श्रद्धा

जब हम किसी व्यक्ति में जनसाधारण से विशेष गुण या शक्ति का दर्शन करते हैं तो उसके प्रति एक आनंद युक्त आकर्षण पैदा होता है हमें यह आकर्षण उसके महत्व को स्वीकार करने के साथ हमने उसके प्रति पूज्य भाव भी पैदा करता है इस प्रक्रिया का नाम ही श्रद्धा है।


 श्रद्धा का अर्थ है--”सत्य में धारण करना”। ”श्रत्” अर्थात् सत्य, ”धा” अर्थात् ”धारण करना।” संसार की प्रत्येक वस्तु का विकास सत्य की तरफ है। यह विश्वास कि संसार के प्रवाह की दिशा ”सत्य” की तरफ है, असत्य की तरफ नहीं।



३. कोई भी व्यक्ति वही होता है, वैसा ही बनता चला जाता है, जैसी उसकी श्रद्धा होती है।अपनी बुद्धि और स्वयं की  सक्रियता श्रद्धा के ही अनुगामी होते हैं।


श्रद्धा मानव जीवन का नीव है जैसे उसकी श्रद्धा होती है वैसा ही उसका व्यक्तित्व बनता है गीता के अनुसार :- श्रद्धामयोऽयं पुरुष: मनुष्य स्वभाव से ही श्रद्धावान है।


जिस प्रकार सूर्य के बिना दिन नहीं होता आंखों के बिना देखा नहीं जा सकता उसी प्रकार श्रद्धा के बिना जीवन गति में नहीं हो सकता।


श्रद्धा ही सत्य का साक्षात्कार कराती है

श्रद्ध्या सत्यमाप्यते - श्रद्धा से सत्य की प्राप्ति होती है।

श्रद्धा प्राण: - श्रद्धा मनुष्य का प्राण है।


श्रद्धा मुक्ति का ज्ञान प्राप्ति का जीवन साधना का आधार है।

श्री कृष्ण जी ने अर्जुन से कहा :- 

 ज्ञान प्राप्त करने का मूल मंत्र केवल श्रद्धा है श्रद्धा के बीच से ही विश्वास का अंकुर फूटता होता है।

और आस्था का पौधा लह्लाहने लगता है और इसी पौधों पर ज्ञान के फूल खिलते हैं।


श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय: |

ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति || 


श्रद्धा ही तो है जो पत्थर में मनुष्य को भगवान दिखा देती है।

 श्रद्धा के कारण ही शिवलिंग में भगवान शंकर दिखाई देते हैं ।

अगर श्रद्धा ना हो तो केवल पत्थर दिखाई देगा ।

श्रद्धा वह सीधा सरल रास्ता है जो मनुष्य को प्रेम और शांति की ओर लेकर जाता है ।

श्रद्धा द्वारा मनुष्य निष्ठावान बन जाता है।

 जिसके मन में श्रद्धा नहीं होती वह संशय और अंधेरों में  भटक जाता है  सुख और शांति से वंचित हो जाता है।

 जिसके मन में श्रद्धा नहीं होती वहां शंका होती है जिसमें ना उजाला होता है ना अंधेरा खत्म होता है जिससे वह धीरे-धीरे अपनी जीवन को गहरे अंधेरे में धकेल देता है।


श्रद्धा होती है फिर डाउट होता है फिर श्रद्धा होती है ऐसा नहीं चाहिए।

 श्रद्धा में बार-बार किंतु परंतु but चुकी तर्क वितर्क कुतर्क नहीं चलता।


बाल्मीकि से गुरु ने कहा मरा मरा रटते रहो जब तक हम लौट के नहीं आएंगे।


गुरु ने जैसा कहा वैसा बाल्मीकि ने करना प्रारंभ किया गुरु को प्रश्न उसने नहीं किया कब आएंगे कितने दिन का प्रतीक्षा रहेगा ,क्यों मरा मरा रटता रहूं,

 इस प्रकार क्यों प्रश्न नहीं किए जिसका परिणाम यह हुआ कि घोर मूर्ख व्यक्ति ,हत्या करने वाला ,एक बड़ा डाकू रत्नाकर से बाल्मीकि तक कि यात्रा की केंद्र बिंदु में था  श्रद्धा  जिसके कारण ही ज्ञान का साक्षात्कार हुआ ।

