स्वामी रामतीर्थ
पुराने समय की बात है जब घोड़ा पालतू जानवर नहीं था घोड़ा मनुष्य की सवारी के काम नहीं आता था वह स्वतंत्रता और अपनी इच्छा अनुसार घूमा करता था एक बार घोड़े और बारहसिंघा के बीच लड़ाई छिड़ गई बारहसिंघा बलवान था उसने अपनी सीमाओं से घोड़े को घायल कर दिया और वेदना से पीड़ित घोड़ा मनुष्य के पास गया और उसने कहा बारहसिंघा को परास्त करने में आप मेरी सहायता कीजिए मनुष्य ने घोड़े कहना मान लिया और कहा तुम मुझे बारहसिंघा के पास ले चलो घोड़े ने मनुष्य को अपनी पीठ पर बिठाया और वह दोनों जंगल की ओर चल पड़े जंगल में मनुष्य ने बारहसिंघा को परास्त किया और दो उसे दूर खदेड़ दिया घोड़ा बहुत ही प्रसन्न हुआ मनुष्य के प्रति उसने कृतज्ञता प्रकट की फिर उसने मनुष्य कहा अब काम तो हो गया कृपया आप मेरी पीठ पर से उतर जाइए फिर उसने परंतु मनुष्य ने उसकी सवारी नहीं छोड़ी घोड़े को मनुष्य का गुलाम बनना पड़ा देखो घोड़ा अपने शत्रु पर विजय तो पा सका परंतु अपनी स्वतंत्रता से हाथ धो बैठा सरल शब्दों में कठिन विषय को समझाने की पद्धति स्वामी रामतीर्थ जी ने विकसित किया।
स्वामी रामतीर्थ जी कहते थे भारत क्या है मैं भारत हूं मेरा शरीर मानो उसकी भूमि है मेरे दोपहर मलबार और चोर मंडल है मेरे चरण कन्याकुमारी है मेरा सिर हिमालय है गंगा और ब्रह्मपुत्र से प्रचंड नदियां मेरे केस है राजस्थान और गुजरात के मरुस्थल मानव मेरा हृदय है पूर्व और पश्चिम दिशाओं में मेरी भुजाएं फैली है स्वामी रामतीर्थ चाहते थे कि देश का प्रत्येक व्यक्ति देश भक्त हो उसका जीवन देश के लिए हो और वह अपने देश का सम्मान बढ़ाने के लिए अपरंपार परिश्रम करें स्वामी जी इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए जिए।
स्वामी रामतीर्थ का पूरा नाम गोस्वामी तीर्थ राम था वे तुलसीदास जी के वंशज थे स्वामी रामतीर्थ का जन्म दीपावली के पर्व पर 22 अक्टूबर 18 सो 73 को हुआ हीरानंद की आर्थिक अवस्था अच्छी नहीं थी वह पुरोहित थे और लोगों को जो दान धर्म किया जाता उसी पर किसी प्रकार अपना जीवन निर्वाह करते रामतीर्थ कि सहसा वस्था में ही उनकी माता की मृत्यु हो गई उनके भाई गुरु दास और उनकी बुआ ने उनका पालन पोषण किया जब चेतराम की आयु केवल 2 वर्ष की थी उसे पिताजी ने उनकी मंगनी कर दी 10 वर्ष की आयु में ही उनका विवाह हो गया तीर्थ राम 5 वर्ष की आयु में पाठशाला जाने लगे उनका शरीर दुर्बल था परंतु अत्यंत बुद्धिमान थे उनका स्मरण शक्ति बहुत तेज थी पांचवी कक्षा में पढ़ते समय ही उन्होंने फारसी किताबें गुलिस्ता और वह था और कई उर्दू कविताएं कंठस्थ हो गई थी उन्हें खेलों में कोई रुचि नहीं थी खाली समय में मंदिरों में जाकर बड़े मनोयोग से मंत्र पाठ सुना करते थे 10 वर्ष की आयु में उन्होंने प्राथमिक शिक्षा पूर्ण की आगे की पढ़ाई करने के लिए वे गुर्जर वाला गए वहां वे अपने पिता के मित्र धन्नाराम जी के यहां रहने लगे धनाराम जी को गुरु के सम्मान पूज्य माना पंजाब विश्वविद्यालय की मैट्रिक की परीक्षा में प्रथम आए उनकी आयु केवल 14 वर्ष की थी नगर परिषद ने छात्रवृत्ति दी उन्हें आगे पढ़ने की इच्छा हुई परंतु पीता नहीं चाहते थे कि वह आगे पढ़े पिता की इच्छा के विरुद्ध वह पढ़ने के लिए लाहौर गए वहां ज्ञानसाधना में मग्न हो गए कुरूद पिता ने उन्हें कोई सहायता नहीं भेजी तीर्थ राम को छात्रवृत्ति की राशि पर ही गुजारा करना पड़ता प्रथम वर्ष तो जैसा भी था परंतु दूसरे वर्ष मुसीबत के पहाड़ टूट पड़े रात दिन पढ़ाई करते कई बार बीमार पड़ते तब भी वे एकांत मैं अपना सारा समय पढ़ाई में बिताते थे इंटरमीडिएट की परीक्षा में प्रथम क्रमांक से उत्तीर्ण हुए उनके परिश्रम का फल प्राप्त हुआ सरकारी छात्रवृत्ति प्राप्त हुई राम के गुरु और भगवान के प्रति उनके श्रद्धा बढ़ती गई उन्हें आत्मनिर्भर होता देखकर उनके पिता मन में उड़ने लगे उनकी सहायता के बिना अपना पुत्र प्रगति कर रहा है उन्होंने बहू को तीर्थ राम के पास पहुंचा दिया घर गृहस्ती फीस किताबें आदि का खर्च उन्हें मिलने वाली