जनजाति विषय पांचवी अनुसूची
*पांचवी अनुसूची का गलत अर्थ प्रचारित करना यह सोची समझी साजिश* पिछले कुछ वर्षों से यह अनुभव हो रहा है कि जनजाति बाहुल्य क्षेत्रों में आदिवासी गैर आदिवासी विवाद भड़काने इसका उपयोग किया जा रहा है इससे समाज का दोहरा नुकसान होता है 👉1. अनुसूचित जाति आदिवासी समाज को लगता है कि हमारे अधिकारों को गैर जनजाति छीन रहे हैं ।👉2 . गैर जनजाति समाज को लगता है कि पांचवी अनुसूची उनके विरोध में है । *पांचवी अनुसूची क्षेत्र याने क्या* .....? ब्रिटिश अवधि के दौरान जिन क्षेत्रों में जनजाति मुख्य रूप से बसे हुए थे, अनुसूचित जिला अधिनियम 18 74 और गवर्नमेंट ऑफ इंडिया *(Excluded and Partially Excluded Araias) Order 1936* के द्वारा अप वर्जित आंशिक से बहिष्कृत क्षेत्र घोषित किए गए । बाद में आजादी के बाद , राष्ट्रपति इन क्षेत्रों को पांचवी और छठी अनुसूची के तहत संविधान में सम्मिलित किया गया । *उद्देश्य जनजातीय स्वायत्तता, उनकी संस्कृति और आर्थिक सशक्तिकरण को संरक्षित करने के लिए सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करने और शांति का संरक्षण और सुशासन* ढेबर आयोग 1960 61 के मापदंड: किसी एक क्षेत्र को अनुसूचित घोषित करने के लिए मानदंड प्रथम अनुसूचित क्षेत्र और अनुसूचित जनजाति आयोग (ढेबर आयोग 1960-61) ने निम्नलिखित मापदंडों को निर्धारित किया था पांचवी अनुसूची के तहत किसी भी क्षेत्र को अनुसूचित क्षेत्र के रूप में घोषित करने हेतु👉 *A*. जनजाति आबादी जोकि कम से कम 50% होनी चाहिए *B* क्षेत्र की सघनता और उचित सीमांकन योग्य होना *C* क्षेत्र की अविकसित आर्थिक राजनयिक व सामाजिक प्रकृति *D* जनजाति लोगों की आर्थिक मानक *(व्यवसायिक पड़ोसी क्षेत्रों की अपेक्षा)* में चिन्हित असमानता जैसा कि तुलना में पड़ोसी क्षेत्रों में स्थिति हो। भारतीय संविधान अनुच्छेद 244(1) के तहत माननीय राज्यपाल को इन क्षेत्रों के लिए विशेष अधिकार दिए गए हैं। न्यायालय ने भी राज्यपालों को पांचवी अनुसूची संबंधी निर्णय में स्वतंत्र विद्वता का प्रयोग करने की सलाह दी है किंतु पिछले 70 सालों में राज्यपाल जनजातियों के हिस्से आने वाली विषयों पर अथवा उनकी स्थिति के बारे में अंजान बने रहे , यहां तक कि राज्यपालों ने जनजातियों के अति गंभीर विषयों पर भी महामहिम राष्ट्रपति को दी जाने वाली रिपोर्ट में जिक्र नहीं किया । बल्कि वे राज्य की सरकारी योजनाओं की तारीफ करते नजर आए बिना किसी *परिस्थितिगत प्रमाणों* के आज परिणाम हुआ कि..... 👉1. *आजादी के बाद भी जनजाति बाहुल्य क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर और संवैधानिक धर्मांतरण 👉2. *आदिवासी हित समूह के नाम पर समितियां बनाकर भ्रम और अलगाव की भावना भरना 👉3.*जनजाति क्षेत्रों में आयोजित रूप से जल , जंगल , जमीन के नाम पर विदेशी शक्तियों द्वारा अराष्ट्रीय गतिविधि* 👉4.*जनजातीय क्षेत्रों में आदिवासी गैर आदिवासी नाम से पूजा पद्धति श्रद्धा केंद्रों मान बिंदुओं को लेकर जातीय और सामाजिक विद्वेष फैलाना आदि आदि* इस प्रकार से पांचवी अनुसूची और पेसा कानून की आड़ में कई ज्ञात - अज्ञात गतिविधि विभिन्न *संगठनों ,संस्थाओं , व्यक्तियों समूह, समितियों* द्वारा चलाए जा रहे हैं । इन विषयों , कार्यों का अध्ययन करना भी आवश्यक है, जोकि पांचवी अनुसूची और पेसा कानून के सन्दर्भ में गलत अर्थ प्रचारित कर रहे हैं । *इस विषय पर शासन प्रशासन आंतरिक सुरक्षा में लगी एजेंसियों आदि को भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है* । जिससे कि सामाजिक अलगाव और जाति विद्वेष से बचा जा सके । और जनजातियों का अहित न हो सके। रामनाथ बस्तरिया
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