जो सोचा नहीं था वह सारा सब कुछ उन्हें प्राप्त हुआ।


उदाहरण अपने व्यक्तिगत जीवन में अपने मकान को बेच कर के एक छोटे से कांगड़ी गांव में  गुरुकुल की स्थापना करते हैं , मास्टर शिक्षक रखने की हैसियत नहीं थी।  इसलिए बच्चो को स्वयं  पढ़ाना प्रारंभ किया । रसोईया रखने की भी हैसियत नहीं थी, इसलिए खाना भी पकाना उन्होंने स्वयं से शुरू किया । ऐसी लगन और निष्ठा जिन लोगों ने देखा वह सभी प्रभावित होते चले गए, आगे वही लोग कार्य में सहयोगी भी बनते चले गए और जो लोग जुड़ते चले गए उनको विश्वास था की जिसने अपना मकान बेचकर स्वयं साधु बनकर अपना संपूर्ण परिश्रम लगन गुरुकुल को दे दिया हो । वह व्यक्ति जो झाड़ू लगाने से लेकर खाना पकाने से लेकर पढ़ाने तक का सारा काम और यहां तक कि बच्चों के कपड़े धोने का भी सारा काम अपने जिम में लिया हो तो , सारा काम अपने लगन से करता हो उसके कारण सारे लोग उनकी और खींचे चले गए, सब मैग्नेट बन गया चुंबक बन गया लोगों का पैसा भी आता चला गया और यह रुका नहीं बढ़ता ही चला गया कांगड़ी में एक बड़ा गुरुकुल की स्थापना होगी और उस जमाने में उन्होंने 40 से 45 व्यक्ति जो समाज जीवन के लिए अपना जीवन को खड़ा कर सके ऐसा निर्माण करने की क्षमता को विकसित किया ऐसे व्यक्ति जो समाज जिन्हें श्रद्धानंद के नाम से जानती है



हमने बचपन में रामलीला दिखाए उस रामलीला में अनेक के लोग अभिनय करते हैं पात्र बनते हैं कोई हनुमान जी का पात्र बनता है कोई राम जी का कोई लक्ष्मण का कोई सुग्रीव का तो चेहरा लगाने से कोई बात बनती नहीं है उसका अभिनय तो अच्छा किया जा सकता है पर जो देखने वाले लोग हैं उन्हें यह पता होता है कि यह वही व्यक्ति है जो हमारे पड़ोस में रहता है आज यहां रामलीला में हनुमान बना फिर रहा है यह हनुमान थोड़े हैं हमारे पड़ोसी का सुखराम है तो समाज को यह पता होता है कौन मुखौटा पाना है इसलिए श्रद्धा वन बनना है श्रद्धा के केंद्र में रहना है किसी पर हमें एक सच्ची श्रद्धा व्यक्त करनी है तो उसके लिए काम करना पड़ता है इसलिए मैंने सुना होगा श्रद्धा और सेवा श्रद्धा और लगन श्रद्धा और परिश्रम से कार्य करने वाले लोग कोई यश प्राप्त होता है



५.महाभारत में हमने देखा  दुराचरण और निरंकुश भोग की श्रद्धा ने दुर्योधन को तब तक चैन से नहीं बैठने दिया, जब तक अपने सभी स्वजनों-सम्बन्धियों- सहयोगियों का और स्वयं अपना भी विनाश उसने नहीं करा डाला। यदि उसकी श्रद्धा भ्रातृत्व, मैत्री और सहयोग में रही होती, तो महाभारत न हुआ होता



रात के दो बज रहे थे..एक अमीर आदमी सो नहीं पाया..करवटें बदली ..वह फिर थककर खडा हो गया..उसने चाय पी और सिगरेट पी..


टेरेस पर चक्कर लग्गाये... पर कहीं चैन नहीं मिला ...


अंत में थककर वो आदमी नीचे आ गया,


🚗 *कार* पार्किंग से निकली और शहर की सड़कों पर टहलने निकल गया ..


