गुरुपूजन
1. मनुष्य को जब किसी व्यक्ति से राग याने मोह हो जाता है, तो उसके याने उसका अवगुण दिखाई नही देते हैं। और जब मनुष्य को किसी से द्वेष हो जाता है, तो उसे उसके गुण दिखाई नही देते है संगठक को राग और द्वेष से मुक्त होना हैं विरागी होना है, गुरु भगवा हमें विरागी होने की प्रेरणा देती है। उदा:- डा.हेडगेवार
2. संगठन का निर्णय ही अपनी इच्छा मानकर कार्य करने वाला ही समर्पित कार्यकर्ता कहलाता है। विश्वास का अगला चरण श्रद्धा है। श्रद्धा से ही समर्पण का भाव जाग्रत होता हैं। कार्य की पूर्णता के लिए समर्पण भाव जाग्रत होना भावश्यक हैं। श्रद्धा जनित समर्पण स्थाई एवं रचनात्मक होता है- यही समर्पण की प्रेरणा हम भगवा ध्वज से लेते हैं। उदा:- एकनाथ रानडे, पं. दीनदयाल उपाध्याय
3. योग्यता समर्पित कार्यकर्ता का लक्षण नहीं। बुद्धिमान है योग्य है। अच्छे, लेखक, अमीर, कर्तृत्ववान लेकिन संगठन के निर्णय के बाद भी कुछ और अपनी बुद्धि से सोचता है वह समर्पित नही, उससे संघ का लक्ष्य साध नही सकते है। प.पू. गुरुजी विद्वान थे, २००० पुस्तक पढ़े थे, प्राध्यापक थे लेकिन जैसे अखंडानंद जी के शिष्य बने वे सबकुछ भूल गये। वर्तन धोने का काम दिये तो उसे भी मन लगाकर करने लगे। ऐसे समर्पण भगवाध्वज से हम सीखते है।
4. शादी नही कि, पैसे नही कमा रहे है, घर त्यागे, समाज के लिए समर्पित है फिर भी अपना स्वभाव संगठन के अनुकुल, राष्ट्र के अनुकुल नही है तो वह संपूर्ण समर्पण नहीं कहलायेगा। तो अपना स्वभाव को भी बदलकर संगठानुकूल बनाना यह समर्पण का उच्च आदर्श हम भगवाध्वज से सीखते है उदा:- पू. डा हेडगेवार जी अपना गुस्सेल स्वभाव को बदलकर संगठन के लिए मृदुभाषी, स्नेहमयी बन गये। भगवा ध्वज याने इतिहास याने अपना गौरवशाली, वैभवशाली, इतिहास उसे पुन: प्राप्त करना ही अपना उद्देश्य हैं।
६. भगवा याने सूरज की लालिमा किरणे जिससे अँधकार दूर होगा, दुनिया का लालन पालन पोषण वर्धन होगा, ऊर्जा मिलेगी यही भगवाध्वज है उसे फहराना याने उजाला जीवन में लाना, जीवन में ऊर्जा प्रकाश लाना, अप्पदीपो भव, आत्मदीपो भव ,जीवन का सभी कल्मशों गंदगी को दूर कर उत्थान की ओर अग्रसर होना जैसा रामकृष्ण, शिव, शंकर, बुद्ध, व्यास आदि का उदा- माधव को माधव बनना।
7. भगवाध्वज यानें 'यज्ञ'- यज्ञ के प्रतीक भगवा है
भगवद्गीता नुसार- संपूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते है, अन्न की उत्पत्ति श्रृष्टि से, वृष्टि याने, बरसात वर्षा यज्ञ से होती है।
8. भगवाध्वज ज्ञान का भी प्रतीक है यह विहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला है। कर्म समुदाय तू वेद से उत्पन्न - वेद याने साक्षात ज्ञान यही बात परमात्मा से उत्पन्न होते है. जिन व्यास जी को परमात्मा का साक्षात्कार हुआ था आषाढ पूर्णिमा को व्यासपूर्णिमा भी कहते है उनकी पूजा करते है। जो ज्ञान की पूजा करेगा उनका कर्म सुसंस्कारित रहेगा उस कर्म से जो यज्ञ होगा वह भी पवित्र ही रहेगा। इस प्रकार भगवा ध्वड़ा की पूजा से मन बुद्धि पवित्र होकर अच्छा समाजोपयोगी कार्य करने से सुगम होगा।
