआ और भगवान ने उसके प्राण को दिव्य शरीर और अन्त:करण को शरीरी बनाकर मेधातिथि के यज्ञीय अगिन् में स्थापित कर दिया। इसके पश्चात् मेधातिथि ने यज्ञ के अन्त में उस स्वर्ण के समान सुन्दरी सन्ध्या को पुत्री के रूप में प्राप्त किया। उस समय यज्ञीय अ‌र्घ्यजल में स्नान कराकर वात्सल्य स्नेह से परिपूर्ण और आनन्दित होकर उसे गोद में उठा लिया और उसका नाम अरुन्धती रखा। अरुन्धती चन्द्रभागा तट पर स्थित तापसारण्य नामक आश्रम में पलने लगी। पाँचवें वर्ष में पदार्पण करने पर ही उसके सद्गुणों से सम्पूर्ण तापसारण्य पवित्र हो गया। एक दिन अरुन्धती चन्द्रभागा के जल में स्नान करके अपने पिता मेधातिथि के पास ही खेल रही थी, स्वयं ब्रह्माजी पधारे और उसके पिता से कहा कि अब अरुन्धती को शिक्षा देने का समय आ गया है, इसलिये इसे अब सती साध्वी स्त्रियों के पास रखकर शिक्षा दिलवानी चाहिये; क्योंकि कन्या की शिक्षा पुरुषों द्वारा नहीं होनी चाहिये। स्त्री ही स्त्रियों को शिक्षा दे सकती है; किन्तु तुम्हारे पास तो कोई स्त्री नहीं है, अतएव तुम अपनी कन्या को बहुला और सावित्री के पास रख दो। तुम्हारी कन्या उनके पास रहकर शीघ्र ही महागुणवती हो जायगी। मेधातिथि ने उनकी आज्ञा शिरोधार्य की और उनके जाने पर अरुन्धती को लेकर सूर्यलोक में गये। वहाँ उन्होंने सूर्यमण्डल में स्थित पद्मासनासीन सावित्रीदेवी का दर्शन किया। उस समय बहुला मानस पर्वत पर जा रही थी, इसलिये सावित्रीदेवी भी सूर्यमण्डल से निकलकर वहीं के लिये चल पडी। बात यह थी कि प्रतिदिन वहाँ सावित्री, गायत्री, बहुला, सरस्वती एवं द्रुपदा एकत्रित होकर धर्मचर्चा करती थी और लोक-कल्याणकारी कामना किया करती थी। महर्षि मेधातिथि ने उन माताओं को पृथक्-पृथक् प्रणाम किया और सबको सम्बोधन करके कहा कि यह मेरी यशस्विनी कन्या है। यहीं इसके उपदेश का समय है। इसी से मैं इसे लेकर यहाँ आया हूँ। ब्रह्मा ने ऐसी ही आज्ञा की है। अब यह आपके पास ही रहेगी। माता सावित्री और बहुला आप दोनों इसे ऐसी शिक्षा दें कि यह सच्चरित्र हो। उन दोनों ने कहा- महर्षे! भगवान विष्णु की कृपा से तुम्हारी कन्या पहले से ही सच्चरित्र हो चुकी है; किन्तु ब्रह्मा की आज्ञा के कारण हम इसे अपने पास रख लेती हैं। यह पूर्वजन्म में ब्रह्मा की कन्या थी। तुम्हारे तपोबल से और भगवान की कृपा से यह तुम्हारी पुत्री हुई है। अरुन्धती कभी सावित्री के साथ सूर्य के घर जाती तो कभी बहुला के साथ इन्द्र के घर जाती। स्त्रीधर्म की शिक्षा प्राप्त करके वह अपनी शिक्षिका सावित्री और बहुला से भी श्रेष्ठ हो गयी। एक दिन मानस पर्वत पर विचरण करते-करते अरुन्धती मूर्तिमान् ब्रह्मचर्य महर्षि वसिष्ठ को देखा। उनके मुखमण्डल से प्रकाश की किरणें निकल रही थीं। अरुन्धती इस रूप पर मुग्ध हो गई। जगन्माता सावित्री को इस बात का पता लगा। इसके बाद मेधातिथि ने महर्षि वसिष्ठ से इस कन्या को पत्‍‌नी के रूप में स्वीकार करने का निवेदन किया। विवाह के अवसर पर ब्रह्मा, विष्णु आदि के द्वारा स्नान कराते समय जो जलधाराएँ गिरी थीं, वही गोमती, सरयू, सिप्रा, महानदी आदि सात नदियों के रूप में हो गयीं, जिनके दर्शन, स्पर्श, स्नान और पान से सारे संसार का कल्याण होता है। विवाह के पश्चात् वसिष्ठजी अपनी धर्मपत्‍‌नी के साथ विमान पर सवार होकर देवताओं के बतलाये हुए स्थान पर चले गये। वे जब जहाँ जिस रूप में रहकर तपस्या करते हुए संसार के कल्याण में संलगन् रहते हैं, तब तहाँ उन्हीं के अनुरूप वेश में रहकर अरुन्धती उनकी सेवा किया करती हैं। आज भी वह सप्तर्षि मंडल में स्थित वसिष्ठ के पास ही दीखती हैं।