चलते-चलते उसे एक *मंदिर* दिखाई दिया..कुछ देर इस मंदिर समीप जा कर .भगवान के बगल में बैठता हूँ ..प्रार्थना करंगा तो शायद ..कुछ शांति मिले..वह आदमी ऐसा सोचकर मंदिर समीप गया..


वहां एक और आदमी बैठा देखा, उदास चेहरा.. उसकी आँखों में गमगीनी .. यह देखकर उस आदमी को तरस आया.. पूछा "भैया इतनी रात क्यों..?"


उस आदमी ने कहा.. "मेरी पत्नी अस्पताल में है। अगर सुबह ऑपरेशन नहीं किया गया तो उसकी मौत हो जाएगी और मेरे पास ऑपरेशन के लिए पैसे नहीं हैं।"


इस अमीर आदमी ने अपनी जेब से पैसे निकाल कर गरीब आदमी को दे दिए.. और उसके चेहरे पर एक चमक आ गई..


फिर इस अमीर आदमी ने उसे अपना कार्ड दिया और कहा... "अगर आपको अभी भी कभी भीऔर आवश्यकता हो , तो यह मेरा नंबर है, मुझे कॉल करें ..इस में मेरा पता भी है .. व्यकतीगत रूप से आ जाइएगा .. संकोच न करें।"


उस आदमी ने कार्ड लौटा दिया.. और कहा "मेरे पास पता है.. मुझे इस पते की ज़रूरत नहीं है भाई"


अमीर ने हैरानी से कहा.. "किसका पता है..?"


दीन आदमी मुस्कुराया .और कहा ..


"उसका जिसने आपको आधी रात को यहाँ भेजा है ।"


सर, इसे कहते हैं पूर्ण श्रध्धा , इसे कहते हैं आस्था।


इश्वर में आस्था रखने से वो हमारी सहायता अवश्य करतें है,


चाहे खुद ना भी आये , पर किसीको हमारी सहायता करने को प्रेरित तो अवश्य करते ही है |


बाजीराव पेशवा मराठा सेना के प्रधान सेनापति थे। एक बार वह किसी युद्ध में विजयी होकर सेना सहित राजधानी लौट रहे थे। मार्ग में उन्होंने मालवा में पड़ाव डाला। भूख-प्यास से सभी बेहाल थे परंतु खाने के लिए अब उनके पास पर्याप्त सामग्री नहीं थी। यह देखकर बाजीराव ने अपने एक सरदार को बुलाकर किसी खेत से फसल कटवाकर छावनी में लाने का आदेश दिया। 


सरदार सैनिकों की एक टुकड़ी लेकर पास के गांव में पहुंचा और एक किसान को सबसे बड़े खेत पर ले जाने को कहा। 



किसान को लगा कि यह कोई अधिकारी है, जो खेतों का निरीक्षण करने आया है। बड़े खेत पर जाते ही सरदार ने सैनिकों को फसल काटने का आदेश दे दिया। 

यह सुनते ही किसान चकरा गया। उसने हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘महाराज! आप इस खेत की फसल न काटें। मैं आपको दूसरे खेत पर ले चलता हूं।’’ 



सरदार और उसके सैनिक किसान के साथ चल पड़े। वह उन्हें कुछ मील दूर ले गया और वहां एक छोटे-से खेत की ओर संकेत कर कहा, ‘‘आपको जितनी फसल चाहिए, यहां से काट लीजिए।’’



सरदार ने नाराज होते हुए कहा, ‘‘यह खेत तो बहुत छोटा है। फिर तुम हमें यहां इतनी दूर क्यों लाए?’’ 



तब किसान नम्रता से बोला, ‘‘वह खेत किसी दूसरे का था। मैं अपने सामने उसका खेत कैसे कटता देखता? यह खेत मेरा है, इसलिए आपको यहां ले आया। किसान का बड़ा दिल देखकर सरदार का गुस्सा ठंडा हो गया। उसने फसल नहीं कटवाई और बाजीराव को सारी बात बताई। तब बाजीराव ने अपनी गलती सुधारते हुए किसान को उसकी फसल के बदले पर्याप्त धन दिया और फसल कटवाई। नम्रता, बड़प्पन को दर्शाती है।’’



शिक्षा : वस्तुत: ओहदेदार होकर भी विनम्रता रखना ही समाज की दृष्टि में संबंधित को श्रद्धेय बनता है।