9. भगवा है पदमिनी की जौहर की ज्वाला मिटाती अमावस लुटाति उजाला चिता एक जलने हजारो खड़ी थी पुरुष तो मिट नारियां सब हवन की. --. भगन में लहरता भगवा हमारा
10. नदी का जल सोचता है मैं सभी के लिए उपयोगी बनू। पेड़ जंगल पत्ता फल सोचता है में हर एक के लिए उपयोगी बनू, ऐसा ही गाय सोचती है मेरा दूध, मूत्र, गोबर दूसरे के लिए उपयोगी हो, यही भगवाध्वज से हमे संदेश मिलती है मैं परिवार, समाज राष्ट्र के लिए हूँ। निःस्वार्थ इसी से संगठन का आंतरिक शक्ति बढ़ती है। मैं संगठन के लिए हूँ संगठन मेरे लिए नहीं। संगठन के साथ निष्ठापूर्वक निःस्वार्थ भाव से जितने लोग जुड़ते जायेंगें उतनी ही मात्रा में आन्तरिक शक्ति बढ़ेगी यह अंतःशक्ति की प्रेरणा भगवाध्वज से मिलती है।
11. एकात्मक शक्ति का प्रतीक भी है। भगवाध्वज- आंतरिक शक्ति में से निकली वह समूहशक्ति है जिसकी ध्येय आदर्श, लक्ष्य और उद्देश्य एक हो। विचारों से समता, स्वभाव में समरसता आपसी आत्मीयता, मतभेद के बावजूद मनभेद न हो। इस समूह में शामिल प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे के गुणों के प्रसंशक हो किन्तु यदि किसी में कोई अवगुण या कमी हो उसकी कोई चर्चा नहीं करता हो। इसमें शामिल प्रत्येक व्यक्ति का स्वभाव मकान में बने रोशनदान जैसा हो जो गंदी वायु को बाहर निकलता है किन्तु नीचे जाने नही देता है।
१२. एकात्मता का संदेश है भगवा - उदा:- चूना + हल्दी = लालरंग इसलिए संभव हुआ चुना सफेदी और हल्दी पीलापन छोड़ दिया (a+b)2= a2 +b2 +2ab जिसमे 2ab एक नई शक्ति जो a और b के निःस्वार्थता' से उत्पन्न होते है। निस्वार्थता प्रतिभायुक्त प्रेमयुक्त रही तो 1और 1 11 होगा।
13. ध्येयवादी ध्येयनिष्ठ अपने बारे में नही सोचता है 1. जैसा भरत श्री राम की पादुका लेकर सिंहासन पर रखा स्वयं गांव मे रहने लगे। मौका मिला था राजा बनने का लेकिन नही बने वैसे ही चाषक्या को भी मिला था, लेकिन गाय चराने वाले चंद्रगुप्त को मगध का राजा बनाया, शत्रुपक्ष के राक्षस को महामंत्री बनाना। राष्ट्रहित ही सर्वोपरि संगठन का हित ही सर्वोपरी यह मानकर खुद को ताक में रखकर सोच रखता है यही समर्पण है।
14. ध्येयवादी व्यक्तिवादी बनता है तो धीरे धीरे पतन की ओर जाता है मगर खुद को पता नहीं चलता है मैं जो भी निर्णय लूंगा वही चलेगा सबको मेरी बात माननी होगी। भूल जाता है कि -
जब मै था तो हरि नहीं अब हरि है तो मैं नहीं।
प्रेमगली अति साकरी दो नहीं एक समाहि ।।
मैं सोचने वाला व्यक्ति सबको साथ लेकर नही चल सकता हैं। उसे काम खड़ा करने का गर्व होता है हठवादिता के कारण उसके मन में विकृत विचार आता है। दूसरा कैसे असफ़ल हो इसका वह प्रयत्न करता है।
