जनजाति विषय

*अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायतों का विस्तार" अर्थात, (Panchayat Extension to Schedule Area)* 
*पेसा (PESA) कानून -- 1996*

भारतीय संविधान में 73 वे संविधान संशोधन से पंचायत राज कानून देश में प्रारंभ हुआ। उसमें जिला पंचायत, जनपद पंचायत एवं ग्राम पंचायत ऐसी त्रिस्तरीय रचना हुई। संविधान की पांचवी अनुसूची के क्षेत्रों में दिए हुए अधिकार एवं जनजाति समाज की रूढ़ि एवं परंपरागत ग्रामसभा की रचना को देखते हुए, स्वर्गीय दिलीप सिंह भूरिया जी के अध्यक्षता में एक कमेटी नियुक्त हुई। उस कमेटी का प्रवास देश भर के जनजाति क्षेत्र में हुआ। उस समय कल्याण आश्रम के कार्यकर्ता भी उनके साथ थे। उनके प्रवास के पश्चात भूरिया कमेटी के सुझावों के अनुसार ग्राम पंचायत को जनजाति क्षेत्र में पारा/ टोला/ फलिया के अनुरुप चौथे स्तर की ग्रामसभा करने का निर्णय हुआ, और अनुसूचित क्षेत्र में पंचायतों का विस्तार अर्थात PESA (Panchayat Extension to Schedule Area) पेसा कानून 1996 में पारित हुआ एवं 1 जनवरी 1997 से देशभर मे लागू हुआ। 

इस कानून में मुख्य दो बातें है।
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👉1.पहली महत्व की बात यह है कि जनजाति क्षेत्र में उनके परंपरा के अनुसार ग्राम सभा का आयोजन हो। 
जिस स्तर पर नैसर्गिक संसाधनों का सामुदायिक उपयोग होता है, गांव के झगड़े सुलझाना, विवाह एवं अन्य रिश्तो को एवं प्रॉपर्टी को संचालित करना, सामुदायिक देव देवताओं की पूजा, ऐसी अनेक बातों को संचालित करने वाले गांव के मुखिया होते हैं। जिनको आज तड़वी, पटेल, महाजन, हेडम्यान, मुंडा, प्रधान, माझी हडाम ऐसे विविध नाम से पहचाना जाता है। इस परंपरा को बचाए रखते हुए पेसा कानून के तहत सभी टोला/ पारा का विकास करने हेतु अलग-अलग ग्रामसभाओं को इस पेसा कानून द्वारा मान्यता दी है |

👉2.*दूसरी महत्व की बात यह है कि,
अनुसूचित क्षेत्र में परंपरागत ग्रामसभा ओं को अधिकार देने के पश्चात राज्यों के विविध कानूनों में बदलाव करना आवश्यक है। भूमि हस्तांतरण, लघु खनिज नियंत्रण, लघु वनोपज स्वामित्व, बाजार नियंत्रण, जल स्त्रोत नियंत्रण, अनुसूचित क्षेत्र हेतु केंद्रीय निधि का विनियोग, किए हुए विकास कार्य हेतु उपयोगिता प्रमाण पत्र देना, रूढी परंपराओं की सुरक्षा करना, लाभार्थियों का चयन करना, गांव के विकास कार्यों का नक्शा बनाना -- इस प्रकार के अनेक अधिकार अनुसूचित क्षेत्र के इन पेसा ग्राम सभाओं को इस पेसा कानून द्वारा प्रदत्त है |

      इस प्रकार जनजाति समाज के जीवन यापन के संसाधन एवं रूढी परंपराओं की सुरक्षा इन सब बातों के लिए ग्राम सभाओं को जो अधिकार पेसा कानून ने दिए है, उन सब विषयों की सुरक्षा के लिए, पंचायत राज कानून आने के पूर्व, भारतीय संविधान सभा ने अनुसूचित क्षेत्र के लिए माननीय राष्ट्रपति द्वारा माननीय राज्यपाल महोदय को अधिकार दिए है। 
पांचवी अनुसूची के क्षेत्र में कोई भी केंद्र सरकार का कानून अथवा राज्य सरकार का कानून लागू करने से माननीय राज्यपाल मना कर सकते हैं, अथवा उसमें संशोधन करते हुए नोटिफिकेशन निकाल सकते हैं। किंतु राज्यपाल द्वारा इस अधिकार का उपयोग आज तक नहीं के बराबर है।
पेसा कानून से यह अधिकार अब परंपरागत ग्राम सभाओं को दिए है। 

1996 से आज 2021 को इस कानून को बने 25 वर्ष पूर्ण हो रहे है। जनजाति समाज की नई पीढ़ी शिक्षित एवं जागृत भी हुई है। केंद्रीय कानून होते हुए भी, इसका अमल न होने के कारण, विविध अराष्ट्रीय विचारधाराओं ने इस कानून को तोड़ मरोड़ कर गलत ढंग से उपयोग करते हुए,
"ना लोकसभा ना विधानसभा, सबसे बड़ी ग्राम सभा "
"ग्राम सभा के बिना अनुमति किसी को गांव में प्रवेश नहीं"। "इस पेसा गांव में कोई भी केंद्र या राज्य सरकार का कानून लागू नहीं होगा।"
            इस प्रकार का भ्रम फैलाकर कुछ स्थानों में पत्थर गाडकर असंवैधानिक बातों को लिखकर समाज को भ्रमित किया जा रहा है। 
इस बात को ध्यान में लेते हुए प्रत्यक्ष इस पेसा कानून में जनजाति समाज की आजीविका हेतु नैसर्गिक संसाधनों के सुरक्षा का अधिकार, जनजातियों के रूढ़ी परंपराओं की सुरक्षा ऐसी अनेक विकास की बातों को समाज तक पहुंचना अत्यंत आवश्यक है। अन्यथा इस कानून में कौन से अधिकार है यह स्पष्ट नहीं किया तो गलत बातों को अधिकार मानकर यह भ्रम फैलता ही जाएगा।
       इस पेसा कानून को लागू करने के साथ-साथ परंपरागत ग्राम सभाओं को सक्षम एवं प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है। इस हेतु विविध राज्यों ने ग्राम सभा स्तर पर प्रेरक कार्यकर्ताओं की नियुक्ति की है,, जिससे "ग्राम स्वराज" एवं "अन्त्योदय" की दिशा में पहल होगी। 
"अपना गांव -- अपना विकास" यह प्रत्यक्ष में साकार होगा।
                    रामनाथ बस्तरिया                                               सामाजिक कार्यकर्ता

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