उदाहरण:- 

स्वामी विवेकानंद जी और रामकृष्ण जी को कर्क रोग, बलगम की कटोरी को निगल जाना।


एक संत जी। द्वारा प्रवचन भवसागर पार  और एक दूधवाला का आस्था से नदीपार करना।


श्रील प्रभुपाद जी का हिप्पी जाति के लोगो मे भक्ति 10000 शिष्य बनाकर गुरु के आस्था ब श्रद्धा के प्रति जागरण


एक संत जी कुछ कारीगर के बात मंदिर निर्माण का उदाहरण।




  • सच्ची श्रद्धा में बहुत ताकत होती है उदाहरणार्थ रजा बलि. भगवान् इनसे इतने प्रसन्न हो गये थे की इनके द्वारपाल तक बन गये.


  • श्रद्धा दिल से आती है जहां दीमाग की कोई आवश्यकता नहीं वहीं अंधविश्वास में दिल और दिमाग दोनों की ही आवश्यकता नहीं ।


  • श्रद्धा बंद आँखों से वहीं अंधविश्वास खुली आँखों से ।


  • श्रद्धा आस्था के कारण तो वहीं अंधविश्वास डर के कारण ।


  • श्रद्धा मे सर झुकता है और अंधविश्वास में बुद्धि ।


  • श्रद्धा मे आप स्वयं ही खुद को सौंप देते हो तो वहीं अंधविश्वास में आपको खुद को सौंपना पड़ता है ।


  • श्रद्धा मे आप स्वयं करते हो तो वहीं अंधविश्वास में आपको करना पड़ता है




 

  • श्रद्धा का वास्तविक अर्थ है- महापुरुषों के वाक्यों में निष्ठा होना। उनके आप्त वचन आपको हितकर लगें। आपको यह लगे कि जो शास्त्र में, ग्रंथ में है, संत कह रहा है, गुरु कह रहे हैं, माता-पिता बता रहे हैं और हमें परम्परा से प्राप्त है, वे सारे के सारे ऐसे प्रमाण हैं जिनसे तारण हो सकता है। यही तत्व तारक हैं, धर्म मूलक हैं, व्यवस्था मूलक हैं, ज्ञान मूलक हैं तथा मुक्ति मूलक हैं। 




  • श्रीमद् भागवत गीता’ में कहा गया है श्रद्धा ज्ञान की जननी है। श्रद्धा की कोख में ही ज्ञान पलता है। जो ज्ञान भ्रम-भय का भंजन करता है, हमारी मूल मान्यताओं पर प्रहार करता है, हमारे पूर्वाग्रहों से ग्रसित हमारी बुद्धि में समाधान का कारक बनता है तथा हमें उद्धत, चंचल और उन्मत्त होने से रोकता है, वह अत्यंत आनंदकारक एवं शांतिप्रदायक है। इसलिए भगवान ने कहा है कि श्रद्धा एक ऐसी कोख है जहां धीरे-धीरे ज्ञान पल रहा होता है। 


  • जिस ज्ञान में विनम्रता, प्रियता, आनंद माधुर्य स्थिरता, आत्मरूपता तथा आत्मैक्यता होती है, वह सबके लिए समभाव है। ज्ञान का अर्थ यह नहीं कि जिसमें श्रेष्ठता हो-वह छोटा है, और मैं बड़ा हूं। ज्ञान में केवल श्रेष्ठता का बोध नहीं रहता, पवित्रता या उच्चता का बोध नहीं रहता। वैषम्यता का भाव नहीं होता। ज्ञान का अर्थ यह भी नहीं है जिसमें निरंतर पूज्यता का बोध रहे कि अब मैं बड़ा हो गया और ये छोटे हैं। ज्ञान वह है जो समतामूलक, प्रेमकारक तथा समाधान का आधार हो। यह ज्ञान आत्मभाव और अपनेपन की मीठी-सी अनुभूति पैदा करता है एवं श्रद्धा से उत्पन्न होता है।