भगवान शिव और माता पार्वती के बाद अगर आदर्श गृहस्थ जीवन का कोई बेहतरीन उदाहरण है तो वो महर्षि वशिष्ठ और उनकी पत्नी माता अरुंधति का ही है। वास्तव में श्रीराम से बहुत काल पहले महर्षि वशिष्ठ ने ही एकपत्नीव्रत का उदाहरण स्थापित किया था और कदाचित यही कारण था कि उनकी शिक्षा के आधार पर श्रीराम ने भी इसी व्रत का पालन किया।


ब्रह्मा के दाहिने अंग से स्वयंभू मनु उत्पन्न हुए और उनके वाम भाग से शतरूपा। इन्ही दोनों से मनुष्यों की उत्पत्ति हुई। दोनों से दो पुत्र - प्रियव्रत एवं उत्तानपाद एवं तीन पुत्रियाँ - आकूति, देवहूति एवं प्रसूति हुई। आकूति रूचि प्रजापति एवं प्रसूति दक्ष प्रजापति से ब्याही गयी। देवहूति का विवाह महर्षि कर्दम से हुआ और इन दोनों की १० संतानें हुई जिनमे से अरुंधति एक थी। एक पुत्र - कपिल एवं नौ पुत्रियाँ - कला, अनुसूया, श्रद्धा, हविर्भू, गति, क्रिया, ख्याति, अरुंधति एवं शांति।


माता अनुसूया के बारे में एक लेख पहले ही धर्मसंसार पर प्रकाशित हो चुका है जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं। माता अरुंधति इन्ही अनुसूया की छोटी बहन थी और अपनी बहन की भांति ही महान सती थी। इनका विवाह आगे चल कर महर्षि अत्रि से हुआ। महर्षि वशिष्ठ से विवाह करने के लिए इन्हे घोर तप करना पड़ा था और उस तप की प्रेरणा भी इन्हे महर्षि वशिष्ठ से ही मिली थी।


वास्तव में अरुंधति पूर्वजन्म में स्वयं ब्रह्मदेव की कन्या संध्या थी। संध्या ने अपने पिता से उपदेश माँगा जिसपर परमपिता ब्रह्मा ने उन्हें तप करने का आदेश दिया। अपने पिता की आज्ञा पाकर संध्या चन्द्रभाग पर्वत के निकट बृहल्लोलित सरोवर के तट पर पहुँची। किन्तु उन्हें ये पता नहीं था कि किसकी तपस्या करे और तपस्या किस प्रकार करनी चाहिए। वे उसी चिंता में उसी सरोवर के निकट बैठ गयी।