छात्रवृत्ति में से करना पड़ता एक ही जूता अनेकों वर्षों तक पहन्ने के कारण वह फटा पुराना हो जाता परंतु वे उसे ही पहन कर कालेज में जाया करते 1 दिन की बात है उनका एक जूता नाले में गिर पड़ा और वह पानी के प्रवाह के साथ बह गया तब रास्ते पर किसी महिला द्वारा फेंकी गई चप्पलें पहन कर ही वे कालेज में आ गए बीए की परीक्षा में यूनिवर्सिटी में उन्हें सबसे अधिक अंक मिले परंतु अंग्रेजी विषय में 3 अंक कम मिलने से वह अतुल घोषित हुए उनकी छात्रवृत्ति बंद हो गई यह समस्या खड़ी हो जाने से उन्हें कोई उपाय सूझा नहीं उनकी आंखें डबडबा गई हो भगवान से प्रार्थना करने लगे कालेज के अहाते में झंडू मल नामक व्यक्ति मिठाई बेचा करता था उसने तेरा हमसे कहा कि वे रोज उसके यहां भोजन करने के लिए आया करें इस प्रकार उनको एक सहायता हुआ दूसरी बार वे b.a. परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए पूरी यूनिवर्सिटी में सर्वप्रथम आए 2 छात्र विद्या स्वर्ण पदक और वस्त्र लंका प्राप्त हुए भगवान पर विश्वास और निरहुआ तब उनकी आयु 19 वर्ष की थी गणित विषय में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के लिए लाहौर के सरकारी कालेज में भर्ती हुए पढ़ाई के साथ साथ वह व्याख्याता के पद पर भी काम करने लगे m.a. परीक्षा उत्तीर्ण हुए तब उनकी आयु 21 वर्ष थी वह मेधावी छात्र थे अच्छी नौकरी वह आगे की पढ़ाई के लिए विदेश जाना संभव था परंतु ए सरकारी अफसर बनना नहीं चाहते थे बल्कि एक बड़ा आदमी बनना चाहते थे अमेरिका मिशन हाई स्कूल व्याख्याता की नौकरी करने लगे वहां उन्हें मासिक वेतन मिलने लगा परंतु उन्हें कभी मन शांति नहीं मिली वेदों कालेजों में पढ़ाई करते थे और उससे जो भी आमदनी होती वह दूसरे लड़कों पर ही खर्च कर डालते राम को भगवत गीता से प्रेम था वह गीता पढ़ते तब तब उन्हें अनुभव होता कि प्रत्यक्ष भगवान श्री कृष्ण के समीप खड़े हैं जब कभी विभक्ति और कृष्णा पर बोलते तब उनकी आंखें डबडबा जाती द्वारका पीठ के शंकराचार्य श्री राजराजेश्वर तीर्थ का लाहौर में आगमन हुआ उनके प्रवचनों से तीरथ राम अत्यंत प्रभावित हुए स्वामी विवेकानंद के भाषणों का भी उन पर बहुत प्रभाव पड़ा गंगा के किनारे छोटी सी कुटिया में रहकर भी अपना सारा समय ध्यान धारणा में बिताने लगे उनके मन में असंख्य प्रश्न उठने लगे कि मैं कौन हूं क्या मैं 3:30 हाथ का शरीर हूं संसार क्या है आत्मा क्या वस्तु है और उसका सामर्थ्य क्या है वह हिमालय की यात्रा पर जाया करते वहां वे उपनिषदों में मन पठान में अपना समय बिताते रात हो या दिन वर्षा हो या धूप है गंगा किनारे तपस्या करते सन 18 सो 98 में वह शुभ घड़ी आई सी के समीप ब्रम्हपुरी में उन्हें आत्म साक्षात्कार हुआ लगातार छह महीनों तक में हिमालय में तपश्चार्य करते रहे 1901 में उन्होंने सन्यासी बनने का संकल्प लिया एक दिन अपना पवित्र जनेऊ उतार कर उन्होंने उसे गंगा अर्पण कर दिया तीर्थ राम गोस्वामी अब स्वामी राम तीर्थ बन गए स्वामीनारायण के साथ स्वामी रामतीर्थ जापान के या को हामा नगर में गए परंतु वहां पहुंचने पर उन्हें पता चला कि वहां कोई परिषद होने वाली नहीं है तब यह दोनों टोक्यो आदि स्थानों पर गए उन सभी स्थानों पर उनके प्रवचन हुए जापानी छात्रों और विद्वानों के सामने उनके भाषण हुए सभी लोग उनके वचनों से अत्यंत प्रभावित हुए जापान से वे अमेरिका गए स्वामी रामतीर्थ ने 2 वर्ष तक अमेरिका का दौरा किया अमेरिका से स्वदेश लौटते समय मिश्रा में रुके वहां एक भव्य मस्जिद में उन्होंने फारसी में भाषण दिया मिश्रा वासियों के हृदय जीत लिया जब एक जापानी युवक ने माता की सेवा करना श्रेष्ठ घर मानकर सेना भर्ती होने से इनकार कर दिया तब उसकी माता ने आत्महत्या कर ली एक बुढ़िया को सील रही थी उसकी सुई खो गई घर में दिया ना होने से अंधेरा फैला हुआ था परंतु रास्ते पर दिए का प्रकाश फैला था गुड़िया उस प्रकाश ने अपनी सोई हुई खोई हुई हुई पहुंचने लगी स्वामी जी 33 वर्षों तक जीवित रहे
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