हम संगठक हैं, पूर्णकालिक है, प्रचारक हैं, इसलिए हम सदैव कार्यकर्ताओं के श्रद्धा के केंद्र बने रहते हैं। हमारे व्यवहार कृतित्व का प्रभाव सीधे उन पर पड़ता है। हम जैसा करते हैं वैसा ही करने का प्रयास उनका रहता है। हमारे व्यवहारों से सीख कर वैसा व्यवहार करने का अभ्यास करते हैं और यही संगठन की विशेषता है यह सब बात होता है उसके मूल में  श्रद्धा है।


श्रद्धा कभी प्रमाण नहीं मांगती और ना ही कभी झुकती है वह बसे का कारण बाहर जाना है झरना क्यों वह रहा है फिजिक्स से पूछेंगे तो अपनी परिभाषा देगा पर श्रद्धालु है यह बता सकता है क्योंकि वह रही है


संत तुलसीदास जी ने मानस में के किस स्थान पर कहां है श्रद्धा बिना धर्म नहीं हुई शक्ति के क्षेत्र में श्रद्धा की प्रधानता है

उदाहरण आम्रपाली रत्नाकर डाकू रावण दुर्योधन





एक नगर में राजा का आगमन हो रहा था उनके स्वागत में उस नगर के लोग मार्ग के दोनों और खड़े थे राजा जी पहुंचने ही वाले थे उसी समय वहां के मुख्य मार्ग में एक कुत्ता सौच कर के चला गया।

लोग वहां स्वागत के लिए खड़े ही थे, थाली में गुलाल और पुष्पा रखे थे।

 सामने से राजाजी का रथ आ रहा है वह दिखाई दे  रहा था।

 और सामने में शौच भी  स्पष्ट दिख रहा था । सफाई कर ले इतना समय था नहीं  इसलिए किसी के दिमाग में कुछ सूझा ।

 शौच के ऊपर में  गुलाल रख दिया, ऊपर से पूछ पर डाल दिया ।

 राजा जी के रथ के सामने जो लोग पैदल चल रहे थे उनको लगा यह स्थान कोई विशेष है गुलाल के साथ फूल भी चढ़ा हुआ है, इसलिए जो भी आ रहा था वहां पर हाथ जोड़कर नमस्कार करते हुए, सर झुकाते आगे बढ़ रहे थे ।

लोग श्रद्धा से ही नमस्कार कर रहे थे।


तो इस प्रकार की श्रद्धा नहीं चाहिए।




श्रद्धा का आधार व्यक्ति के गुण कर्म होते हैं इसने जिन कर्मों की प्रेरणा से श्रद्धा उत्पन्न होती है उन्हें धर्म की संज्ञा दी जाती है।


बचपन में जब हम प्राथमिक स्कूल जाते हैं वहां आ इ ई उ ऊ सीखते हैं वह समय कोई प्रश्न नहीं होता यह क्यों कैसे जो सिखाया जाता है उसे श्रद्धा से हम सीखते हैं कोई तर्क वितर्क किंतु परंतु नहीं होता और धीरे-धीरे ज्ञान के मार्ग पर चलकर विद्या धन प्राप्त करते हैं


किसी चीज़ की भूख लगना ही श्रद्धा है।


किसी के प्रति होने वाला हार्दिक झुकाव व भावनात्मक लगाव जब हम किसी को इष्ट मान कर आदर्श बना लेते हैं और उस आदर्श को अपने हृदय में बिठा लेते हैं तो वह श्रद्धा का स्वरूप बन जाता है , जब तक श्रद्धेय हमारे ह्रदय के आसन पर नहीं बैठते हैं तब तक श्रद्धा सतही  श्रद्धा होता है।

 हृदय में बैठ जाए तो वास्तविक श्रद्धा प्रकट होती है।

 एक बार श्रद्धा प्रकट हो जाए तो डोलायमान नहीं होती, वह अटल होती है इसमें तीन प्रकार की है श्रद्धा है।


आश्रद्धा - मनुष्य को दूर लेकर चली जाती है छोटा सा भी कोई कारण मिला मन डोलाय मन हो जाता है


अंधश्रद्धा - बंद श्रद्धा जो आप उचित कार्य प्रसांगिक कार्य करा लेती है।


अटलश्रद्धा- एक बार श्रद्धा जग गई तो उसे हिलना नहीं है चाहे कुछ भी हो चाहे कुछ भी कहे डिगना नहीं चाहिए।











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