उसी समय भ्रमण करते हुए महर्षि वशिष्ठ वहाँ पहुँचे और एक कन्या को इस प्रकार बैठे देख कर उन्होंने उनसे उनका परिचय पूछा। तब संध्या ने उन्हें अपना परिचय दिया। महर्षि वशिष्ठ को देख कर संध्या के मन में उनके लिए अनुराग पैदा हो गया जिसे महर्षि वशिष्ठ ने अपने तपोबल से जान लिया। तब उन्होंने संध्या से कहा कि "हे देवी! आप और हम दोनों परमपिता ब्रह्मा की संतानें है इसी कारण हमारा विवाह तो संभव नहीं है किन्तु अगर तुम परमपिता के कहे अनुसार घोर तप करो तो अगले जन्म में हमारा साथ संभव है।


ये सुनकर संध्या ने उनसे कहा - "हे महर्षि! पिताश्री के आदेशानुसार मैं यहाँ तप के लिए ही आयी थी किन्तु मुझे पता नहीं कि मुझे किसकी तपस्या करनी चाहिए और उसे किस प्रकार करना चाहिए। अतः आपको गुरु मान कर मैं आपसे ही उसका उपाय पूछती हूँ। कृपया आप मेरा मार्गदर्शन करे कि मैं किसकी और किस प्रकार तपस्या करूँ? उसी से मेरे उद्विग्न मन को शांति मिलेगी।"


तब महर्षि वशिष्ठ ने कहा - "भद्रे! जो इस संसार के मूल कारण हैं उन्ही भगवान विष्णु की तुम तपस्या करो। उनसे तुम्हे मन चाहे वर की प्राप्ति होगी। तप के पहले छः दिनों तक भोजन मत करना। सिर्फ तीसरे और छठे दिन रात्रि को कुछ पत्ते खा कर जल पी लेना। उसके बाद जल का भी त्याग कर देना। तुम्हारी ऐसी तपस्या से भगवान श्रीहरि अवश्य ही प्रसन्न होंगे।" ये कहकर महर्षि वशिष्ठ वहाँ से चले गए।


उनके बताये हुए विधि से संध्या भगवान नारायण की घोर तपस्या करने लगी। उन्होंने चार युगों तक श्रीहरि की घोर तपस्या की और अंततः उसके तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन दिए। उन्हें अपने समक्ष देख कर संध्या अवाक् रह गयी। उसमें उतनी भी शक्ति नहीं बची थी कि वो खड़े होकर उन्हें प्रणाम कर पाती। उसकी ऐसी भक्ति देख कर नारायण ने उसे स्वस्थ कर दिया और पूछा कि वो किस कारण ऐसी घोर तपस्या कर रही थी? तब संध्या ने उनसे तीन वर मांगे:

किसी भी जीव में जन्म लेते ही काम की भावना ना हो।

मैंने जिनकी कामना की है वो ही मुझे पति रूप में प्राप्त हो और मेरा पतिव्रत अखंड रहे।

मेरे पति के अतितिक्त और कही भी मेरी सकाम दृष्टि ना हो और उनके अतिरिक्त जो कोई भी मुझे सकाम भाव से देखो वो तत्काल नपुंसक हो जाये।

तब श्रीहरि ने प्रसन्न होकर कहा - "पुत्री! तुमने उचित वरदान माँगा है। मैं तुम्हे वर देता हूँ कि अगले जन्म में  तुम्हारी इच्छा के अनुसार तुम्हे पति प्राप्त होगा और तुम दोनों कल्प के अंत तक जीवित रहोगे। कोई अन्य पुरुष अगर तुमपर काम दृष्टि डालेगा तो वो तत्काल नपुंसक हो जाएगा। आज के पश्चात किसी भी जीव में जन्म लेते ही काम भावना जाग्रत नहीं होगी। मनुष्य की चार अवस्थाओं - बाल्य, कौमार्य, यौवन एवं वृद्धावस्था में से अन्य तीन में तो काम भावना जाग्रत हो पायेगी किन्तु बाल्यावस्था में नहीं।"