बुराईयों के उपर नजर अधिक रहती है उसे सुधारने अधिक मेहनत करते हैं अच्छे बुरे न हो जाए इस पर भी सतर्कता बरतना है! यही भगवाध्वज का संदेश है। इसीलिए प पू डा जी ने अपने को गुरु न. मानते हुए भगवाध्वज को गुरु माना क्यों कि कितने भी श्रेष्ठ व्यक्ति क्यों न हो उनमें भी स्खलन आ सकता है। व्यक्ति नश्वर तत्व शास्वत है पवित्र है श्रेष्ठ है।
15. "वीरव्रत' भगवाध्वत्र बलिदान का प्रतीक
प्राण से अधिक महत्व ध्येय को देते है। उसके लिए दीवाल मे चुना जाना, फासी के फंदे को चूमना अपना अहो भाग्य समझते है । उदा:- फतेहसिंह, जोरावर सिंह, भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव, असफाक उल्ला - खाँ, मदन लाल धींगरा आदि।
16. आत्म निरीक्षण, मूल्यांकन अपना किस आधार पर हो भगवाध्वज से
संगठन के सबसे बड़े दुश्मन कौन है। हम स्वयं हमारा अहं
अपनो से हारे गैरो में कहाँ दम था।
किश्ती वहां डूबी, जहाँ पानी बहुत कम था।
मनुष्य में परिवर्तन आता है, किन्तु परिवर्तन हो रहा है यह दिखाई नहीं देता हैं। अच्छे से अच्छे आदमी का मन शब्द रूप रस गंध स्पर्श के उपभोग में रम जाता है। आसक्ति और प्रबल इच्छा निर्माण होती है। अहंवादी सोचता है मेरा भी अपना अस्तित्व है यह विचार आते ही उसमें आत्मकेंद्रित निर्माण होती है। वह अहंकार का दीपक लेकर संगठन की मंजूषा में अपने अस्तित्व को खोजता है। आखिर ऐसा क्यों हुआ? इसलिए की उसमें ध्येय के स्थान पर अहं आया इसलिए समय समय पर आत्मनिरीक्षण करना चाहिए।
उदा:- भरत राम को राजा बनाने के लिए चित्रकूट तक गये। चाणक्य चंद्रगुप्त को राजा बनाया। श्रीकृष्ण स्वयं को राजा बनने नही धर्म प्रतिष्ठा के लिए..
17. गेरुआ वस्त्रधारी सन्यासी को भी सेवा करने हेतु गेरुआ त्याग करना पडेगा सन्यास नही छोड़ना वस्त्र छोडिये ऐसा गाँधी जी ने सन्यासी को कहा- यह है समर्पण यदि राष्ट्र सेवा के प्रति संपूर्ण जीवन समर्पित है तो समर्पण के बाद अपना स्वयं का , वेशभूषा कुछ नही बचा तब तो अपना स्वभाव; की आदते जो राष्ट्र सेवा करने में बाधक छोड़ना पडेगा। रहन सहन खान पान एक-एक करके छोड़ना पड़ेगा।
18. श्रीकृष्ण का सिरदर्द - रुकमणी या राधा का चरण रज मांगा गया फिर यह भी बताया गया जो चरण रज देगी वे नरक में जायेंगें- रुकमणी ने नहीं दी, राधा ने दे दी। श्रीकृष्ण का दर्द दूर हो यही समर्पण है। मुझे क्या होगा क्या नही होगा यह मुझे नही सोचना |
19. संगठन के व्यापक हित में व्यक्तिगत संकल्प का त्याग "युद्ध के समय शस्त्र नही ऊठाऊँगा" श्रीकृष्ण अपनी प्रतिज्ञा' को व्यापक हित धर्म के लिए छोड़ दिये। लेकिन महाभारत के युद्ध में सब अपनी अपनी प्रतिज्ञा और संकल्प के प्रति अधिक प्रतिवद्ध थे। चाहे कौरव या पांडव पक्ष के। केवल कृष्ण को छोड़कर।
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