"अब तुम जाओ और चन्द्रभाग पर्वत के निकट महर्षि मेघतिथि १२ वर्षों से यज्ञ कर रहे हैं जो आज समाप्त होने वाला है। उसी यज्ञ की अग्नि में तुम अपने शरीर का त्याग करो। मेरे आशीर्वाद से तुम अग्नि की कन्या बन जाओगी और कोई तुम्हे देख नहीं पायेगा।" ये कहकर श्रीहरि ने अपने चरणों से संध्या को स्पर्श किया जिससे वो यज्ञ के हविष्य के रूप में बदल गया और वो अदृश्य हो गयी। उसके पश्चात श्रीहरि अंतर्ध्यान हो गए।


पिछले लेख में आपने महर्षि कर्दम की पुत्री और महर्षि वशिष्ठ की पत्नी अरुंधति के प्रारंभिक जीवन के बारे में पढ़ा। आप जाना कि किस प्रकार अरुंधति पूर्वजन्म में भगवान ब्रह्मा की पुत्री संध्या थी जिसने महर्षि वशिष्ठ के उपदेश से भगवान विष्णु की तपस्या  की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर श्रीहरि ने उन्हें तीन वरदान दिए कि जन्म लेते ही किसी भी जीव में काम भावना ना हो, उनका पतिव्रत अखंड रहे और कोई भी काम दृष्टि से उन्हें देखे तो वो नपुंसक हो जाये। अब आगे...


भगवान विष्णु की कृपा से अदृश्य होकर संध्या महर्षि मेघतिथि के यज्ञ में गयी और वहाँ महर्षि वशिष्ठ को पति रूप में पाने की कामना लेकर उन्होंने यञकुंड में अपना शरीर समर्पित कर दिया। उस अग्नि में भस्म होने के बाद उत्पन्न उनकी पवित्र ऊर्जा को स्वयं सूर्यदेव ने दो भाग कर सृष्टि के कल्याण हेतु अपने रथ पर स्थापित किया। यही दो भाग प्रातः काल और संध्या काल कहलाये।


अगले जन्म में वही संध्या महर्षि कर्दम की पुत्री के रूप में जन्मी और उनका नाम रखा गया अरुंधति। जब वो पांच वर्ष की हुई तब स्वयं ब्रह्मदेव ने महर्षि कर्दम को ये आदेश दिया कि इस कन्या को उचित शिक्षा के लिए उसे माता सावित्री और माता बहुला के पास भेज दें। उनकी आज्ञा अनुसार महर्षि कर्दम सावित्री और बहुला से मिले और उन्हें अपनी कन्या सौंप दी। उन दोनों के देख रेख में अरुंधति ने १६ वर्ष में प्रवेश किया और उन्ही के समान सर्वगुणसम्पन्न बन गयी।


एक दिन वो मानस पर्वत पर भ्रमण कर रही थी जहाँ उन्होंने महर्षि वशिष्ठ को देखा। उन्हें देख कर उन्हें अपने पूर्वजन्म की बात स्मरण में आयी और उन्होंने वशिष्ठ को मन ही मन अपना पति मान लिया। जब माता सावित्री को इस बात का पता चला तो उन्होंने अरुंधति को पुनः महर्षि कर्दम को सौंपा और उनका विवाह महर्षि वशिष्ठ से करने का सुझाव दिया। बाद में उनका विवाह महर्षि वशिष्ठ से हुआ और दोनों सुख पूर्वक अपने आश्रम में रहने लगे। इन दोनों का स्थान सप्तर्षि तारामंडल में बताया गया है।


एक बार महर्षि वशिष्ठ अन्य सप्तर्षियों के साथ १२ वर्ष की घोर तपस्या के लिए चले गए। उस काल में अरुंधति अकेली अपने आश्रम पर ही रही। दैवयोग से सप्तर्षियों के जाते ही भयानक दुर्भिक्ष पड़ा। ७ दिनों तक देवी अरुंधति के मुख में अन्न का एक दाना तक नहीं गया। तब उन्होंने केवल वायु पीकर भगवान शिव की आराधना आरम्भ की ताकि उनका अंत हो जाये। तब उनकी परीक्षा लेने के लिए २१वें दिन स्वयं महादेव उनके आश्रम में एक वृद्ध के रूप में पधारे।


उन्होंने अरुंधति से खाने को कुछ माँगा। तब अरुंधति ने क्षमा याचना करते हुए महादेव से कहा कि उनके पास तो खाने को कुछ नहीं है। तब महादेव ने उन्हें कुछ बदरी के बीज दिए और उन्हें पकाने को कहा। अरुंधति उसे पकाने बैठी। समय काटने के लिए उन्होंने वृद्धरूपी भगवान शंकर से धर्म-कर्म की बातें आरम्भ कर दी। तब शंकर जी उन्हें धर्म का वास्तविक रूप समझाने लगे। 


भगवान शंकर की माया के कारण जब तक अरुंधति ने उन बदरी के बीजों को पकाया, तब तक १२ वर्ष बीत गए और उनकी कृपा से अकाल भी समाप्त हो गया किन्तु अरुंधति को लगा जैसे कुछ समय ही बीता हो। उसी समय सप्तर्षि अपनी घोर तपस्या समाप्त कर वहाँ पधारे। तब उन्हें देख कर अरुंधति आश्चर्य से बोली कि आप सब तो १२ वर्षों के लिए गए थे फिर इतनी जल्दी कैसे आ गए? तब महर्षि वशिष्ठ ने आश्चर्यचकित होकर उन्हें बताया कि वे सब तो १२ वर्ष के पश्चात ही वापस आ रहे हैं।

उसके पश्चात सातों महान ऋषि इस बात पर बहस करने लगे कि उन सातों में किसकी तपस्या सबसे उत्तम थी। जब कोई निर्णय नहीं हुआ तो अरुंधति ने वृद्धरूपी महादेव से इसका निर्णय करने को कहा। महादेव ने अरुंधति की भक्ति से प्रसन्न होकर उन सभी को दर्शन दिए और कहा कि आप सातों ऋषियों की सम्मलित तपस्या से भी अधिक कठोर व्रत अरुंधति का है। मैंने जो ज्ञान अरुंधति को दिया है आप सभी ऋषि उस ज्ञान को इनसे प्राप्त करें और जगत में उसका प्रचार करें। ये कहकर महादेव अंतर्ध्यान हो गए।


तब सप्तर्षि अरुंधति के तेज के समक्ष नतमस्तक हुए और उनसे वो ज्ञान प्राप्त किया जो अरुंधति ने १२ वर्षों में महादेव से प्राप्त किया था। वही ज्ञान आगे चलकर वेद और पुराण की कथाओं के रूप में प्रसिद्ध हुआ जिसका विस्तार जगत में सप्तर्षियों ने किया। माता अरुंधति से ही वार्तालाप करते हुए महर्षि वशिष्ठ ने 'राजर्षि' विश्वामित्र को 'ब्रह्मर्षि' विश्वामित्र कहकर पुकारा था। इसके बारे में पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ। 


सप्तर्षि तारामंडल के बारे में हमारे वेद-पुराणों में सहस्त्रों वर्षों पहले लिखा जा चुका था और आज आधुनिक वैज्ञानिक भी मानते हैं कि हमारे तारामंडल में दो युगल तारे हैं जो एक दूसरे की परिक्रमा करते हैं। वे महर्षि वसिष्ठ और माता अरुंधति ही है और आज भी वैज्ञानिक उन युगल तारों को "अरुंधति-वशिष्ठ" के नाम से ही जानते हैं। धन्य है ऐसी महान सती जिनकी महिमा से हमारा भारतीय समाज ओत-प्रोत है।



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